'तमाशा' तमाशे से कहीं ज्यादा'

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फिल्मः तमाशा,
फिल्मकारः इम्तियाज़ अली
कलाकारः रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण
रेटिंगः ***1/2
एक समीक्षक के रूप में फिल्म देखते हुए एक ही बात दिमाग में आई, “अरे, ये कैसे भाव हैं?” मैं फिल्म की हिरोइन दीपिका पादुकोण के बारे में बात कर रहा हूं.
हालांकि ये फिल्म लगभग पूरी तरह रणबीर कपूर पर केंद्रित है. वे फिल्म में पूरे फॉर्म में हैं.
फिल्म में उनका किरदार ऐसा है जो इस दबाव के साथ बड़ा होता है कि उसे इंजीनियर या एक कॉरपोरेट ऑफिसर बनना है. वो बचपन की मासूम बदमाशियों और छोटी छोटी बातों को मिस करता है.

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आजकल कई बॉलीवुड मूवी (3 इडियट्स, रॉक ऑन, वेक अप सिड आदि) में एक ओर तो 'पैशन' पर खूब ज़ोर दिया गया वहीं दूसरी ओर इनमें इंजीनियर, बिजनेस मैनेजमेंट या डॉक्टरी जैसे पेशों की आलोचना भी है.
ये फिल्म मुझे ये विश्वास करने के लिए उकसाती हैं कि वो ज़रूर एक ऐसा बच्चा होगा जिसका गणित और भौतिक विज्ञान सच में अच्छा होगा और वो इंजीनियर बनना चाहता होगा.
लेकिन उसके माता-पिता उस पर एक कलाकार बनने का दबाव डालते हैं! लेकिन नहीं, पर इस फिल्म का केंद्र अकेला 'पैशन' ही नहीं है.
फिल्म शुरू होती है लड़की (दीपिका पादुकोण) और लड़के (रणबीर कपूर) के छुट्टियों में अचानक टकराने से. फिर उनके बीच बड़ी जल्दी एक जानदार केमेस्ट्री बन जाती है.
वे तय करते हैं कि एक दूसरे के जीवन के बारे में कोई बात नहीं करेंगे. फिर ये छुट्टी रोमांस में बदल जाती है.
दोनों एक साथ ढ़ेर सारा वक्त बिताते हैं. अतीत की उलझनें या भविष्य की कल्पना करने की बजाय वर्तमान में जीते हैं.

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फिल्म में छुट्टी का माहौल और जगह मुझे बर्नाडो बर्टोलुसी की जानदार मूवी 'लास्ट टैंगो' की याद दिलाती है.
होता ये है कि पेरिस में मुख्य किरदार (मर्लोन ब्रांदो, मारिया शिन्डर) मिलते हैं. वे एक दूसरे का नाम जाने बगैर साथ में खूब अच्छा वक्त बिताते हैं. शारीरिक स्तर तक.
शिन्डर पूछती है, 'वो क्या है.' ब्रांदो जवाब देते हैं, 'ये पुरुष का लिंग है. और औरत का आनंद.'
मुझे याद है दिल्ली में जब फेस्टिवल में लोगों ने ये फिल्म देखी तो इसे पोर्न कहा. सेंसर बोर्ड की राय भी इससे अलग नहीं थी.
'तमाशा' में लड़का और लड़की दोनों ही लापरवाह और मस्त अंदाज में जीने वाले हैं. और यहां भी दोनों को एक दूसरे का नाम तक नहीं पता.

लेकिन वे दोनों अपने रिश्ते को प्लैटोनिक (आध्यात्मिक) हद में ही रखते हैं. उनके बीच शारीरिक रिश्तों को लेकर तनाव दिखता है.
फिर वो समय आता है जब वे तय करते हैं कि कभी नहीं मिलेंगे और फिर दोनों अलग रास्ते पर निकल पड़ते हैं.
लेकिन लड़की लौटती है, इस उम्मीद में कि उसे वही पहले वाला लड़का मिलेगा. मगर वो पाती है कि लड़का पूरी तरह से कॉरपोरेट के बोझिल माहौल का हिस्सा बन चुका है.
उसे समझ नहीं आता कि ये कैसे हुआ? आप अपने आस-पास देखिए, खास कर पुरुषों को जो 20 से 30 साल के बीच की उम्र के हैं.
वे दोहरी जिंदगी जी रहे हैं. दिल से इंसान, लेकिन दिमाग से मशीन.
हां, बीच बीच में वे खुद को खोलते हैं. होली, नया साल, दफ्तर में वार्षिक समारोह या किसी और मौके पर.

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लेकिन इन मौकों पर भी वे एक मकसद के तहत ही खुद को एक जिंदादिल इंसान के रूप में दिखाते हैं.
फिल्म में रणबीर का किरदार भी दोहरी जिंदगी जी रहा है. एक इंसान के दो रूप हैं. ऐसा हमें अपने आस पास के रिश्तों में भी दिखाई देता है.
आप अपने साथी के सामने खुद को बेहतर से बेहतर ढंग से, जिसमें अधिकतर झूठ होता है, पेश करते हैं. और आखिर में जो हकीकत सामने आती है, वो न तो सच होता है और न ही कूल.
तमाशा एक रोमांटिक कहानी है, बहुत कुछ इम्तियाज़ अली की ही फिल्मों- सोचा न था, जब वी मेट, लव आज कल, रॉकस्टार और हाईवे की तरह

तो आपको फिल्म की विधा का पहले से ही अंदाज़ा है. फिल्म के पोस्टर पर टैगलाइन लिखी हुई है, ‘एक ही कहानी बार-बार क्यों?’ ऐसा लगता है कि निर्देशक ख़ुद पर ही हंस रहे हैं और सवाल कर रहे हैं.
इम्तियाज़ अली मामले में भी कहानी एक ही प्रकार की होती है (या विधा एक ही प्रकार की होती है) क्योंकि उन्हें पता है अपनी बात को बेहतर ढ़ग से कैसे पेश किया जाए. सारी प्रेम कहानियां जाहिर हैं ‘इश्क वाला लव’ की पुनरुक्ति ही जान पड़ती हैं.
लेकिन फिल्म में दोनों के बीच का रिश्ता बिना शक इस जगत के परे का कुछ होना चाहिए.

पर इस कल्पना में इम्तिय़ाज़ एक और ताज़गी भरी परत जोड़ देते हैं- झूमने पर बाध्य कर देने वाला संगीत जो कि एआर रहमान ने दिया है, बढ़िया गीत जो इरशाद कामिल ने लिखे हैं. फ़िल्म में अच्छे संवाद हैं और निर्देशक ने कोरसिका और दिल्ली के बढ़िया लोकेशन चुने हैं. साथ में बढ़िया अदाकारी भी देखने को मिलती है.
सच कहें तो इस फिल्म के जरिए ख़ास बॉलीवुड एंटरटेनमेंट परोसा गया है. फ़िल्म अपने आप में एक तमाशे से कहीं ज़्यादा है. फिल्म में कलाकार ख़ुद में ही व्यस्त हैं और फ़िल्म आपको देर तक बांधे रखने का काम करती है.
फ़िल्म में गहराई भी है. फिल्म के दूसरे हिस्से में जहां दिल्ली के हौज़ ख़ास में एक जगह पर दीपिका रणबीर के सामने अपने प्यार का इज़हार करते हुए भावुक हो जाती हैं– वो बेहद जानदार सीन है. मैंने हाल में ऐसा सीन किसी फ़िल्म में देखा हो, याद नहीं आता.

ह एक ऐसी घड़ी है जिसे थोड़े समय के लिए ही सही पर हर वो आदमी देखना चाहेगा जिसने चोट खाई हो और हर वो लड़की देखना चाहेगी जिसने चोट दी हो. इस घड़ी को हर कोई आसानी से पहचान सकेगा.
मैं ज़्यादा तफ़सील से बताना नहीं चाहता क्योंकि आप उसके बारे में बेहतर बता सकते हैं. इस ज़रूरत से ज़्यादा प्रचार की गए फिल्म को देखें और उसके बाद ही इसके बारे में कुछ पढ़ें.
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