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मंगलवार, 10 मई, 2005 को 06:37 GMT तक के समाचार
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मंटो को गए आधी सदी बीत गई

मंटो का मकान
लाहौर में मंटो का मकान
सआदत हसन मंटो को हमसे जुदा हुए 50 बरस पूरे हो चुके हैं.

यह सिर्फ़ एक निजी संस्मरण है जिसे आप ज़्यादा से ज़्यादा नॉस्टालजिया क़रार दे सकते हैं.

मंटो को मैंने पहली और आख़िरी बार आठ साल की उम्र में देखा था और वह भी कोई दो सौ फुट के फ़ासले से, लेकिन उनकी आवाज़ मैंने दस फुट के फ़ासले से ज़रूर सुनी थी.

हम उन दिनों लाहौर में माल रोड की गंगाराम बिल्डिंग में उपर वाले फ्लेट में रहते थे और जैसा कि मुझे बरसों बाद मालूम हुआ, मंटो साहब का घर वहाँ से 15 मिनट के फ़ासले पर था. हालाँकि यह फ़ासला भी वह तांगे के बिना तय नहीं करते थे.

वह 1954 का ज़माना था और मैं दूसरी कक्षा में बढ़ता था.

इतवार का दिन और तीसरा पहर था जब दरवाज़े पर दस्तक हुई और एक बारीक आवाज़ आई, “वक़ार साहब हैं?" नौकर ने दरवाज़े पर जाकर बात की और वह व्यक्ति चला गया.

उन दिनों पिताजी किसी दैनिक अख़बार में थे. और इसलिए शायद हमारे घर मिलने-जुलने वालों का तांता लगा रहता था. अपने बच्चों को नौकरी दिलवाने, भारत में छोड़ी हुई जायदाद का क्लेम कराने, बेकसूर पकड़े जाने वाले किसी रिश्तेदार को पुलिस के चंगुल से छुड़वाने या इस तरह की कोई और सिफ़ारिश कराने आ जाते थे.

मेरा ख़्याल था आज का मुलाकाती भी उन्हीं में से एक होगा. लेकिन जब पिताजी वापस आए और नौकर ने बताया कि मंटो साहब आए थे तो वह उस पर बरस पड़े. तुमने उन्हें बिठाया क्यों नहीं? यह कहते हुए वह तेज़ी से नीचे की तरफ दौड़ पड़े. मुझे तब अहसास हुआ कि आज का मिलने वाला कोई ख़ास था.

थोड़ी देर के बाद मैंने बालकनी से देखा कि सड़क के किनारे तिकोने बाग़ के कोने पर लाल लेटर बॉक्स के पास, पिताजी एक व्यक्ति से बातें कर रहे हैं, जो सफेद कुर्त्ता पायजामा पहने हुए हैं और उनके हाथ में कोई कागज़ है जो वह पिताजी को दिखा रहा है और सामने एक खाली तांगा खड़ा है.

ये थे मंटो साहब.

लाल लेटर बॉक्स, सफेद लिबास और ख़ाली तांगे का यह दृश्य मेरी याद्दाश्त में सुरक्षित हो चुका था.

हिदायत और सच्चाई

जब मैं 8वीं कक्षा में पहुंचा तो पहली बार “सआदत हसन मंटो” का नाम कहानीकार के तौर पर सुना, लेकिन इस सख़्त नोट के साथ कि उनकी कहानियाँ बेहद अश्लील और असभ्य है और नौजवानों को उनसे पूरी तरह परहेज़ करना चाहिए.

मैं जब 9वीं कक्षा में पहुंचा तो ज़िंदगी की पहली साहित्यिक घटना घटी यानी मेरा लेखन पहली बार छपकर सबके सामने आया, यह एक लेख था, सआदत हसन मंटो के ख़िलाफ़. जिसमें मंटो पर अश्लील लेखक होने का आरोप लगाते हुए उनकी कहानियों को समाज को नुकसान पहुंचाने वाली बताया गया था.

यह लेख शाह आलमी दरवाज़ों से प्रकाशित होने वाले एक सप्ताहिकी में छपा था. लेख की महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैंने उस वक़्त तक मंटो की एक भी कहानी नहीं बढ़ी थी और मेरा सारा लेखन सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था. जब यूनिवर्सिटी के स्तर पर पहुंचा तो पता लगा कि मंटो के लेखन से बड़े-बड़े लोग कुछ सीखने की कोशिश कर रहे थे.

दूसरी महत्वपूर्ण घटना मंटो के बारे में तब घटी जब मेरे सहपाठी तैयब बुखारी ने यह रहस्योदघाटन किया कि सआदत हसन मंटो, 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना के ड्राइवर हुआ करते थे.

बाद में पता चला कि बुखारी ने मंटो के लेख “मेरा साहब” पर सरसरी निगाह डालने के बाद चारों तरफ अपने बेशक़ीमती शोध का चर्चा करना शुरू कर दिया था. जबकि कुसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने जिन्ना साहब के ड्राइवर आज़ाद की कहानी आत्मकथा की शैली में लिखी थी.

बहरहाल, सआदत हसन मंटो का हमारी जिंदगी में सही तौर पर दख़ल 1967 में शुरू हुआ जब लाहौर के पाँच नौजवानों ने मिलकर मंटो मेमोरियल सोसाइटी की स्थापना की, भूली बिसरी क़ब्र की खोज की, मंटो के घर जाकर उनकी बेगम सफ़िया मंटो से मुलाकात की, मंटो के पुराने दोस्तों से बातचीत करके उनकी बरसी का सम्मानजनक तरीक़े से आयोजन किया और मंटो की कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद को प्रकाशित करने की ठानी.

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