सिनेमेटोग्राफ़ी एक्ट में संशोधनों के विरोध में क्यों एकजुट है फ़िल्म इंडस्ट्री

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    • Author, नम्रता जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

नरेंद्र मोदी सरकार ने 18 जून, 2021 को सिनेमेटोग्राफ़ी एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों पर आम लोगों से सुझाव मांगे. 1952 में बने इस एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों पर दो जुलाई तक सुझाव देने थे.

आम तौर पर बंटी रहने वाली फ़िल्म इंडस्ट्री इन संशोधनों के विरोध में पूरी तरह से एकजुट नज़र आ रही है.

फ़िल्म इंडस्ट्री ने संशोधनों को लेकर अपनी आपत्तियों को सरकार के सामने रखा है. प्रस्तावित संशोधनों में से एक संशोधन को लेकर फ़िल्म इंडस्ट्री में ज़्यादा चिंता देखने को मिल रही है.

इस प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक शिकायत मिलने पर सेंसर बोर्ड से प्रमाणित फ़िल्मों के 'प्रमाणपत्र को रद्द करते हुए उनकी वापसी की अनुशंसा की गई है.'

संशोधनों का विरोध सबसे पहले युवा फ़िल्मकारों, अकादमिक विद्वानों और वकीलों ने किया जिनमें शिल्पी गुलाटी, साहाना मंजेश, प्रतीक वत्स, भार्गव रानी और मनी चंदर शामिल थे, लेकिन इनके अभियान को फ़िल्म इंडस्ट्री के नामचीन लोगों का भी समर्थन मिला. इनमें युवा और बुज़ुर्ग, हर तरह के कलाकार शामिल हैं.

बॉलीवुड के अलावा क्षेत्रीय सिनेमा में भी संशोधनों का विरोध किया जा रहा है. इन सबको थिएटर, कला और सिविल सोसायटी के अलावा समाज के दूसरे पेशेवर तबके का भी समर्थन मिला है.

राजनीतिक तौर पर उत्तर भारत में इसको लेकर बहुत चर्चा भले ही देखने को नहीं मिली हो लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इन संशोधनों का विरोध करते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिखा है.

फ़िल्म थियेटर

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संस्थाएं कर रहीं विरोध

फ़िल्म इंडस्ट्री की छह प्रमुख संस्थाएं- प्रोड्यूसर गिल्ड ऑफ़ इंडिया (पीजीआई), इंडियन फ़िल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स काउंसिल (आईएफ़टीपीसी), इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर एसोसिएशन (आईएमपीपीए), वेस्टर्न इंडिया फ़िल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (डब्ल्यूआईएफ़पीए), फ़ेडरेशन ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया सिने इंपलायज (एफडब्ल्यूआईसीई) और इंडियन फ़िल्म एंड टेलिविज़न डायरेक्टर्स एसोसिएशन (आईएफ़टीडीए) भी प्रस्तावित संशोधनों के विरोध शामिल हैं. अधिकांश मौकों पर ये संस्थाएं सरकार का विरोध नहीं करती हैं, लेकिन इस मामले में सब सरकार के संशोधनों का विरोध कर रहे हैं.

देश के दो शीर्ष फ़िल्म इंस्टीट्यूट, द फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया पुणे और सत्यजीत राय फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, कोलकाता के छात्र संघों ने भी एक संयुक्त बयान जारी करके कहा है कि प्रस्तावित संशोधन सिनेमाई दुनिया पर और ज़्यादा अंकुश लगाने की कोशिश है. फ़िल्मकार विशाल भारद्वाज और जाने माने अभिनेता और नेता कमल हासन ने भी इन बदलावों के विरोध में लिखा है.

बॉलीवुड

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क्या हैं विरोध के कारण

इन संशोधनों के ज़रिए सरकार की 'सुपर सेंसरशिप' की कोशिश के ज़ोरदार विरोध के कारणों को समझना मुश्किल नहीं है.

प्रस्तावित संशोधनों को 'ताबूत की आख़िरी कील' माना जा रहा है क्योंकि पहले से ही भारतीय फ़िल्मकारों को प्रतिबंध, धमकी और शत्रुतापूर्ण माहौल में काम करना पड़ रहा है, जहां वे अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकारों का पूरा इस्तेमाल भी नहीं कर पा रहे हैं.

पीएम नरेंद्र मोदी

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सरकार ने लिया यूटर्न

मौजूदा सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के बाद फ़िल्मकारों को कहीं ज़्यादा उदारवादी माहौल उपलब्ध कराने का वादा किया था, ऐसे में फ़िल्मकारों के लिए सरकार का नया क़दम निराश करने वाला है.

वैसे मौजूदा केंद्र सरकार ने फ़िल्म इंडस्ट्री की इच्छा के मुताबिक जीएसटी की दर को कम और एकसमान रखा. इतना ही नहीं इस सरकार ने जाने माने फ़िल्मकार श्याम बेनेगल के नेतृत्व में 2016 में सेंसर बोर्ड और सेंसरशिप की गाइडलाइंस में बदलाव लाने के लिए एक समिति का गठन किया.

लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने की बजाए, सरकार अब यूटर्न लेती हुई दिख रही है. वह भी ऐसे वक़्त में जब फ़िल्मकारों पर छोटे-मोटे मुद्दों को लेकर भी उग्र समूहों का दबाव बढ़ता दिख रहा है.

वीडियो कैप्शन, तांडव वेब सिरीज़ में अपने किरदार पर ज़ीशान अयूब ने क्या कहा?

ऐसे में प्रस्तावित संशाधनों के ज़रिए उग्र भीड़ को बढ़ावा मिलेगा और वे अपने स्तर पर फ़िल्मों की सेंसरशिप करना शुरू कर देंगे. यह एक तरह से सरकार की स्वायत्त संस्था केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) को कमतर दिखाना होगा.

इन दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भी फ़िल्मकारों को कहानी और उसके कहने के तरीके में रचनात्मक होने का मौका उपलब्ध कराया है लेकिन उन्हें भी निशाना बनाने की शुरुआत हो चुकी है. तांडव और फैमिली मैन जैसी सिरीज़ को विरोध का सामना करना पड़ा है. ज़ाहिर है कि सरकार जो कह रही है और जो कर रही है, उसमें अंतर देखने को मिल रहा है.

तांडव फ़िल्म का विरोध

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शिकायत निवारण संस्था ख़त्म

इसी साल अप्रैल में सेंसर बोर्ड के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ फ़िल्मकारों के लिए अपील और शिकायत निवारण की संस्था फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रायब्यूनल (एफ़सीएटी) को सरकार ने चुपके से ख़त्म कर दिया.

इसके लिए किसी साझेदारों से कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया. अब फ़िल्मकारों के सामने सेंसरबोर्ड के किसी भी फ़ैसले को चुनौती देने के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है.

कोरोना महामारी के दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री आर्थिक संकट की मार झेल ही रहा है. इसके साथ ही सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को जिस तरह से कुछ मीडिया नेटवर्क ने कवर किया, उससे भी इंडस्ट्री की बदनामी हुई है. भारत की सॉफ्ट पावर वाली छवि को नुकसान भी पहुंचा है.

बॉलीवुड के शीर्षस्थ प्रॉडक्शन हाउस, फ़िल्मकार, सितारे और इंडस्ट्री से जुड़ी संस्थाओं ने रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाऊ जैसे टीवी चैनलों की 'गैर ज़िम्मेदारी भरी टिप्पणियों' पर क़ानूनी रास्ता अख़्तियार किया है.

नेटफ्लिक्स

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इमेज कैप्शन, इन दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भी फ़िल्मकारों को कहानी और उसके कहने के तरीके में रचनात्मक होने का मौका उपलब्ध कराया है

आने वाले दिनों में दिखेगा असर

कई लोग यह मान रहे हैं कि बॉलीवुड पर अकुंश एक तरह से उस विस्तृत योजना का हिस्सा है जिसके ज़रिए भारत के सांस्कृतिक संस्थानों पर अंकुश लगाया जा रहा है.

इसका दीर्घकालीन असर आने वाले दिनों में भारत में बनने और देखे जाने वाले सिनेमा पर दिखेगा. सबसे बड़ा ख़तरा तो यही है कि फ़िल्मकार खुद उन विषय और मुद्दों से बचना चाहेंगे जिस पर किसी तरह का विवाद होने की आशंका होगी, यानी एक तरह की सेल्फ़ सेंसरशिप लागू हो जाएगी.

इसके अलावा दूसरी आशंका यह है कि कंटेंट पर अंकुश बढ़ने से राजनीतिक प्रोपेगैंडा और राष्ट्रवाद के अलावा दूसरे विषयों की फ़िल्मों के लिए बहुत स्कोप नहीं बचेगा.

सत्यनारायण व्रत कथा में कार्तिक आर्यन का अभिनय करना हर तरह से ठीक है, जब तक वह अपनी मर्जी से ऐसा करना चुन रहे हैं. लेकिन अगर उन पर फ़िल्मकार या फिर दर्शकों की ओर से ऐसा करने का दबाव हो तो यह ठीक स्थिति नहीं हो सकती.

प्रस्तावित संशोधनों में सबसे 'दुखद बात' ये कही जा रही है कि यह फ़िल्मकारों और दर्शकों, दोनों को 'खुले तौर पर बचकाना साबित करने की कोशिश है.'

ऐसा तर्क रखने वालों का कहना है कि 18 साल से अधिक उम्र के लोग सरकार चुन सकते हैं लेकिन उन्हें इतना परिपक्व भी नहीं माना जा रहा है कि वे जैसी फ़िल्में देखना चाहें, वैसी देख पाएं.

कार्टून

अपीलीय ट्राब्यूनल की ज़रूरत

इस समय में फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय ट्राइब्यूनल (एफ़सीएटी) को फिर से सक्रिय किए जाने की ज़रूरत है. इसके अलावा केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) को सरकारी दख़ल से दूर स्वतंत्र संस्था बनाया जाना चाहिए. संस्था को प्रमाण पत्र देने वाली संस्था के तौर पर काम करना चाहिए ना सेंसर संस्था के तौर पर.

यह ज़रूर कहा जा सकता है कि संशोधनों में वर्गीकरण के नए मानदंडों वाले सुझाव काग़जी तौर पर अच्छे हैं लेकिन जब उन्हीं संशोधनों में सुपर सेंसरशिप की बात हो रही हो तो यह बेमानी नज़र आता है.

एक कहावत है. एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती. उसी तरह से सिनमेटोग्राफ़ी एक्ट के संशोधन में कोई एक रास्ता चुनना होगा और उस चुनाव पर भारतीय सिनेमा का भविष्य टिका होगा.

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