नेटफ़्लिक्स, अमेज़न जैसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म नियंत्रित करने का फ़ैसला और सवाल

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- Author, दीप्ति बथिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार ने बुधवार को ऑनलाइन कंटेंट प्रदाता समेत तमाम डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म्स को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत लाने का आदेश जारी किया.
इनमें नेटफ़्लिक्स, हॉटस्टार, अमेज़न प्राइम वीडियो, डिज़्नी-हॉटस्टार, एमएक्स प्लेयर जैसे अन्य ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स और ख़बरे देने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म शामिल हैं.
9 नवंबर को जारी हुए इस सरकारी आदेश के मुताबिक़, भारत सरकार (व्यवसाय का आवंटन) नियम, 1961 में 'ऑनलाइन विषय-वस्तु प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए फ़िल्म और दृश्य-श्रव्य कार्यक्रमों', साथ ही साथ 'ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर समाचार एवं समसामयिक विषय-वस्तु' को शामिल करते हुए संशोधन किया गया है.
इस फ़ैसले से यह सवाल उठने लगे हैं कि ऑनलाइन चलने वाले प्लेटफ़ॉर्म्स (ओवर-द-टॉप या ओटीटी) के साथ-साथ डिजिटल न्यूज़ मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.
इस निर्णय से पता चलता है कि अब केंद्र सरकार के पास ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल न्यूज़ मीडिया के लिए नीतियां बनाने का अधिकार होगा.
हालांकि, अभी ये साफ़ नहीं है कि इसमें सेंसरशिप का तरीक़ा अपनाया जाएगा या किसी और तरह से कंटेंट पर नज़र रखी जाएगी और उसमें बदलाव कराए जाएंगे.
भारत में इस समय मीडिया के लिए एक स्व-नियामक तंत्र मौजूद है - जैसे प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एक वैधानिक निकाय) जो प्रिंट मीडिया पर नज़र रखता है.
उसी तरह न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन भी एक स्व-नियामक निकाय है जो न्यूज़ चैनलों पर नज़र रखता है. वहीं एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया विज्ञापनों के लिए दिशा-निर्देश जारी करती है, और फ़िल्मों से जुड़े मामलों में चर्चा में रहने वाला 'सीबीएफ़सी' सिनेमाघरों और टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्मों के लिए प्रमाण-पत्र ज़ारी करता है.
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इससे जुड़े लोग क्या कहते हैं
एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म, द न्यूज़ मिनट की संपादक धन्या राजेंद्रन ने बीबीसी से कहा कि 'सैद्धांतिक तौर पर डिजिटल न्यूज़ को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत लाने में कोई समस्या नहीं है.'
वे कहती हैं, "हमारे अंदर जो संदेह पैदा करता है वो है इस फ़ैसले से पहले हुई घटनाएं, जैसा कि हम जानते हैं कि नियम अचानक नहीं बनाए जाते, उनके पीछे कारण होते हैं.
"केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह बताने में बहुत उत्सुकता दिखाई थी कि वो डिजिटल मीडिया का नियमन करना चाहती है और हाल ही में सरकार ने डिजिटल मीडिया में विदेशी निवेश पर भी सीमा तय कर दी है. इसलिए, मैं उम्मीद करती हूँ कि अगर सरकार डिजिटल मीडिया को नियमित करना चाहती है तो उसे पहले इससे संबंधित पक्षों से चर्चा करनी चाहिए."
धन्या राजेंद्रन हाल ही में बनाये गए 11 डिजिटल न्यूज़ प्रदाताओं के समूह, डिजिपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष हैं. वे कहती हैं कि इस आदेश में कई बातें अस्पष्ट हैं.
धन्या ने बताया, "कई ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल साइट्स भारत में संचालित होती हैं, पर भारत में पंजीकृत नहीं हो सकती हैं. मुझे उम्मीद है कि सरकार इस पर भी सोचेगी और डिजिटल उद्योग के विकास में मदद करेगी.''

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'यह सेंसर बोर्ड का रूप ना ले ले'
भारतीय डिजिटल स्वतंत्रता संगठन, इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन ने एक बयान जारी कर कहा है कि संभावित नियम और क़ानूनों को लेकर घबराहट का माहौल है.
इस बयान में कहा गया है कि "अब ये खुला सवाल है कि ये या कोई अन्य क़ानूनी उपाय क्या सेंसरशिप का कारण बनेंगे? इसका मक़सद तो फ़ेक न्यूज़ जैसी समस्याओं पर नज़र रखना है, लेकिन उसके नतीजे सरकारी नियंत्रण बढ़ने के तौर पर सामने आ सकते हैं."
भारतीय ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म AHA के संस्थापक और कंटेंट मैनेजमेंट बोर्ड के अध्यक्ष अल्लू अरविंद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "ओटीटी प्लेयर्स भी फ़िलहाल इंतज़ार कर रहे हैं और इस पर नज़र बनाये हुए हैं कि चीज़ें किस ओर जाती हैं."
अरविंद को लगता है कि "इसके ज़रिये अगर कंटेंट को सेंसर करने की कोशिश की गई और इन नियमों ने सेंसर बोर्ड की जगह ले ली, तो यह ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए बहुत ही बुरा होगा."
वे कहते हैं, "अभी नहीं पता है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस बारे में क्या सोच रहा है. पर हमें उम्मीद है कि वो सेंसर बोर्ड जैसा कुछ नहीं बनायेंगे. हो सकता है कि वो न्यूडिटी पर लगाम कसने के लिए कुछ प्रतिबंध लागू करें क्योंकि इस वजह से ओटीटी कंटेंट की काफ़ी चर्चा रही है. लॉकडाउन में ऐसी चर्चा भी रही कि यह कंटेट परिवार के लोग साथ बैठकर नहीं देख पाते. पर इससे ज़्यादा कटौती नहीं होनी चाहिए."
इस दौरान, मीडिया लॉ प्रोफ़ेसर मादाभूषि श्रीधर मानते हैं कि 'ये देखना होगा कि सरकार इंटरनेट पर आने वाले कंटेट को नियमित करने के लिए क्या योजना बनाती है.'
सूचना एवं तकनीक नीति के विशेषज्ञों की राय है कि हालांकि इस क़दम से संबंधित पक्षों में खलबली मची हुई है, लेकिन यह देखना होगा कि मंत्रालय कैसे संतुलन बनाता है.
साइबर सुरक्षा क़ानून पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष पवन दुग्गल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अब बेलगाम होकर काम करने के दिन ख़त्म हो गए हैं. हमने देखा है कि डिजिटल माध्यम कम से कम नियमन के बीच तेज़ी से वृद्धि करते हैं.''
वे कहते हैं कि 'पारंपरिक मीडिया कई सालों से इस बात को उठा रहा है कि नियामक तंत्र को लेकर पारंपरिक मीडिया और डिजिटल मीडिया के बीच समानता होनी चाहिए.'
पवन दुग्गल कहते हैं, ''इस माँग को पूरा करने के लिए यह नया क़दम उठाया गया है. यह क़दम वास्तव में विनियमन की दिशा में शुरुआत है. वह नियमन क्या होगा, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है.'
"हालांकि यह एक दिलचस्प क़दम है, इसका अनुपालन करने में मुश्किल हो सकती है, आदर्श रूप से सरकार फ़ेक न्यूज़ क़ानून की दिशा में आगे बढ़ सकती थी, हालांकि, उन्होंने किसी एक विशेष चुनौती के बजाय पूरे तंत्र को विनियमित करने का विकल्प चुना है."

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इस नियम की घोषणा से पहले...
अक्तूबर महीने में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को विनियमित करने के लिए दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था.
पेशे से वकील शशांक शेखर झा ने अपनी याचिका में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के विनयमित नहीं होने को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी.
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में कहा गया था कि ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर अनुचित और अश्लील सामग्री परोसी जा रही है, लिहाज़ा इन प्लेटफ़ॉर्म्स की निगरानी के लिए किसी स्वायत्त संस्था या बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए.
इससे पहले सितंबर महीने में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सुदर्शन न्यूज़ के 'यूपीएससी जिहाद' कार्यक्रम को लेकर दायर की गई एक याचिका के जवाब में हलफ़नामा दायर किया था.
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफ़नामे में सरकार ने कहा था कि 'पहले डिजिटल मीडिया का नियमन होना चाहिए, क्योंकि उसकी पहुँच अब टीवी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ज़्यादा है.'
बारह पन्ने के हलफ़नामे में केंद्र सरकार की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अवर सचिव विजय कौशिक ने लिखा था कि 'सुप्रीम कोर्ट को न्याय-मित्र (एमिकस क्यूरे) या न्याय-मित्रों की एक कमेटी को नियुक्त किये बिना मीडिया में हेट स्पीच के नियमन को लेकर और कोई दिशा-निर्देश नहीं देने चाहिए.'
मंत्रालय ने कहा था कि 'अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा करने का निर्णय लेता है, तो कोर्ट को पहले डिजिटल मीडिया के नियमन से जुड़े दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के संबंध में पहले से ही पर्याप्त रूपरेखा और न्यायिक घोषणाएं मौजूद हैं.'
केंद्रीय मंत्रालय ने अपने हलफ़नामे में दो पुराने मामलों और साल 2014 और 2018 में आये उनके निर्णयों का ज़िक्र करते हुए यह बताने की कोशिश की थी कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के मामले में हेट स्पीच को लेकर काफ़ी स्पष्टता से उल्लेख मिलता है, मगर डिजिटल मीडिया के मामले में इसकी कमी है.
हलफ़नामे में यह भी कहा गया था कि अगर कोर्ट नियमन के लिए आगे बढ़ता है और कुछ नये दिशा-निर्देश जारी करने का निर्णय लेता है, तो कोई वजह नहीं बनती कि इसे सिर्फ़ मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक ही सीमित रखा जाये.
मीडिया में तो मुख्यधारा का प्रिंट मीडिया, एक समानांतर मीडिया अर्थात डिजिटल मीडिया, वेब आधारित न्यूज़ पोर्टल, यू-ट्यूब चैनल और ओटीटी यानी ओवर द टॉप प्लेफ़ॉर्म भी शामिल हैं.
बीते दो साल से ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करने का मुद्दा और इसके लिए मंत्रालय तय करने को लेकर चर्चा जारी है.

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ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को विनियमित करने के मुद्दे पर कब-कब क्या क्या हुआ
अक्तूबर 2018 में ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद सामग्री को विनियमित करने संबंधी दिशा-निर्देश जारी करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जवाब तलब किया था.
इसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा था कि यह उनका विवाद है, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के लिए सूचना मंत्रालय से लाइसेंस लेना आवश्यक नहीं है. इसी तरह वो अपने प्लेटफ़ॉर्म पर क्या प्रसारित करते हैं, यह भी मंत्रालय विनिमित नहीं करता है.
इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अपने हलफ़नामे में कहा था कि वे इंटरनेट पर मौजूद सामग्री को विनियमित नहीं करते और इंटरनेट पर सामग्री डालने के लिए किसी भी संगठन या प्रतिष्ठान के लिए लाइसेंस देने का कोई प्रावधान नहीं है.
साल 2019 में इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक स्व-विनियमन कोड की घोषणा की थी.
इस पर नौ ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स - नेटफ़्लिक्स, ज़ी5, ऑल्ट बालाजी, अर्रे, इरोज़ नाऊ, हॉटस्टार, वूट, जियो और सोनालिव ने हस्ताक्षर किए थे.
फ़रवरी 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेटफ़्लिक्स-अमेज़न प्राइम वीडियो समेत अन्य ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर दिशा-निर्देशों लागू होने तक पाबंदी लगाने की याचिका ख़ारिज कर दी.
इसके बाद अगस्त 2019 में पीआईबी की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम के तहत ऑनलाइन सामग्री के प्रमाणन के लिए सुझाव आमंत्रित करता है.
अक्तूबर 2019 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म के अधिकारियों के बीच बैठक हुई, जिसमें यह संकेत मिले कि आने वाले समय में सरकार स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए 'क्या नहीं दिखाना है' की लिस्ट जारी करेगी.
5 फ़रवरी 2020 को इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक सेल्फ़ रेगुलेटिंग कोड, कोड फ़ॉर सेल्फ़-रेगुलेशन ऑफ़ ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट प्रोवाइडर्स की घोषणा की.
इस कोड के तहत हॉटस्टार, वूट, जियो और सोनीलिव ने हस्ताक्षर किये.
इस कोड के तहत इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया सरकार और उपयोगकर्ता की शिकायतों को दूर करने के लिए डिजिटल कंटेंट कम्प्लेंट काउंसिल नाम के एक स्वतंत्र प्रवर्तन प्रधिकरण की स्थापना करना चाहता है.
इसके बाद मार्च 2020 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक सहायक निकाय का गठन करने के लिए और कोड-कंडक्ट को अंतिम रूप देने लिए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को 100 दिन का समय दिया था, लेकिन आईएएमएआई के तहत नियमों का पालन कर रहे स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स के बीच आपसी सहमति नहीं थी.
सितंबर 2020 में 15 ओटीटी प्लेयर्स ने सेल्फ़ रेगुलेशन कोड, यूनिवर्सल सेल्फ़ रेगुलेशन कोड पर हस्ताक्षर किये.
आईएएमएआई ने अपने एक बयान में कहा कि कोड में उम्र के वर्गीकरण के लिए फ़्रेमवर्क तय किया गया है.
वहीं इस संदर्भ में भारत सरकार के हालिया फ़ैसले पर काफ़ी चर्चा हो रही है. इस इंडस्ट्री से जुड़े लोग सरकार के इस क़दम के परिणामों को समझने का प्रयास कर रहे हैं.
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