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शाहरुख़, सलमान और आमिर में किसको करना पड़ा है ज़्यादा संघर्ष
- Author, मधु पाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
शाहरुख़, सलमान और आमिर- बॉलीवुड के इन तीनों सुपर स्टार में क्या-क्या समानताएं हैं.
तीनों के तीनों ख़ान तो हैं, साथ ही इन तीनों की पैदाइश का साल भी एक ही है यानी 1965.
इसके अलावा एक बात ये भी है कि इन तीनों का जलवा तीन दशकों से भी लंबे समय से कायम है.
इन तीनों ने जब इंडस्ट्री में अपने क़दम जमाने की शुरुआत की थी तब आधुनिकीकरण, राम मंदिर और आर्थिक संकट इन तीनों की गूंज सुनाई पड़ रही थी.
ऐसे दौर में तीनों ख़ान बॉलीवुड में संघर्षों के बीच किस तरह अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे, इसका जिक्र वरिष्ठ पत्रकार कावेरी बमजई ने अपनी नई किताब 'द थ्री ख़ान्स: एंड द इमरजेंस ऑफ़ न्यू इंडिया' में किया है.
आधुनिकता, संस्कार और अर्थव्यवस्था के साथ आगे बढ़े
वरिष्ठ पत्रकार कावेरी बमजई ने बीबीसी हिंदी से खास बातचीत में बताया, "मुझे यह बात दिलचस्प लगी कि साल 1988 में तीनों करियर की शुरुआत कर रहे थे. ऐसे दौर में जहाँ हमारे पास सब कुछ एक ही हुआ करता था- एक चैनल, एक टेलीविज़न, एक टेलीफ़ोन, सिंगल थिएटर. ऐसे में इनके करियर के बदलाव के साथ भारत भी बदला."
"फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे', 'मैंने प्यार किया' और 'क़यामत से क़यामत तक', इन फ़िल्मों को गौर से देखें तो इन सभी फ़िल्मों में अच्छे प्रेमी, पति, बेटे के रूप में ये कलाकार नज़र आए और परदे पर मिडिल क्लास वैल्यूज़ को बख़ूबी दिखाया."
विजय की जगह राज और प्रेम ने ले ली
पहले फ़िल्मों में गांवों की समस्या, समाज में हो रहे अन्याय का बदला और ग़रीबी दिखाई जाती थी. लेकिन बदलते दौर में 'साथी हाथ बढ़ाना' ने 'दिल मांगे मोर' पर ज़ोर देना शुरू हुआ. अब सब कुछ पहले जैसा नहीं था, सब कुछ बदल रहा था.
कावेरी बमजई कहती हैं, "90 के दशक में लोग अच्छा खाना, अच्छा पहनना और दुनिया घूमना चाहते थे. पहले लोग स्विट्जरलैंड जाने के सपने ही देखा करते थे, लेकिन इनकी फ़िल्मों के ज़रिये ये आसान हुआ."
"पूरी दुनिया खुली, भारत की आईटी इंडस्ट्री फली-फूली और उसी दौर में कॉल सेंटर आ रहे थे. फ़िल्मों में विजय का कैरेक्टर प्रेम और राज में बदल गया. हम ख़ुश थे, शहरीकरण हो रहा था. लोग एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे."
"धीरे-धीरे गांव और ग़रीबी बड़े परदे से ग़ायब होती जा रही थी. फ़िल्मों में 80 के दशक में जो गुस्सा दिखता था, वो गुस्सा भी अब कम ही नज़र आता था. अगर परदे पर गुस्सा दिखता भी था, जैसे 'बाज़ीगर', 'अंजाम' या 'डर' वो निजी था न कि सामाजिक या राजनीतिक मुद्दों पर."
नायक गिटार पकड़े था तो नायिका घोड़े पर सवार
80 के दशक के उत्तरार्ध में जब लोकप्रिय हिंदी सिनेमा वीसीआर लहर के नीचे डूब रहा था, ख़ानों ने पारिवारिक दर्शकों को सिनेमाघरों में वापस खींच लिया.
कावेरी बमजई कहती हैं, "'क़यामत से क़यामत तक', 'मैंने प्यार किया' और 'दीवाना' के ज़माने में आई 'हुक़ूमत' और 'तेज़ाब' जैसी फ़िल्मों के बावजूद भी आमिर ख़ान की क्यूट हीरो वाली इमेज को लोगों ने स्वीकार कर लिया."
"जब आमिर ख़ान ने गाया, 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', तब उन्होंने एक नई पीढ़ी के लिए ये गाया था, ये पीढ़ी उम्रदराज़ हो चुके धर्मेंद्र या पर्दे पर चीख़ने-चिल्लाने वाले अनिल कपूर के साथ ख़ुद को जोड़ नहीं पा रही थी."
एक बदलाव के लिए, जैसा कि कावेरी बमजई कहती हैं, "नायक गिटार पकड़े हुए था और नायिका घोड़े पर सवार होकर पर्दे पर क़दम रखती है. वो जूही चावला ही थीं जो आमिर ख़ान को दूसरे तरीके से परखती हैं."
शाहरुख़ ख़ान ने रिस्क लिया और बन गए पोस्टर ब्वॉय
कावेरी बमजई को अपने तीस साल के पत्रकारिता करियर में तीनों ही ख़ानों के सफ़र को करीब से देखने का मौका मिला.
किस ख़ान के सफर से वो सबसे ज़्यादा प्रभावित रहीं, इस सवाल पर कावेरी कहती हैं, "सबसे बड़ी चुनौती शाहरुख़ ख़ान के सामने थी. बहुत सारे लोग आए इंडस्ट्री में. लेकिन शाहरुख़ ख़ान वो पहले शख्स हैं जो बाहर से आए थे."
"अमिताभ बच्चन भी कोलकाता से आए थे, लेकिन उनका अपना एक रुतबा था कि वो इंदिरा गाँधी के दोस्त के बेटे हैं. सब इस तरह से जानते थे. लेकिन शाहरुख़ ख़ान का इंडस्ट्री में कोई नहीं था. वो सिर्फ अपने टैलेंट के साथ आये थे."
"टेलीविज़न में अच्छा काम किया और वहां से अपने आपको निकाल बड़े परदे पर लाए. उन फ़िल्मों को किया जिन्हें सलमान और आमिर ने ना कह दिया था. 'बाज़ीगर' सलमान ख़ान को मिली थी, लेकिन उन्होंने इसे ना कह दिया था."
"दूसरी 'डर' जो पहले आमिर ख़ान को दी गई थी, लेकिन उनके मना करने के बाद ये फ़िल्म शाहरुख़ ख़ान की झोली में गिरी. शाहरुख़ ख़ान ने अपनी ज़िंदगी में रिस्क लिया."
"शाहरुख ख़ान को बॉलीवुड के पंजाबी हिंदू क्लब का साथ मिला. यश चोपड़ा, यश जौहर, आदित्य चोपड़ा और फिर करण जौहर की वजह से वे पोस्टर ब्वॉय बन गए."
ढेर सारी ग़लतियां और फ़्लॉप फ़िल्में
सलमान और आमिर के भी लंबे सफ़र को देखते हुए कावेरी कहती हैं, "आमिर और सलमान दोनों ही फ़िल्मी परिवार से आते हैं, लेकिन उनके लिए भी उनका फ़िल्मी सफर आसान नहीं था."
"आमिर के पिता हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में कभी सफल नहीं रहे और सलीम साहब ने लेखक के तौर पर ख़ूब नाम कमाया, लेकिन हमारे यहाँ लेखकों को वो मुकाम नहीं मिला जिसके वो हक़दार रहे."
"इसलिए पहली फ़िल्म मिलने के लिए इन्हें भी ख़ूब हाथ-पैर पटकने पड़े तब जाकर शुरुआती फ़िल्में मिलीं. तीनों ही ख़ानों ने पहली कामयाब फ़िल्म देने के बाद ढेर सारी ग़लतियां कीं और उनकी फ़िल्में लगातार फ्लॉप रहीं."
मीडिया से मिली नाराज़गी और आलोचना से नाराज़
सोशल मीडिया में अपनी किताब 'द थ्री ख़ान्स: एंड द इमर्जेंस ऑफ़ न्यू इंडिया' के कवरपेज को लेकर हो रही चर्चा पर कविता कहती हैं कि, "हर कोई मुझसे पूछ रहा है कि आमिर की 'लगान' वाली तस्वीर, सलमान की 'दबंग' और शाहरुख़ की 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की ही तस्वीरें क्यों चुनी?"
"ये फ़िल्में इनके करियर में एक बड़ा मोड़ साबित हुईं. इन फ़िल्मों से पहले इनसे कई ग़लतियां हुईं, लेकिन उन ग़लतियों को भुलाकर उनसे सबक लेते हुए आगे बढ़े. सलमान की मीडिया के प्रति नाराज़गी का भी मेरी किताब में ज़िक्र है."
वो कहती हैं कि "सलमान को हमेशा से ये लगता आया था कि मीडिया उन्हें पसंद नहीं करता और उनकी सबसे ज़्यादा आलोचना की जाती है. सलमान ने तो अपनी निजी ज़िंदगी में बहुत कुछ ग़लत किया."
"फिर वो सड़क पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चलाने का केस हो या फिर हिरण को मारने का. उन पर इस तरह के आरोप होने के बाद भी उनके फ़ैंस ने उन्हें बेहद प्यार किया."
अब वो दौर नहीं था जहाँ ख़ान सरनेम को बदलने की ज़रूरत हो
समाज और उसकी सोच बदल रही थी. इसलिए इन ख़ानों को अपना नाम बदलने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई.
कावेरी कहती हैं, "अब वो दौर नहीं था जहाँ नाम बदलने की ज़रूरत हो. लेकिन हाँ, अगर आप ख़ान हैं तो आपकी पहचान में धर्म सबसे बड़ा फ़ैक्टर होगा."
"आज के दौर में पहचान की राजनीति का जो दौर चल रहा है उसमें धर्म, जाति और जेंडर ये सब चीज़ें ज़रूरी हो गई हैं. लेकिन ये तीनों हमेशा इससे दूर रहे. आमिर की पत्नी हिन्दू थीं, शाहरुख़ की पत्नी हिन्दू हैं. दोनों ने ही धर्म को ख़ूबसूरती से निभाया."
"शाहरुख़ और आमिर की तरह सलमान ख़ान के फ़ैंस भी हिन्दू-मुसलमान दोनों हैं, पढ़े-लिखे कामयाब लोग और काम करने वाला वो वर्ग जो भले ही कम कामयाब हो, पर सबने इनकी सराहना की."
कावेरी ये भी मानती हैं, "ये ख़ान आम आदमी को सिंगल स्क्रीन से निकाल कर मल्टीप्लेक्स थिएटर में लाने में कामयाब रहे. ख़ानों के दौर में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली का कॉन्सेप्ट ही धीरे-धीरे ग़ायब हो गया."
'शोले' के बाद संगीत
जाने-माने ट्रेड एक्सपर्ट आमोद मेहरा की राय में, "इन तीनो ख़ानों की कामयाबी का श्रेय इनकी फ़िल्मों के संगीत के चयन पर भी है. जहाँ सब कलाकार एक्शन हीरो बन रहे थे ऐसे में ये तीनों रोमांटिक हीरो की छवि के साथ परदे पर उतरे और इनका साथ दिया इनकी फ़िल्मों के संगीत ने. इनकी फ़िल्मों में संगीत इतना दमदार था कि म्यूज़िक लोगों को थिएटर तक खींच लाया. युवाओं को रोमांटिक फ़िल्में पसंद आने लगीं और इन्होंने इस युवा पीढ़ी को टारगेट किया."
एक्शन और रोमांटिक छवि से निकल कुछ नया करना होगा
ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के दौर में इन कलाकारों के लिए आने वाले दिन क्या चुनौतीपूर्ण होंगे, इस पर आमोद मेहरा कहते हैं, "आमिर ने अपने आपको कैरेक्टर रोल में ढाल लिया है. जैसा हमने 'दंगल' में देखा. वो इस तरह की कहानियों के साथ आते रहेंगे. अब सलमान ख़ान और शाहरुख़ ख़ान को अपनी एक्शन और रोमांटिक छवि से निकल कुछ नया करना होगा वरना उन्हें बहुत मुश्किल हो सकती है."
वहीं, कावेरी का कहना है कि "इन कलाकारों का सफल दौर आगे भी रहेगा. फिर वो ओटीटी आए या कोई और प्लेटफ़ॉर्म. जब एक बार फिर थिएटर खुलेंगे, इनका जलवा बरक़रार रहेगा, लेकिन अब उन्हें पहले के मुक़ाबले कुछ नया और अलग करना होगा. दर्शकों के साथ इनका 30 साल का साथ है, इतनी जल्दी ख़त्म नहीं होगा. बस नयापन लाने की ज़रूरत रहेगी."
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