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मूँछ नहीं तो कुछ नहीं! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यूँ तो पूरे शहर में हमारा घराना थर्ड क्लास और लल्लू पँजू गिना जाता था, मगर एक चीज़ की हनक थी कि लोग डरते-डरते दर्शनार्थ आया करे थे! क्या चीज़? मूँछ! रिश्तेदारी में हमारा घर 'मूँछ वालों का घर' के नाम से मशहूर था. दादा जी बेहद खौफ़नाक पाव भर की मूँछ रखते थे जो भेड़िये की दुम के सिरे जैसी घनी थी और थोड़ा नीचे झुक कर ऊपर उठ गई थी.... कमर पर तलवार बांध दी जाती तो दादा जी को देखकर अकबर-ए-आज़म का धोखा होता. मूँछ दर्शन को आए लोग ठंडी साँस भरकर कहते थे- हाय, अब ऐसी मूँछ- इंडिया में क्यों नहीं पैदा होती? पारिवारिक इतिहास साक्षी है कि दादी की सेहत से ज़्यादा दादा जी अपनी मूँछ की हेल्थ का ध्यान रखते थे. रात में कटोरा भर मलाई खाते पर आधी मलाई मूँछों के हिस्से में आ जाती थी. परिवार के हर सदस्य को सख़्त ताक़ीद थी कि कबाब, पराँठा या हलुवा जैसी चिकनी चीज़ें खाने के बाद घर वाले अपने हाथ तौलिया की बजाय दादा जी की मूँछ में पोंछें ताकि शाइन बनी रहे... समय आने पर दादा जी अपनी मूँछों समेत दुनिया से ख़र्च हो गए और अर्थी पर सारे हार और फूल उनकी मूँछ पर चढ़ाए गए. घर में मूँछो का फ़ोटो टंग गया. मूँछों का व्रत पिता जी का दौर आया. वह अपनी मूँछ मोम और जाने किस-किस लोशन की मदद से ठीक दस बजकर दस मिनट पर खड़ी रखते थे. अम्मा करवा चौथ पर बाबू जी की मूँछों का व्रत रखती थीं कि घड़ी की सुइयाँ नीचे न सरकने पाएँ. अब जो हमारी शादी मुबारक का मौक़ा आया तो खुदा क़सम, बारातियों की मौजूदगी में, दुल्हन ने हमें भर आँख देखा भी नहीं और ख़ुशी से उछल कर वरमाला हमारी ठीक सवा नौ बजाती मूँछों पर डाल दी. बक़ाया केपी सक्सेना पर वह शादी के बाद फ़िदा हुईं और उम्र भर हमारी मूँछों पर मरती रहीं, अक्सर प्यार में कहती थीं, 'मूँछ हो तो आपकी जैसी' घनी, झबरी या झाड़ू छाप रखने से क्या फ़ायदा? कौन से मरे फल लगने हैं मूँछों की झाड़ी में. यू प्लीज़ कीप अप योर नाइन- फ़िफ़्टीन स्टाइल.' उन दिनों आई लव यू कहने का रिवाज नहीं था. वरना कह उठतीं डियर, आई लव योर मुस्टैशेज़ ओनली....' धीरे-धीरे हमारी मूँछ की सुइयाँ सफ़ेद होने लगीं. बीवी अक्सर लाड़ में मूँछों पर काजल का टीका लगा देती थीं कि इन सफ़ेद मूँछों को किसी की बुरी नज़र न लगे. साहबज़ादे की मूँछ आज जो हमारे इकलौते वन पीस नूरचश्म साहबज़ादे उम्र को आ लगे तो हमें चिंता सवार हुई कि कहीं उनकी मूँछें ग़लत राह न पकड़ लें और घराने की आबरू पर गोबर न आ गिरे. हमने डरते-डरते उनकी माँ को बुलाया और पूछा, 'आपके प्रिंस कहाँ हैं? ज़रा उनसे दो बातें करनी हैं. वे बोलीं, 'अभी-अभी कालेज में हड़ताल कराकर और एकाध बस फूँक कर थका माँदा लौटा है. ज़रा सो रहा है. बात क्या है?
हमने कहा, 'प्रभु कृपा से अब उनकी नाक तले टेरेलीन जैसी नर्म महीन मूँछ उगने लग पड़ी है. सोचा कि लाओ ज़रा उनकी मूँछ की प्लानिंग और डेवलपमेंट कर दें. तुम जानो कि मूँछ ही हमारे ख़ानदान की शान है.' थोड़ी देर बाद साहबज़ादे जम्हाइयाँ लेते और कोई ऐंगा बैंगा सा फ़िल्मी गाना गुनगुनाते दाख़िल हुए. हमारी नज़र उनके चेहरे पर पड़ी. घबराहट के मारे हम जैसे रेत में धँसते चले जा रहे थे. बाप दादों की मूँछ की अज़मत जैसे चूहे कुतरते जा रहे थे. मूँछ के नाम पर नाक तले दोनों तरफ़ जैसे मरी हुई चुहिया की दुम लटकी थी. बीच में सफ़ाचट. दुखी स्वर में पूछा, 'आपकी बाक़ी मूँछ कहाँ है? वे बोले, 'डैडी, टोटल मूँछ इतनी ही है. मूँछ भी कोई ग़ैरमुनासिब धन है जिसे चुपचाप स्विस बैंक के लाकर में रख दूंगा? दिस इज़ चाइनीज़ स्टाइल आफ़ मूँछ, डैड.'... हमने सिर पीट लिया. दहाड़ कर कहा, 'नामाक़ूल, यह मूँछ है या छिपकली की कटी हुई पूँछ है?... फ़ोटो में अपने परदादा की गबरू मूँछ देख. दादा की टेन बाई टेन मूँछों पर नज़र डाल. मेरी मूँछ देख. इस उम्र में भी राइट टाइम सवा नौ बजा रही है.... और तेरी यह नाक़िस मूँछ उठती जवानी में ही लटक कर साढ़े छह बजा रही है? लानत है.' साहबज़ादे चुपचाप बाहर हो गए. मेरा दुख भाँप कर पत्नी ने समझाया, 'क्यों दुख करते हो? हर युग की हवा का रुख़ अलग होता है. आज जब कि ईमान, इंसाफ़, धर्म, भाईचारा, हमदर्दी, अहसास, संवेदना, इंसानियत, सच्चाई... सब कुछ गड्ढे में जा रहा है तो मूँछ कहाँ तक उठी रह सकती है? मुझे यही ख़ुशी क्या कम है कि मेरी होली, दीवाली, ख़ुशी, करवा चौथ... इन सवा नौ बजाती अधेड़ मूँछों से ज़िंदा है...' मैंने उसकी नम आँखें पोंछ दीं.... |
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