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जब दूल्हे इतने महंगे नहीं थे... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आपको हमारी क़सम मित्रों, बस एक बार ग़ौर से हमारी फ़ोटो देखो! लगता है न जैसे किसी पुरानी, बेहद ख़ूबसूरत बोतल का टूटा हुआ सा ढक्कन हो? मगर हाँ, एक़ ज़माना या इस खण्डहर का भी. सास बनने योग्य महिलाएं, राह चलते पलट-पलट कर देखती थीं और एक ठंडी आह भरती थीं- हाय. यह हीरा किस के हाथ लगेगा? उन दिनों देश नया-नया आज़ाद हुआ था और निहायत उम्दा सस्ते, टिकाऊ, मजबूत और आज्ञाकारी क़िस्म के दूल्हे मुनासिब कीमत पर मिला जाया करते थे. उन दिनों दूल्हे और भैंस के बाज़ार भाव में स़िर्फ पाँच रूपये का फर्क़ था. अक्सर ऐसा होता था कि कन्या का पिता रूपये बांध कर निकलता था वर ढूंढने और आता था भैंस ख़रीद कर. दूल्हा भला या भैंस..? वह जानता था कि अच्छी नस्ल की भैंस कभी-कभी ही मिलती है, जबकि दूल्हे की न कोई नस्ल होती है और न ही उससे गोबर उपलब्ध होता है. कभी भी एकाध साइकिल या सिलाई की मशीन ज़्यादा देकर हासिल किया जा सकता है(उन दिनों)... मैं भी कुछ इसी तरह अपनी ससुराल वालों के हाथ लगा था. जिस कन्या में मैं इन्ट्रेस्टेड था, वहाँ एक साइकिल कम मिल रही थी. पिताजी साइकिल में ज़्यादा इन्ट्रेस्टेड थे. उन दिनों यह देश थोड़ा अनकल्चर्ड था और बेटे बाप की बात मान लिया करते थे. सो मैं भी उसी खूंटे से बांध दिया गया जहाँ पिता जी चाहते थे. कितना पिछड़ा हुआ था यह देश दूल्हों की मार्केट वैल्यू में. मुझे भी कमबख्त उन्हीं दिनों जवान होना था? आज दूल्हों की लेटेस्ट प्राइस पर नज़र डालता हूँ तो मन चटक जाता है. इसे कहते हैं तरक्क़ी. दूल्हे की परिभाषा दूल्हा वह जो दुह लाए. दुह..ला. और दुल्हन वह कि दूह..लिहिन. यानी जिस के बाप को निचोड़ लिया गया हो नीबू की तरह. मुझे विश्वस्त सूत्रों से दूल्हों के रेट पता लगे. डाक्टर और इंजीनियर तीन लाख... सरकारी नौकरी में लगा पोस्ट ग्रेज्युएट डेढ़ लाख... कहीं नहीं लगा पोस्ट ग्रेज्युएट... एक लाख. सिर्फ ग्रेज्युएट 75 हजार. इसके नीचे कोई ज़िक्र नहीं. यानी जो ग्रेज्युएट नहीं है उसे जवान होने का कोई हक़ नहीं. इसीलिए कहते है कि मन लगा कर पढ़ो. मेज़ पर चाकू गाड़ कर इम्तहान दो. बनियाइन पर पूरी किताब नक़ल करके ले जाओ...अगर ग्रेज्युएट न हुए तो पड़े रहोगे दूल्हा मंडी में सड़े हुए ख़रबूज़े जैसे, और कोई भैंस भी सूंघने नहीं आएगी. आपकी दुआ से मैं पोस्ट ग्रेज्यूएट भी हूँ... अच्छी सर्विस में भी हूँ.. अपनी क़ीमत जोड़ी... डेढ़ लाख नक़द. घड़ी, अंगूठी, स्कूटर फ्री. साथ में एक बीवी भी? मन में रम्बा सम्बा बजा. अब अगर रिडक्शन सेल में 50 परसेंट छूट देकर भी ख़ुद को निकाल दूं तो 75 हज़ार. है न? आप इसी पर चिढ़ रहे हैं न कि मेरी उम्र ज़्यादा है. मैं चार बच्चों का बाप हूँ. सैकिन्ड हैंड हूँ. सो व्हाट? 50 परसेंट की छूट काहे को दे रहा हूं? जूते पर भी तभी छूट मिलती है जब डिफ़ेक्टिव होता है. पर डिब्बे में आकर तो नया लगता है न. मैं भी घोड़ी पर सज-धज कर, तलवार वग़ैरा बांधकर बैठ जाऊंगा तो एक दम फ़ैक्ट्री फ्रेश लगूंगा. न जाने कहाँ से मेरे इरादे की ख़बर मेरे दोस्त मिर्ज़ा मियां को लग गई. लपके हुए आए और सोफ़े पर उकड़ूं बैठ गए. मैं उस वक़्त खिज़ाब से मूंछों को मुंह काला करके, दिसम्बर में मार्च बनने की कोशिश कर रहा था. मिर्ज़ा ने आह छोड़ी और बोले-"मैं ख़र्च हो जाऊं दुनिया से. यह ख़िज़ाब? जनाज़े को इस क़दर सजाया क्यों जा रहा है?" हम ने लजाकर दूल्हों की रेट लिस्ट वाला पेपर मिर्ज़ा को थमा दिया... मिर्ज़ा ने पढ़ा और बोले- "वह तुम्हारा बड़ा वाला छोकरा तो अभी ग्रेजुएट भी नहीं हुआ. क्या क़ीमत लगेगी? " मैंने चिकोटी काटी-"चुप. अंडे को कहाँ बीच में ले आया? मुर्ग़े के बारे में सोच."... इतना सुनते ही मिर्ज़ा भड़क गए. बोले-"ओह, तो आप अपनी मय्यत को घोड़ी पे बिठाने का इरादा रखते हैं. मैं भी तो सुनूं कि वह कौन है जिसे सात फेरों के फ़ौरन बाद बेवा हो जाने का शौक़ चर्राया है? ज़रा भाभी को भी ख़बर कर दूं." मैंने लपक कर मिर्ज़ा को दबोचा.-"चुप चुप... मैं तो मज़ाक कर रहा था". सोच रहा था कि अगर ख़ानदान वाले हमारे ग्रेट ग्रांड फ़ादर की शादी देर से करते तो हम भी क्रमशः देर से पैदा होकर 2004 में जवान होते. दूल्हा मंडी में किस क़ीमत पर बिकते? पूरे डेढ़ लाख, मिर्ज़ा" इतना सुनते ही मिर्ज़ा की आंखे नम हो गई. बोले-"यार मेरे, यह क्या आग लग गई है ज़माने को? दूल्हा ट्रक और लारी का क़ीमत पर बिक रहा है. अपनी ही मांग का सिंदूर ख़रीदने को कोई लड़की उम्र भर भी नौकरी करे तो डेढ़ लाख इकट्ठे नहीं कर सकती." मैंने मिर्ज़ा का मन हल्का करने को कहा-"छोड़ यार, जब पांचे आने किलो का प्याज़ पांच रूपये जा पहुंचा तो दूल्हा क्या प्याज़ से भी सस्ता है? सच पूछो मिर्ज़ा तो दूल्हा और प्याज़ एक जैसे हैं. प्याज़ कटता है तो आंखों में आंसू आ जाते हैं. दूल्हा ख़रीदने को बेटी का बाप कटता है तो उसकी आत्मा तक कराह उठती है." मिर्ज़ा छड़ी के सहारे धीरे-धीरे बाहर चले गये. मैं सोचता रह गया इस देश के भावी दूल्हों के बारे में जो खड़े हैं सजे-धजे. वज़न की मशीन जैसे. सही रक़म अंदर डालो तब वह टिकट बाहर आएगा, जिस पर किसी कन्या का भाग्य लिखा होगा. वरना तेल की बोतल, स्टोव की लपट, साड़ी के फंदे, ज़हर की गोलियां. सब कुछ उपलब्ध है इन कुंआरी कन्याओं का सुहाग सिंदूर सजाने को. |
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