फिल्म रिव्यू: डी-डे

- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
'डी-डे' कहानी है एक ख़तरनाक आतंकवादी गोल्डमैन (ऋषि कपूर) की, जो पाकिस्तान में अपना अड्डा बनाए हुए है.
भारत की खुफ़िया एजेंसी रॉ उसे वापस लाने की हर मुमकिन कोशिश में लगी हुई है क्योंकि भारत में गोल्डमैन 'मोस्ट वॉन्टेड' है.
अश्विनी राव (नासिर) रॉ के एक सीनियर अफसर हैं जिन्होंने चार अंडर कवर एजेंट गोल्डमैन को वापस लाने के लिए कराची भेजे हैं.
एजेंट वली ख़ान (इरफ़ान) अपनी पत्नी नफ़ीसा (श्रीस्वरा) और बेटे कबीर के साथ कराची में एक नाई के तौर पर रहता है. दूसरा एजेंट रुद्र (अर्जुन रामपाल) है वो एक वेश्या (श्रुति हासन) के पास जाता है और धीरे-धीरे उसे उससे प्यार हो जाता है.
तीसरी एजेंट ज़ोया (हुमा क़ुरैशी) है और चौथा असलम (आकाश दाहिया) है जो गोल्डमैन के ड्राइवर के तौर पर काम करता है और उसका भरोसा जीत लेता है.

ज़ोया एक दिन कराची के आलीशान होटल में पहुंचती है जहां गोल्डमैन के बेटे और एक पाकिस्तानी क्रिकेटर जहांगीर की बेटी का आलीशान निकाह समारोह हो रहा होता है. काफी सुरक्षा होने के बावजूद चारों एजेंट गोल्डमैन को पकड़ने में लगभग कामयाब हो जाते हैं.
लेकिन रुद्र जैसे ही उसे मारना वाला होता है वली खान उसे रोक देता है. क्योंकि उसका सपना है गोल्डमैन को ज़िंदा भारत ले जाना. इसी आपा-धापी में उनका प्लान फेल हो जाता है और गोल्डमैन बच निकलता है.
पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारी चारों एजेंट्स के पीछे पड़ जाते हैं. चारों की हैरानी का ठिकाना नहीं रहता जब भारत सरकार भी ये मानने से इनकार कर देती है कि ये उनके एजेंट्स हैं.
आगे क्या होता है? क्या चारों एजेंट गोल्डमैन को पकड़ने में कामयाब हो जाते हैं. यही फ़िल्म की कहानी है.
दाऊद से प्रेरित

सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि फ़िल्म की कहानी दाऊद इब्राहिम से प्रेरित है. इसी वजह से दर्शक कहानी से बिलकुल जुड़े रहते हैं.
किरदारों के नाम में बदलाव कर दिए गए हैं लेकिन गोल्डमैन के जीवन में घटी सारी घटनाएं दाऊद की तरफ ही इशारा करती हैं.
इससे पहले इतने स्पष्ट तौर पर दाऊद की कहानी शायद कभी नहीं भारतीय पर्दे पर दिखाई गई.
निखिल आडवाणी, रितेश शाह और सुरेश नैयर की कहानी काफी बांधे रखती है. स्क्रीनप्ले भी काफी सधा हुआ है.
कसी कहानी
आम मसाला फ़िल्मों वाला मनोरंजन इसमें भले ही ना हो लेकिन दर्शकों को सीट पर बांधे रखने के लिए ये काफी है.

फ़िल्म दाऊद को पकड़ने के प्रयास से शुरू होती है फ़िर फ्लैशबैक में चली जाती है. फ़िल्म में हल्के फुल्के दृश्यों और हास्य की कमी है लेकिन शायद विषय की गंभीरता को बनाए रखने के लिए लेखक ने जान बूझकर ऐसा किया हो.
वली ख़ान और उसके बीवी-बच्चे का ट्रैक और रुद्र की लव स्टोरी फ़िल्म की 'इमोशनल अपील' भी बनाए रखते हैं.
आखिरी का आधा घंटा बेहद मनोरंजक और बांधे रखते है. ये हर तरह के दर्शकों को पसंद आएगा. क्लाइमेक्स बेहद शानदार बन पड़ा है.
फ़िल्म के कुछ दृश्य इतने अच्छे बन पड़े हैं कि दर्शकों में देशभक्ति की भावना जागृत हो जाएगी.
रितेश शाह और निरंजन आयंगर के लिखे संवाद शानदार हैं.
अभिनय
पिछली कई फ़िल्मों से ऋषि कपूर लगातार अपने अभिनय से लोगों को अचरज में डाल रहे हैं. एक बार फ़िर से उन्होंने ज़बरदस्त अभिनय किया है.
उन्होंने गोल्डमैन जैसे दुर्दांत अपराधी का किरदार कुछ इस तरीके से निभाया है कि यक़ीन नहीं आता कि ये वही ऋषि कपूर हैं जो कभी बॉलीवुड के 'लवर ब्वॉय नंबर 1' हुआ करते थे.

मराठी में बोले उनके कुछ डायलॉग तो बेहद ही शानदार बन पड़े हैं.
इरफान के रूप में हमारे पास एक विश्व स्तरीय अभिनेता है और इस बार भी उन्होंने बिलकुल निराश नहीं किया है.
अर्जुन रामपाल ने एक शांत रॉ एजेंट की भूमिका में बेहतरीन अभिनय करके सबको हैरत में डाला है.
हुमा क़ुरैशी ने भी बहुत ही सधा हुआ अभिनय किया है. श्रुति हासन बहुत ख़ूबसूरत लगी हैं और अपने रोल को भी उन्होंने अच्छे से निभाया है.
असलम के रोल में आकाश दाहिया भी बेहतरीन रहे हैं. रॉ ऑफ़िसर अश्विनी राव के रोल में नासिर बहुत प्रभावशाली लगे हैं.
इस मायने में देखा जाय तो कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबरा की तारीफ़ करनी होगी.
निर्देशन
निखिल आडवाणी का निर्देशन आला दर्जे का है. उन्होंने एक जटिल विषय को बहुत ही परिपक्व तरीके से उठाया है.
तकनीक तौर पर भी फ़िल्म बहुत मज़बूत है.
कुल मिलाकर 'डी-डे' एक देखने लायक फ़िल्म है, लेकिन शायद ये परिपक्व दर्शकों को ज़्यादा पसंद आएगी.
इस वजह से फ़िल्म को बड़े पैमाने पर अच्छी ओपनिंग नहीं मिल पाई है.
हां जो लोग फ़िल्म को देखेंगे वो तारीफ़ करेंगे और शायद इस वजह से फ़िल्म को देखने के लिए लोग जाएंगे.
फ़िल्म बड़े शहरों और मल्टीप्लेक्स में बेहतर प्रदर्शन करेगी.
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