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इधर देखिए.. ज़रा मुस्कराइए..थैंक यू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रभु की लाख-लाख कृपा है कि इस धरती पर छवियाँ निखारने को कैमरा मौजूद है. कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है कि अगर इस भूगोल पर कैमरा न होता तो कौन-कौन किस-किस के बाप को बाप कहता फिरता? न देखने लायक़ मनहूस चेहरे अख़बारों में कैसे छपते? धरती की भूख़ और ग़रीबी से साक्षात्कार कैसे होता? यह अलग बात है कि कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता. नंगे को नंगा ही उतारता है. कुछ लोग पैदा ही फ़ोटो खिंचाने को होते हैं.. और मरते भी हैं कैमरे में ही देखते हुए. नेताजी की फ़ोटो मेरा ही दोस्त जो पूरी तरह इंसान बनने से पहले ही नेता बन गया, श्मशान में बेहद उदास था, पिता जी का शव फूलों से ढँका रखा था. श्मशान में हज़ारों की भीड़ थी, जैसी अक्सर नेताओं के बापों के मरने पर होती है. नेता जी पिता की चिता को अग्नि देने जा ही रहे थे कि फ़ोटोग्राफर दिख गया. भक से एक मुस्कान फेंक दी. फ़ोटो छपा तो ऐसा लग रहा था जैसे फूलों से ढँके पिता के सिरहाने खड़े नेता जी गुनगुना रहे हों- "आज मेरे बाप की शादी है..." बाप मर जाता है. फ़ोटो नहीं मरता. कुछ को शौक़ होता है फ़िल्म वालों के साथ फ़ोटो खिंचाने का. मेरे शहर में बरसों पहले धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी की एक फ़िल्म की शूटिंग हुई. मित्रवर मुरारी लाल भीड़ में घुस गए. फ़ोटो हुआ. कैमरे के लिए धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी ही क्या कम चौड़े थे. मुरारी लाल के बाँए पैर का मोज़ा सिर्फ़ आया फ़ोटो में. मुरारी लाल ने शान से एनलार्जमेंट टाँगा कमरे में. नीचे लिखा था-धर्मेन्द्र और हेमा के साथ मुरारी लाल. नीचे ब्रैकेट में था - भीड़ में लाल मोजा देखिए.. यह ही मुरारी लाल हैं. फ़ोटोबाज़ी कभी-कभी बड़े अप्रिय क्षणों को जन्म देती है. नेता बाढ़ की त्रासदी देख रहा है. पूरा गांव जलमग्न है. नेता उदास है. नेता उदास है तो चमचे उदास हैं..
सारा माहौल उदास है. फ़ोटोग्राफ़र खीज रहा है. चेहरे से इस नक़ली उदासी का रैपर उतारो तो फोटो-खींचू. उदास नेता अच्छा नहीं लगता. उदास ही रहना था तो नेता क्यों बना?.. पब्लिक के चेहरे पर उदासी नैचुरल लगती है. हनीमून पर कुछ को ऐतिहासिक स्थलों पर फोटो खिंचाने का शौक होता है. मेरे मित्र रज़ा अली का निकाह हुआ . पत्नी को घुमाने बीजापुर ले गए. ऐतिहासिक स्थल पर यादगार फोटो हुआ. अल्लाह के करम से बीवी इस क़दर शिलाखंड थीं कि फोटों में यही पता न लगता था कि बीजापुर का गोल गुंबद कौन सा है, पत्नी कौन सी? रज़ा अली का फोटो कैमरे में आया ही नहीं. पत्नी ने ही पूरा फ्रेम़ घेर रखा था. बाद में रज़ा भाई ने अपनी सींक सलाई काया का फ़ोटो अलग से खिंचवाया और बीवी के फ़ोटो की बग़ल में चिपका दिया. तब जाकर कर हनीमून फ़ोटोग्राफ़ पूरा हुआ. कुल मिलाकर ऐ दोस्त, कैमरा भी कभी-कभी अजीब हालात को जन्म देता है. कभी ख़ुशी, कभी ग़म. दुनिया का यही एक काम है जो एक आँख बंद करके किया जाता है. चुनांचे.. इधर देखिए.. मुस्कराइए.. रेडी.. थैंक यू. बाद में देखेंगे प्रिंट कैसा आया है. |
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