हवाईज़ादा: बेकार की हवाबाज़ी

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फिल्म समीक्षक
फ़िल्म: हवाईज़ादा
निर्देशक: विभु पुरी
कलाकार: आयुष्मान खुराना, मिथुन चक्रवर्ती
रेटिंग: *
हम भारतीयों का एक ऐसा तबका भी है जो ये मानता है कि नवीनतम तकनीक और विज्ञान के नए-नए आविष्कार जो भी हो रहे हैं उनमें से ज़्यादातर की नींव हमारे पुरखे पहले ही रख चुके हैं. और ये काम वो ईसा मसीह के पैदा होने से हज़ारों साल पहले ही कर चुके हैं.
इस तरह के दावे एक ख़ास किस्म की सोच से पैदा होते हैं इसलिए इन दावों पर बहस करना ही बेकार है.
लेकिन आविष्कारों के मामले में हम कहां हैं? टेलीफ़ोन से लेकर हवाई जहाज तक के आविष्कार क्या हमने किए हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये आविष्कार करने के बाद हमने इन्हें कचरे के डब्बे में डाल दिया हो?
कहानी

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फ़िल्म में भारतीय वैज्ञानिक शास्त्री (मिथुन चक्रवर्ती) वेद के प्रकांड पंडित हैं और नई-नई पहेलियां सुलझाने में लगे हैं.
उनका एक बड़ा क़ाबिल शिष्य है तलपड़े (आयुष्मान खुराना).
दोनों एक मिशन में लगे हुए हैं. उनका मक़सद है ऐसी मशीन बनाना जिससे इंसान उड़ सके.
इन शास्त्री जी के पास एक प्राचीन पांडुलिपि है जिसमें हवाई जहाज बनाने की पूरी विधि लिखी हुई है. लेकिन अंग्रेज़ इस पांडुलिपि के पीछे पड़े हैं. क्यों?

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क्योंकि अंग्रेजी नहीं चाहते कि कोई भारतीय ये महान आविष्कार कर सके. वर्ना वो दुनिया को ये कैसे जता पाएंगे कि भारतीय 'मूर्ख' होते हैं इसलिए अंग्रेज़ों का उन पर शासन करना ज़रूरी है वर्ना वो अपने ही देश को तबाह कर देंगे.
अंग्रेज़ उस पांडुलिपि को फाड़ डालते हैं (और फिर ख़ुद हवाई जहाज़ बना डालते हैं).
साल 1903 में बेचारे राइट बंधु बेकार में ही इस बात को लेकर उत्साहित हो गए कि उन्होंने हवाई जहाज़ का आविष्कार किया है.
उन्हें पता ही नहीं था कि महाराष्ट्र में कुछ साल पहले इन तलपड़े महाशय ने पहले ही इस कारनामे को अंजाम दे दिया है. (फ़िल्म में यही दिखाया गया है)
महंगे सेट, बेकार अभिनय

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आयुष्मान खुराना ने तलपड़े की भूमिका निभाई है और विक्टोरिया युग के कपड़े पहने हैं.
वो 1890 के मुंबई में रहते हैं. फ़िल्म की सेट डिज़ाइनिंग कुछ ऐसी है कि संजय लीला भंसाली भी शर्मा जाएं.
ये सेट जितने नकली लगते हैं कलाकारों का अभिनय भी उतना ही नकली है.
फ़िल्म के संवादों में मराठी टच देने की कोशिश की गई है. फ़िल्म पर ख़ासा पैसा खर्च किया गया है.
मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इतनी उबाऊ फ़िल्म में कोई इतना पैसा कैसे लगा सकता है?
हो सकता है कि इस फ़िल्म को ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया जाय.
लेकिन क्या पता? वैदिक काल में भारतीयों ने हो सकता है कई अकेडमी अवॉर्ड्स पहले ही जीत रखे हों और हमें उसके बारे में पता ही नहीं.
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