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'मंटो से बड़ा लेखक अभी दुनिया को नहीं मिला' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मंटो हमारे दौर के बहुत बड़े लेखक थे और मै समझता हूँ ऐसे लेखक कभी-कभी ही पैदा होते हैं. ये ठीक है कि उनके ऊपर अश्लील कहानियाँ लिखने के लिए कई मुक़दमे भी चले लेकिन उन्होंने कई बड़ी गहरी सामाजिक कहानियाँ भी लिखीं. जो लेखक टोबा टेक सिंह जैसी कहानी लिख सकता है उसका मुक़ाबला कोई और कहानीकार नहीं कर सकता. वो अकेले लेखक हैं अपने दौर के, अपने ज़माने के और अपनी पीढ़ी के. ये कहने के सवाल हैं कि मंटो की भाषा फूहड़ थी और उनका लेखन अश्लील था. दरअसल लेखन में एक तरह की कुलीनता चलती रही है. यह कुलीनता साहित्य में भाषा और संस्कार के स्तर पर चलती रही है लेकिन मंटो ने जिस पृष्ठभूमि की कहानियाँ लिखीं, जिन लोगों के बारें में लिखा, उस भाषा में वही लिख सकते थे क्योंकि वे अपने पात्रों को और उनकी पृष्ठभूमि को निजी तौर पर जानते थे. मैं मंटो को इसलिए पढ़ता हूँ क्योंकि एक तो वो बहुत बड़ा विद्रोही लेखक है जो बनी बनाई लकीरों पर नहीं चलता था. दूसरा, विभाजन ने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था. वो पाकिस्तान तो चले गए लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं था कि उन्होंने पाकिस्तान के सिद्धांत को मंज़ूरी दे दी थी. मुझे लगता है कि उनका पाकिस्तान जाना बेहद ज़रुरी था. सआदत हसन मंटो, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, डॉ अरसद जैसे इतिहासकार और सज्जाद ज़हीर जैसे साहित्यकार और सांस्कृतिक लोग यदि पाकिस्तान नहीं गए होते तो वहाँ जो खुलापन अब आ रहा है, वह नहीं आ रहा होता. और इसका बहुत बड़ा श्रेय मैं मंटो को देता हूँ. निश्चित रुप से वो ख़ुदा से बड़े अफ़साना निगार हैं क्योंकि ख़ुदा तो एक परिकल्पना मात्र है. मंटो एक तरक्क़ीपसंद, समझदार, अपने समय की सच्चाई को देखकर उसका सामना करने वाला और अपने समय की सच्चाई को राजनीतिक रंग में न रंगकर उसको इंसानियत के रंग में रंगने का जो जज़्बा मंटो में था, वह कम कहानीकारों में पाया जाता है. दुनिया के बड़े लेखकों का नाम लिया जाता है- ओ हेनरी, मोपासाँ, चेखव का, वे भी बड़े लेखक थे लेकिन मैं मानता हूँ कि मंटो से बड़ा लेखक अभी इस दुनिया को नहीं मिला. जहाँ तक मंटो को भारत और पाकिस्तान में मिलने वाले सम्मान का सवाल है तो पाकिस्तान का समाज तो ख़ैर एक बंद समाज था और वहाँ उनकी कहानियों पर प्रतिबंध लगा और उन पर मुक़दमे चले लेकिन मैं समझता हूँ कि भारत में प्रेमचंद के बाद यदि किसी लेखक पर काम हुआ है तो वह मंटो है. हिंदी में भी, उर्दू में भी. यह मंटो को एक बहुत बड़ी श्रद्धांजलि है. (विनोद वर्मा से बातचीत के आधार पर) |
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