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गुरुवार, 16 सितंबर, 2004 को 17:04 GMT तक के समाचार
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वाह...चोरी में क्या थ्रिल है!

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सुबह सवेरे उनके घर पहुंचा तो देखा कि मिर्ज़ा फ़ोया गुनगुनी धूप में तख़्त पर बैठे, चने का नर्म साग नमक लगा कर खा रहे हैं.

चालीस साल पुराने अज़ीज दोस्त मिर्ज़ा फ़ोया.

फ़ोया? पूरा नाम फ़ख्र उद्दीन उमर यासीन अहमदी. अब यह मीलों लम्बा नाम कौन ले. सो नाम से अंग्रेज़ी के अक्षर उठाकर, यारों ने बना लिया 'फ़ोया'.

मुँह में साग ठूँसते हुए बोले- 'लो खाओ, चने का साग खाने से पेट, ख़ून, विचारधारा और ईमान साफ़ रहता है.

मैंने कहा, "तुम्हें मुबारक, मुझे खाना होगा तो खेत में ही पौधों पर नमक छिड़क कर, डायरेक्ट चर लूँगा चारा."

मिर्ज़ा भड़क गए. ठोढ़ी पर उगी चवन्नी भर दाढ़ी पर से साग पोंछ कर बोले, "चारा? मैं क्या कोई फ़लाँ-फ़लाँ हूँ कि करोड़ों का हरा चारा चर जाऊँ और डकार भी न लूँ? कोर्ट कचहरी टापती रह जाए और अगला आला मुक़ाम पर पहुंच ले. ख़ैर, यह साग फत्ते की टोकरी से झटका हुआ है. यानी चोरी."

पैंतरा बदल कर मिर्ज़ा ने मुंह में एक पान झड़ेका और उसे जबड़ों मैं क़ैद करके बोले- "यार केपी, चोरी में भी क्या थ्रिल है."

 मैं क्या कोई फ़लाँ-फ़लाँ हूँ कि करोड़ों का हरा चारा चर जाऊँ और डकार भी न लूँ? कोर्ट कचहरी टापती रह जाए और अगला आला मुक़ाम पर पहुंच ले. ख़ैर, यह साग फत्ते की टोकरी से झटका हुआ है. यानी चोरी
मिर्ज़ा फ़ोया

"याद है, हम लोग छोटे-छोटे थे. स्कूल में नेकर पहनते थे. घर में उस इल्लत से भी आज़ाद. एक दूसरे के बस्ते से रबर, पेन्सिल, कटर, पराठा वग़ैरह झटक लेते थे."

"क्या थ्रिल होती थी. बड़े हुए तो सुना कि हज़रत 'दाग़' की महबूबा को दूसरे कोई शायर, सोने की झुमकियाँ पहनाकर तिड़ी कर ले गए या रामदीन चक्कीवाले की लौंडिया को जानवरों के डाक्टर मदन लाल सरका ले गए. थ्रिल."

"अब जो बुढ़ापे के क़रीब आए और देश ने तरक्क़ी की तो देखते क्या हैं कि एमपी-एमएलए चोरी होने लगे. उसने उसके बीस विधायक तिड़ी कर लिए और तख़्त पर जा बैठा."

"मौक़ा लगते ही दूसरे ने पहले के, ज़्यादा गुड़ देकर, तीस तोड़ लिए और अगले का छप्पर गिरा कर अपना जमा लिया."

"ख़ुदा कस़म, यही है असली और ख़ालिस देश सेवा. चोरी की डिग्नीफ़ाइड थ्रिल."

"हमले यह काम पेंसिल, रबर से शुरू किया, वे विधायक, सांसद तक आ गए. यानी, सारे जहाँ से. वग़ैरह- वग़ैरह."

"ईमान जेब में इत्र के फाहे जैसा पड़ा है. कभी इस पार्टी को सुंघा दिया, कभी उसे. चोरी के सांसदों, विधायकों की महा थ्रिल, मियां."

मिर्ज़ा ने पान की लुगदी मुँह में दूसरी तरफ़ ट्राँस्फर की और अंदर की तरफ़ दो कप चाय का आर्डर फेंक कर बोले, "क्रिकेट में ही देख लो आप. माल-पानी चाहिए. किसी ने इस अंपायर को तोड़ लिया, किसी ने दूसरे को. नहीं जुगाड़ बैठा तो बैड वेदर, बैड लाइट. मैच फ़िनिश. न तुम जीते, न हम हारे."

 क्रिकेट में ही देख लो आप. माल-पानी चाहिए. किसी ने इस अंपायर को तोड़ लिया, किसी ने दूसरे को. नहीं जुगाड़ बैठा तो बैड वेदर, बैड लाइट. मैच फ़िनिश. न तुम जीते, न हम हारे
मिर्ज़ा फ़ोया

"अल्ला-अल्ला ख़ैर सल्ला. चौरी का डौल लग गया तो भी थ्रिल, न लगा तो भी. चोरी का अपना सुख है बिग ब्रदर. छह सांसद चोरी करने में भी थ्रिल, छह ओवर पहले मैच चौपट कराने में भी थ्रिल."

चाय आ गई. मिर्ज़ा फ़ोया ने चाय प्लेट में ढालकर फूँकी और अंदर आत्मा तक एक लंबी सुड़की खींच कर बोले, "मियाँ, आप पर लानत. अख़बार में ऐक्ट्रेसों की ऐसी कैसी और जैसी तैसी फोटुएँ देखने के अलावा कभी कभी न्यूजें भी पढ़ लिया करो."

चोरी की पवित्र तकनीक कहाँ पहुँच गई. बदन में सनसनी होने लग पड़ती है, यानी थ्रिल.

अब इधर जो एक ख़बर पढ़ी तो तुम्हारी क़सम तबीयत लहरा कर लादेन हो गई. इसे कहते हैं शौक. बम्बई के कुछ बड़े-बड़े होटलों, क्लबों और डिपार्टमेंटल स्टोरों में, बड़ी-बड़ी कारों वाली, बड़ी-बड़ी महिलाओं के बड़े-बड़े शौक. साथ में बड़े-बड़े बैग.

रात गए घर वापस लौटीं तो चम्मच, प्यालियाँ और जाने क्या-क्या सजा दिया मेज़ पर. होटल-क्लब से तिड़ी किया हुआ. अलग अलमारी में सजा दी हाथ की सफ़ाई की ये ट्राफ़ियां. सहेलियों के बीच शान से बखान कि कौन माल कहाँ से झटका हुआ है.

हैसियत में हाई-फ़ाई. चाहें तो पूरा होटल या क्लब ख़रीद लें. बस एक शौक है. चोरी, एक शानदार थ्रिल.

पहले पान का पार्थिव शरीर बाहर थूक कर फ़ोया ने दूसरा दबाया और बोले, "अब लगे हाथों बाहर की भी सुन लो. बहुत अर्सा पहले कहीं के एक अमीर ख़लीफा को भी इसी थ्रिल का चस्का था. इन हज़रत के महल में मेहमानों के लिए पचासों सोने की ऐश-ट्रे सजी रहती थीं. मगर एक शौक़ था. जिस होटल में चेंज के लिए गए, वहाँ से लबादे तले, चार ऐश-ट्रे दबा लाए."

"ऐश ट्रे मिट्टी की हो या चाइना की, चांदी की हो या टीन की. झटकने से मतलब. एक थ्रिल, एक राहत."

 जिसके लिए मैं मर गया उनका यह हाल है, ईटें चुरा के ले गये मेरे मज़ार की
शायर

मैं चलने को हुआ तो मिर्ज़ा बोले, "यों समझ लो केपी कि नेकी, ईमानदारी और सच्चाई के जनाज़े पर रखी हुई एक तसल्ली, चोरी की थ्रिल.

शायर भी कह गया है-

"जिसके लिए मैं मर गया उनका यह हाल है,
ईटें चुरा के ले गये मेरे मज़ार की."

मैंने मिर्ज़ा फ़ोया के डिब्बे से एक पान दबाया और चुपचाप चला आया. उनका डिब्बा मेरी जेब में था. चोरी, एक थ्रिल, और बस.

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