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रविवार, 08 अगस्त, 2004 को 23:00 GMT तक के समाचार
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काश, मेरे घर भी छापा पड़ जाए!

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बरसों से एक चाह मन में दबे सूख कर पापड़ हो गई.

क्या? एक बार, बस एक बार मेरे घर छापा पड़ जाए और मैं रातों रात चर्चित हो जाऊँ.

जो पब्लिसिटी मुझे 50 वर्ष का लेखन न दे सका, वह एक छापा दे सकता है क्योंकि आज समाज में क़लम से ज़्यादा यश कुकर्म में है.

लोग माफ़िया की तरह गले में हार डालेंगे.

हाय, इस दुबले-सूखे को हिंदी का व्यंग्यकार समझते थे.. स्मगलर निकला?

सुन ली भगवान ने

प्रभु सबकी सुनता है. एक दिन पड़ गया. वे चार थे जो छापा डालने आए थे और ग़लत अंग्रेजी में बतिया रहे थे.

पूछा-" केपी सक्सेना कौन है?"

मैंने कहा- "मैं हूँ न."

चारों अंग्रेज़ी में हँस दिए. मैं हिंदी में खिसिया कर रह गया.

एक ने पूछा- "यह महिला तुम्हारी पत्नी हैं?"

मैंने धीरे से कहा- "अभी तक तो हैं ही. दिल्ली की हैं. अब ऐसी दूसरी नहीं कोई. वह फैक्ट्री ही बंद हो गई जहाँ ऐसे प्रोडक्ट बनते थे."

उन्होंने पत्नी नोट कर लिया. 'स्मगल्ड फ़्रॉम डेल्ही.'

फिर पूछा, "तुम्हारे कुत्ते की दुम टेढ़ी क्यों है. देसी कुत्तों जैसी नहीं. स्मगल्ड.

मैंने कहा, "देसी कुत्ते? देखें हैं आपने? दुमें होती ही नहीं, पर होते कुत्ते ही हैं. आचरण देखिए मेरे कुत्ते का. भूख लगने पर भौंकता है और आश्वासन पाकर चुप हो जाता है." कुत्ता भी नोट हो गया.

आधी पोटाश की औलाद

छोटे बेटे का नंबर आया. यह बाकी बेटों से भिन्न क्यों है?

मैंने लाख समझाया कि आधे बुढ़ापे की आधी पोटाश की औलाद है. छापा साहब नहीं माने. बेटा भी स्मगल्ड में नोट.

अब बाकी बेटे जिद्द पकड़ गए कि वे क्यों नहीं नोट हुए? मैंने डाँटा - "चुप रहो नामाकूलों. सारी औलादें स्मगल्ड में ही नोट हो गईं तो मैं 25 वर्ष क्या भाड़ झोंकता रहा?"

 आचरण देखिए मेरे कुत्ते का. भूख लगने पर भौंकता है और आश्वासन पाकर चुप हो जाता है, कुत्ता भी नोट हो गया

छापा लोग हँसे, "सच-सच बताओ केपी, तुम्हारे घर में क्या-क्या फॉरेन माल है?

मैंने दुखी होकर कहा- "सर, जो तनख़्वाह मैं लेता हूँ, वह फॉरेन का क़र्ज़ है. स्कूल में दूध, फुटपाथ से ख़रीदा हुआ कोट, फ़ॉरेन फ़िल्मों का घटिया हिंदीकरण, सब कुछ फॉरेन है."

होली, दीवाली, पत्नी के चेहरे की मुस्कराहट, स्मगल्ड लगती है. महीने के आख़िरी दिनों में मिलने आया सगा भाई भी फ़ॉरेनर लगता है.

साँसें और जिस्म सिर्फ़ अपना है, बाकी सब कुछ फॉरेन है.

मैं समझता था गिरफ़्तार हो जाऊँगा. नाम कमाऊँगा.

पर तभी किसी ने मेरे कान के पास हँसकर कहा - "उठो. कैसे-कैसे सपने देखते हो कि नींद में भी आँखें गीली हो उठती हैं?"

हमारे तुम्हारे जैसे मामूली आदमी के घर भूख-ग़रीबी पड़ सकती है. बेकसी- बेरोज़गारी पड़ सकती है. बीमारी-महामारी पढ़ सकती है.

छापा नहीं पड़ सकता.

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