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सोमवार, 23 अगस्त, 2004 को 16:20 GMT तक के समाचार
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आइये चलें..इस्तीफ़ा दे दें

"इधर देखिए.. ज़रा मुस्कराईये..थैंक यू"
हमारा देश एक इस्तीफ़ा प्रधान देश है. साल भर में जितने बेकारों की नौकरियाँ नहीं लगतीं, उससे ज़्यादा नाकारे इस्तीफ़ा दे देते हैं.

अनाज की दो फ़सलें होती है.. रबी और ख़रीफ़. समाज की भी दो फ़सलें होती हैं- शपथ और इस्तीफ़ा.

पहले शपथ.. फिर इस्तीफ़ा.. फिर शपथ.. फिर भर्ती और छँटनी का यह मनोरंजक खेल पूरे वर्ष चलता है, और देश अपनी ग़रीबी समेटे यह नौटंकी देखता रहता है.

जिसे जाना होता है, वह दे देता है. अगला ले लेता है. इसे मंज़ूर कर ही लेना ऊँची कुर्सी की मजबूरी है.

क्योंकि यही उनकी नौकरी है कि शपथ खिलाओ और इस्तीफ़ा उगलवा लो.

दुःख तो तब होता है जब वे लोग भी इस्तीफ़ा दे देते हैं जिन्हें इस्तीफ़ा लिखना भी नहीं आता.

एक कागज़ संभाले खड़े हैं कि भय्या, जऱा लिख देना इस्तीफ़ा. जब हमारे अली बाबा ही जा रहे हैं तो हम चालीस चोर रह कर क्या करेंगे?

हम तो दुल्हनिया की पायल हैं. जिधर दुल्हनिया जाएगी उधर झनकेंगे. और सच पूछो भय्या, तो न हमें शपथ का मतलब मालूम, न इस्तीफ़े का.

इतना ही पढ़े लिखे होते तो कोई ढंग का काम न करते..

इस्तीफ़ा उर्दू का लफ्ज़ है, पर दिया हमेशा हिन्दी में जाता है. उठाई एक क़लम और लिख दिया..

ले जा अपनी कुर्सी, नहीं बैठते. दोबारा ज़रूरत हो तो बुला लेना. शपथ ले लेंगे.

देश भक्त हैं कोई दूध नहीं कि जमकर एक बार दही हो गए तो दोबारा दूध नहीं हो सकते.

'देश हित में'

कुछ इस्तीफ़ेबाज़ तो इतनी जल्दी में होते हैं कि इस्तीफ़ा देकर कपड़े भी नहीं बदलते और उन्हीं मैले कपड़ों में अगले दिन फिर शपथ की लाइन में लग जाते हैं.

जो इस्तीफ़ा देता है यही कहता है, कि दे दिया देश हित में. फिर अगले दिन वापस ले लेता है..देश हित में.

देश हित न हुआ किसी डांसर के घुंघरू हो गए कि हर रात पहन लिए, हर सुबह उतार दिए.

कुछेक तो इतनी हड़बड़ी में होते हैं कि चेहरा देखकर यही पता नहीं लगता कि आज इन्होंने शपथ ली है. या इस्तीफ़ा दिया है?

देखा-देखी कमबख़्त मुझे भी खुजली सवार हुई. मैंने डरते-डरते पत्नी से कहा-"क्यों जी, मैं तुम्हें दे दूँ इस्तीफ़ा?"

वे भड़क कर शबनम से शोला हो गईं. डॉट कर बोलीं- क्या कहा? तुम मुझे इस्तीफ़ा दोगे? मेरे चरित्र पर लांछन लगाओगे?

मैं इस घर में सात पार्टियाँ बदल कर आई हूँ क्या? पचास बारातियों की मौजूदगी में सात फेरे लेकर आई हूँ.

यह घर है पालिटिक्स नहीं कि शपथ बाप ले और फ़ायदा बेटा उठाए? व्यग्यंकार हो, व्यंग्य लिखते रहो.

इस्तीफ़ा लिखने की कोशिश कभी मत करना. अब जाओ फ़ौरन.. बच्चों को नहलाने का टाइम हो गया"..मैं नहलाने चला गया.

बहरहाल, ख़ामोश.. हमारा काम सिर्फ़ देखना है. शपथ-इस्तीफ़े का नॉनस्टॉप खेल जारी है.

जारी रहेगा.. खेलते रहेंगे. आम आदमी के धैर्य से.. बरदाश्त से.. "श्री इस्तीफ़ायनमः"

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