भारतीय फ़िल्में: नाम बड़े, दर्शन छोटे?

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- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
साल भर में हज़ार से ज़्यादा फ़िल्में लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम-मात्र का सम्मान और विदेशी दर्शकों को रिझा पाने में नाकामी.
भारतीय फ़िल्में भारत से बाहर अपना प्रभाव जमाने में नाकाम क्यों हैं?
ऑस्कर, गोल्डन ग्लोब जैसे अवॉर्ड फ़ंक्शन हों या तमाम फ़िल्म फ़ेस्टिवल, भारतीय फ़िल्में क्यों झंडा नहीं गाड़ पाती.
मुंबई में मंगलवार को ख़त्म हुए 16वें मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल (मामी) समारोह के दौरान कई प्रख्यात भारतीय फ़िल्मकारों ने इस पर अपनी राय रखी.
गौरी शिंदे (निर्देशक, इंग्लिश-विंग्लिश)

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भारतीय फ़िल्में बनती तो बहुत हैं लेकिन उनमें गुणवत्ता की कमी होती है. हमारे फ़िल्मों में अच्छी कहानियां नहीं होतीं क्योंकि अच्छे लेखक नहीं हैं.
भारत में स्टार, डायरेक्टर और बजट पर तो ध्यान दिया जाता है लेकिन लेखन में नहीं.
हर कोई फ़िल्मों में हीरो बनने आता है. कभी सुना है कि कोई लेखक बनने के लिए आया हो?
अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों को हम सिर्फ़ अच्छी कहानियों के बलबूते ही टक्कर दे सकते हैं.
होमी अदजानिया (फ़ाइंडिंग फ़ेनी, कॉकटेल के निर्देशक)

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भारतीय फिल्में अनोखी होती हैं. हमारी फ़िल्मों में गाने बड़े अहम होते हैं जो ज़्यादतार फ़िल्मों में अचानक ही शुरू हो जाते हैं.
यहां तो ऐसी फ़िल्में बड़ी पसंद की जाती हैं लेकिन विदेशी दर्शक और फ़िल्म विशेषज्ञ कहानी बनाने के इस ढंग को, इस संवेदनशीलता को समझ नहीं पाते.
हमारी फ़िल्मों का व्याकरण अलग होता है.
प्रीति ज़िंटा (अभिनेत्री)

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हमारे स्टाइल की फ़िल्में विदेश में पसंद आने से रहीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कहानियों वाली फ़िल्मों को हमारे यहां दर्शक मिलने से रहे.
जब तक ये संतुलन वाली स्थिति नहीं बनती, हमारी फ़िल्मों को अंतरराष्ट्रीय सम्मान और दर्शक नहीं मिलेंगे.
निर्देशक अनुराग कश्यप और अभिनेत्री हुमा क़ुरैशी भी यही मानते हैं.
विक्रमादित्य मोटवाने (उड़ान, लुटेरा के निर्देशक)

फ़िल्म बनाकर विदेश में बेचना आसान नहीं होता. अवॉर्ड पाने के लिए भी फ़िल्म को विदेश में बेचना ज़रूरी है.
विदेश में फ़िल्म दिखाने के लिए अलग डिस्ट्रीब्यूशन चैनल होता है.
हाल ही में हमारी फ़िल्म लंचबॉक्स ने विदेश में अच्छा व्यापार भी किया और सराही भी गई.
लेकिन वैसा नेटवर्क मिलना आसान नहीं होता.
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