ये कहानी पूरी फ़िल्मी है!

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- Author, इंदु पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"दुनिया की हर लड़की मेरी मां-बहन है, एक को छोड़ कर." ऐसा कहना है दिल्ली के शाहपुर जाट मे रहने वाले रंजीत का .
नाम भी फ़िल्मी. काम भी फ़िल्मी. उनकी ज़िंदगी की कहानी भी उतनी ही फ़िल्मी है.
वो बचपन में फ़िल्म के पोस्टर बनाते थे और अब लोगों की ज़रूरत के हिसाब से उनकी तस्वीरें बनाते हैं. रंजीत फ़िल्मों को अपना गुरु मानते हैं.
किसी के सपनों को कैनवस पर उतारना और उन सपनों मे खो जाना यही कलाकार की फ़ितरत होती है.
हेंड पेंटेड पोस्टरों का चलन

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भारत में 80 के दशक तक हाथ से बनाए जाने वाले पोस्टरों का ही चलन रहा.
इन पोस्टरों में कलाकार की कल्पनाशीलता फ़िल्म की थीम को चार चांद लगा देती थी.
भारत में अलग-अलग स्थानों पर कलाकार किसी फ़िल्म के पोस्टर बनाते थे. यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने पर एक ही फ़िल्म के अलग तरह के पोस्टर भी देखने को मिलते थे.
कई बड़े कलाकारों ने फ़िल्म पोस्टर पेंट किए हैं, जिनमें मक़बूल फ़िदा हुसैन भी शामिल हैं.
कंप्यूटर ने बदला तरीका

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एक वक्त था जब सारे फ़िल्मी पोस्टर हाथ से ही बनाए जाते थे. फिर कंप्यूटर आने से पोस्टरों की शक्ल-सूरत और उन्हें बनाने का तरीका सभी बदल गया.

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साथ ही बदल गई रंजीत जैसे कलाकारों की तक़दीर. जब डिजिटल प्रिंट का दौर शुरू हुआ तो देखते ही देखते सारे पोस्टर इसी तरीके से बनने लगे.
हाथ से पोस्टर बनाने वालों का रोज़गार छिन गया और इसके साथ शुरू हो गया इन कलाकरों का संघर्ष. रंजीत के लिए भी ज़िंदगी अब संघर्ष है.

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पहले प्रमोशन का साधन पोस्टर ही थे. बहुत लोगों का मानना है कि वो फ़िल्म का पोस्टर ही था जिसने फ़िल्म 'मदर इंडिया' को हिट करा दिया.
आज भी किसी भी फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले फ़िल्म के प्रमोशन पर खर्चा किया जाता है.
दर्द भरी दास्तां

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किसी भी फ़िल्म में होता है, प्यार, दर्द और बिछड़ना. रंजीत की ज़िंदगी में ये सब हुआ है. वो बताते हैं कि उन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया.
उनकी प्रेमिका ने उन्हें छोड़ दिया. अब रंजीत अपनी ज़िन्दगी पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं और उस फ़िल्म का पोस्टर भी तैयार है. इस फ़िल्म को बनाने के लिए वो फिलहाल पैसे जमा कर रहे हैं.

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दुकान के ऊपर इनका एक कमरा है जिसमें रसोई नहीं है. दुकान के सामने पेड़ के नीचे चाय वाले की दुकान ही इनका किचन है.

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दुनिया की हर लड़की को रंजीत अपनी मां-बहन के समान समझते है, एक को छोड़ कर. वो बताते हैं कि उसने भी दगा दिया पर आज भी वो उसे प्यार करते हैं.
ज़िंदगी की सच्चाई से रंजीत का रोज़ सामना होता है. वो अब ग्राहकों के पोट्रेट बना कर दुकान का खर्चा निकालते हैं.
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