फ़िल्म रिव्यू: वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई-दोबारा

- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
रेटिंग: **
बालाजी मोशन पिक्चर्स की 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई-दोबारा' सीक्वल है 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' का.
पहले हिस्से में सुल्तान (अजय देवगन) की मौत के बाद शोएब (इमरान हाशमी) मुंबई का डॉन बन बैठता है. ये नई फ़िल्म शोएब (इमरान हाशमी की जगह अक्षय कुमार) की प्रेम कहानी दिखाती है.
असलम(इमरान ख़ान), शोएब का सबसे भरोसेमंद आदमी है. असलम, बचपन से ही शोएब की देखरेख में है. डॉन रावल (महेश मांजरेकर), शोएब के मुंबई शहर पर दबदबे से परेशान है और उसका ख़ात्मा करना चाहता है.
शोएब, जैसमीन (सोनाक्षी सिन्हा) से मिलता है. जैसमीन एक नवोदित अभिनेत्री है जो डीके (आकाश खुराना) की फ़िल्म में काम कर रही है. सहज और सरल स्वभाव की जैसमीन, शोएब को भा जाती है.

शोएब की पुरानी प्रेमिका मुमताज़ (प्राची देसाई की जगह सोनाली बेंद्रे बहल) भी अभी उसके साथ ही है. जैसमीन, शोएब को महज़ एक अच्छा दोस्त ही मानती है. उसे नहीं पता कि शोएब एक कुख्यात डॉन है, ना ही उसे इस बात का इल्म है कि वो उसे चाहना लगा है.
उधर असलम भी जैसमीन को अंग्रेज़ी पढ़ाता है और इस दौरान उससे प्यार कर बैठता है. (हालांकि ख़ुद असलम को अंग्रेज़ी नहीं आती)
जब शोएब, जैसमीन के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है और साथ में जैसमीन को ये भी पता चलता है कि वो एक डॉन है तो जैसमीन बेहद डर जाती है.
जब शोएब को पता चलता है कि असलम भी जैसमीन को प्यार करता है तो वो बेहद परेशान हो जाता है. एक तरफ़ तो डॉन रावल उसे मारने की फिराक में है, दूसरी तरफ मुंबई पुलिस भी उसके पीछे पड़ी है और अब उससे बेहद जूनियर असलम उसी लड़की से प्यार करता है जिसे वो चाहता है.
इसके बाद क्या होता है ? जैसमीन असल में किसे चाहती है, असलम को या शोएब को ? शोएब और असलम के बीच क्या जैसमीन को लेकर तकरार होती है ? रावल का क्या होता है ? क्या पुलिस शोएब को पकड़ पाती है ? यही आगे की कहानी है.

रजत अरोरा की कहानी सिर्फ़ शोएब की प्रेम कहानी और उसके प्रेम प्रसंगों पर फ़ोकस है. इसमें बतौर डॉन उसके क्रियाकलापों का ज़्यादा ज़िक्र नहीं है. जिन लोगों ने 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' देखी है और जो इसे, उस फ़िल्म के सीक्वल के तौर पर देखने आएँगे उन्हें निराशा हाथ लगेगी. क्योंकि पहले हिस्से में सुलतान और शोएब के प्रेम प्रसंगों के अलावा उनकी आपराधिक गतिविधियां भी दिखाई गई थीं, जिनकी वजह से फ़िल्म में रोमांच बना रहता है.
'वंस अपॉन अ टाइम इऩ मुंबई-दोबारा' सिर्फ निजी रिश्तों पर ही आधारित होकर रह गई है. हां फ़िल्म में दिखाई गई प्रेम कहानी ज़रूर दूसरी फ़िल्मों से ख़ासी अलग है. लेकिन स्क्रीनप्ले में रोमांच और रफ़्तार की कमी है.
हालांकि ड्रामा कुछ हद तक दर्शकों को बांधे रखता है लेकिन कई कई जगह पर दोहराव की वजह से दर्शकों को बोरियत का एहसास होने लगता है. असलम और जैसमीन के बीच के दृश्य बिलकुल प्रभावी नहीं बन पाए हैं.
जैसमीन और शोएब के बीच के सीन जितने अच्छे हैं वो बात असलम (इमरान) और जैसमीन (सोनाक्षी) के बीच नज़र नहीं आती. असलम (इमरान ख़ान) की कॉमेडी भी ख़ासा बोर करती है.

हालांकि रजत अरोरा की कहानी और स्क्रीनप्ले में दम नहीं है लेकिन उनके लिखे डायलॉग बेहद असरदार बन पड़े हैं. संवादों में ज़्यादा कॉमेडी और ड्रामा है बजाय स्क्रीनप्ले के. अगर मैं कहूं कि फ़िल्म की मुख्य ताकत डायलॉग ही हैं तो ग़लत नहीं होगा.
अक्षय कुमार ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीक़े से निभाया है. उसके हाव-भाव बेहद असरदार हैं. उन्होंने शोएब को किरदार को अलग दिखाने के लिए ख़ासी मेहनत की है और उसका असर भी दिखता है.
असलम के किरदार में इमरान ने भी अच्छा काम किया है लेकिन उन्हें अपनी कॉमेडी पर ख़ासा काम करने की ज़रूरत है. सोनाक्षी सिन्हा ने अपने रोल को बखूबी निभाया है और जैसमीन के किरदार में बहुत जंची हैं. वो भावुक दृश्यों में शानदार लगी हैं और जहां उन्हें मासूम दिखना था वहां वो बेहद क्यूट लगी हैं.
पितोबाश त्रिपाठी डेढ़ टांग के रोल में अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे हैं. शोएब के भरोसेमंद साथी जावेद की भूमिका में सरफ़राज़ ख़ान भी अच्छे रहे.
विद्या बालन ने एक गाने में बेहद छोटी सी अतिथि भूमिका की है. सोफ़ी चौधरी अपने छोटे से ग्लैमरस रोल में जमी हैं. बाकी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है.
मिलन लूथरिया ने फ़िल्म में प्रेम त्रिकोण को अच्छे से दर्शाया है. उनका निर्देशन अच्छा है लेकिन फ़िल्म के लिए उन्होंने एक कमज़ोर विषय का चुनाव किया. प्रीतम का संगीत कमज़ोर है, लेकिन दो गाने, 'ये तूने क्या किया' और 'चूड़ियां' अच्छे हैं.

'अमर अकबर एंथनी' के सुपरहिट गाने 'तैय्यब अली' का रीमिक्स संस्करण भी सुनने लायक है.
रजत अरोरा के लिखे गानों के बोल अच्छे हैं. जावेद अजीज़ के कोरियोग्राफ किए फ़िल्म के गिने चुने एक्शन दृश्य अच्छे हैं लेकिन दर्शकों को और ज़्यादा एक्शन की उम्मीद थी.
कुल मिलाकर 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा' एक औसत फ़िल्म है. फ़िल्म में अभिनय और डायलॉग में दम है लेकिन 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' के सीक्वल से जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हो पाई.
फ़िल्म में एक्शन की भी कमी है जो इसका एक और कमज़ोर पहलू है. फ़िल्म छुट्टी के दिन यानी 15 अगस्त को रिलीज़ हुई जो इसे फ़ायदा दे सकता था लेकिन मल्टीप्लेक्सेस में फ़िल्म को बेहद सीमित प्रिंट्स के साथ गुरुवार को रिलीज़ करने की योजना इसके व्यापार पर बुरा असर डालेगी.
मुस्लिम बहुल इलाकों में फ़िल्म का व्यापार अच्छा हो सकता है. कुल मिलाकर बॉक्स ऑफ़िस पर इसके चलने की उम्मीद कम है और इसकी भारी भरकम लागत को देखते हुए ये बमुश्किल ही अपनी लागत निकाल पाएगी.
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