कितना लुभाएगी अक्षय की 'बेबी'

बेबी

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    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फिल्म समीक्षक

फ़िल्म: बेबी

निर्देशक: नीरज पांडेय

कलाकार: अक्षय कुमार, अनुपम खेर

रेटिंग: ***

इस फ़िल्म में अक्षय कुमार हैं जिनका एक तय प्रशंसक वर्ग है. फ़िल्म कैसी भी हो उन्हें चाहने वाले उनकी फ़िल्म देखने ज़रूर आते हैं.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उनकी हर फ़िल्म हिट होती है, कुछ फ़्लॉप भी होती हैं.

अक्षय कुमार, तापसी पन्नू

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और कभी-कभी मुझे लगता है कि अक्षय जब पीछे मुड़कर देखेंगे तो शर्मिंदा हो जाएंगे कि उन्होंने किस तरह की फ़िल्में कीं. लेकिन इसके लिए उन्हें पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ये उनके फ़िल्म निर्देशकों की ग़लती है.

कलाकार

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अब इस फ़िल्म की बात करें तो इसमें लंबे समय बाद केके मेनन दिखेंगे. राना डुग्गुबाटी हैं (जो फ़िल्म में एक-दो लाइन बोलने के लिए हैं), तापसी पन्नू हैं. अनुपम खेर हैं (जो महज़ चंद मिनटों के लिए आते हैं, लेकिन अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं).

पाकिस्तानी फ़िल्म 'बोल' में काम कर चुके ज़बरदस्त पाकिस्तानी कलाकार राशिद नाज़ हैं, जिन्होंने फ़िल्म में हाफ़िज़ सईद का रोल किया है.

ये फ़िल्म हर मायने में 'स्टार ड्रिवन' है लेकिन फिर भी फ़िल्म का हर किरदार अपने आप में अनोखा है जो कि क़ाबिले-तारीफ़ बात है.

प्लॉट

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हीरो का लक्ष्य बड़ा साफ़ है. वो लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी हमलों को रोकना चाहता है.

फ़िल्म का प्लॉट, नीरज पांडेय की पिछली फ़िल्म 'स्पेशल 26' की तरह सारगर्भित नहीं है.

इसमें लॉजिक, या गंभीर वास्तविकता नहीं है.

किरदार

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अक्षय कुमार का किरदार इस्तांबुल, काठमांडू और सऊदी अरब में घूमता रहता है. उसे देखकर हॉलीवुड की 'आर्गो' की याद आती है.

वो कई अंडर कवर ऑपरेशंस को अंज़ाम देता है, ये जानते हुए भी कि अगर वो पकड़ा जाएगा तो उसकी सरकार भी उसे बचाने नहीं आएगी. लेकिन ये किसका जासूस है ये साफ़ नहीं है.

जैसे 'एक था टाइगर' में सलमान ख़ान और जॉन अब्राहम 'मद्रास कैफ़े' में रॉ के एजेंट होते हैं, लेकिन यहां अक्षय कुमार कौन हैं, जो मुंबई पुलिस के साथ एटीएस की टीम का नेतृत्व करते हैं और विमान में देश के गृहमंत्री सरीखे एक बेहद अहम शख़्स के साथ यात्रा भी करते हैं.

निर्देशन

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मुद्दे की बात ये है कि किसी भी पल आप निर्देशक पर सवाल नहीं उठाते. आप बस सब कुछ उसके हाथ में छोड़ देते हैं और फ़िल्म की रफ़्तार के साथ बहते चले जाते हैं.

निर्देशक नीरज पांडेय हर दृश्य में पर्याप्त तनाव पैदा करने में सफल रहे हैं.

कई डायलॉग बड़े चटपटे हैं. कॉमिक टाइमिंग भी अच्छी है. फ़िल्म के लोकेशन वास्तविक हैं और ज़बरदस्त भी.

फ़िल्म आपका ध्यान बनाए रखती है और इसमें अक्षय कुमार भी हैं. इतनी सब ख़ूबियों के साथ अक्षय कुमार? आपने आख़िरी बार कब ये बात सुनी थी.

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