ख़य्याम: नहीं रहे 'उमराव जान' में जान डालने वाले संगीतकार शर्मा जी

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी टीवी एडिटर, भारतीय भाषाएं
"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
ज़ुबां मिली है मगर हमज़ुबां नहीं मिलता"
अगर आपसे पूछा जाए कि 1981 में आई इस फ़िल्मी गीत का संगीतकार कौन है तो जवाब होगा मशहूर संगीतकार ख़य्याम.
वही संगीतकार ख़य्याम जिन्होंने 1947 में शुरू हुए अपने फ़िल्मी करियर के पहले पाँच साल शर्मा जी के नाम से संगीत दिया.

भारतीय सिनेमा के दिग्गज संगीतकार मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम हाशमी का सोमवार रात साढ़े नौ बजे 93 साल की उम्र में निधन हो गया.
पिछले कुछ समय से सांस लेने में दिक़्क़त के कारण उनका मुंबई के जुहू में एक अस्पताल में इलाज चल रहा था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत फ़िल्म, कला, राजनीति और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने ख़य्याम के निधन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि दी है.
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शर्मा जी और वर्मा जी
ख़य्याम संगीतकार रहमान के साथ मिलकर संगीत देते थे और जोड़ी का नाम था शर्मा जी और वर्मा जी. वर्मा जी यानी रहमान पाकिस्तान चले गए तो पीछे रह गए शर्मा जी.
बात 1952 की है. शर्मा जी कई फ़िल्मों का संगीत दे चुके थे और उन्हें ज़िया सरहदी की फ़िल्म फ़ुटपाथ का संगीत देने का मौक़ा मिला.
दिलीप कुमार पर फ़िल्माया गया गाना था -"शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगी हैं हम, आ भी जा, आ भी जा आज मेरे सनम..."
दूरदर्शन की एक पुरानी इंटरव्यू में ख़य्याम बताते हैं, "एक दिन बातों का दौर चला तो ज़िया सरहदी ने पूछा कि आपका पूरा नाम क्या है. मैंने कहा मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम. तो उन्होंने कहा कि अरे तुम ख़य्याम नाम क्यों नहीं रखते. बस उस दिन से मैं ख़य्याम हो गया."
इन्हीं ख़य्याम ने फ़िल्म कभी-कभी, बाज़ार, उमराव जान, रज़िया सुल्तान जैसी फ़िल्मों में बेहतरीन संगीत दिया.

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अभिनेता बनना चाहते थे
18 फ़रवरी 1927 को पंजाब में जन्मे ख़य्याम के परिवार का फ़िल्मों से दूर दर तक कोई नाता नहीं था. उनके परिवार में कोई इमाम था तो कोई मुअज़्ज़िन.
लेकिन उस दौर के कई नौजवानों की तरह ख़य्याम पर केएल सहगल का नशा था. वो उन्हीं की तरह गायक और एक्टर बनना चाहते थे. इसी जुनून के चलते वे छोटी उम्र में घर से भागकर दिल्ली चचा के पास आ गए.
घर में ख़ूब नाराज़गी हुई लेकिन फिर बात इस पर आकर टिकी कि मशहूर पंडित हुसनलाल-भगतराम की शागिर्दी में वो संगीत सीखेगें.
कुछ समय सीखने के बाद वे लड़कपन के नशे में वो क़िस्मत आज़माने मुंबई चले गए लेकिन जल्द समझ में आया कि अभी सीखना बाक़ी है.

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संगीत सीखने की चाह उन्हें दिल्ली से लाहौर बाबा चिश्ती (संगीतकार ग़ुलाम अहमद चिश्ती) के पास ले गई जिनके फ़िल्मी घरानों में ख़ूब ताल्लुक़ात थे. लाहौर तब फ़िल्मों का गढ़ हुआ करता था.
बाबा चिश्ती के यहाँ ख़य्याम एक ट्रेनी की तरह उन्हीं के घर पर रहने लगे और संगीत सीखने लगे.
दूरदर्शन समेत अपनी कई इंटरव्यू में ख़य्याम ये क़िस्सा ज़रूर सुनाते हैं, "एक बार बीआर चोपड़ा बाबा चिश्ती के घर पर थे और चिश्ती साहब सबको तनख़्वाह बाँट रहे थे. लेकिन बीआर चोपड़ा ने देखा कि मुझे पैसे नहीं मिले. चोपड़ा साहब के पूछने पर बाबा चिश्ती ने बताया कि इस नौजवान के साथ तय हुआ है कि ये संगीत सीखेगा और मेरे घर पर रहेगा पर पैसे नहीं मिलेंगे. लेकिन बीआर चोपड़ा ने कहा कि मैंने देखा है कि सबसे ज़्यादा काम तो यही करता है. बस बीआर चोपड़ा ने उसी वक़्त मुझे 120 रुपए महीने की तनख़्वाह थमाई और चोपड़ा ख़ानदान के साथ रिश्ता बन गया."

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कम मगर बेमिसाल काम
ख़य्याम ने कई संगीतकारों की तुलना में कम काम किया लेकिन जितना भी किया बेमिसाल माना जाता है.
एक संगीत प्रेमी के नाते जब भी मैं उनके गाने सुनती हूँ तो उनमें एक अजब सा ठहराव, एक संजीदगी पाती हूँ जिसे सुनकर महसूस होता है मानो कोई ज़ख़्मों पर मरहम लगा रहा हो या थपकी देते हुए हौले हौले सहला रहा हो.
फिर चाहे आख़िरी मुलाक़ात का दर्द लिए फ़िल्म बाज़ार का गाना- 'देख लो आज हमको जी भरके' हो. या उमराव जान में प्यार के एहसास से भरा गाना हो "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें" .....
इसके लिए ख़य्याम मेहनत भी ख़ूब करते थे. मसलन उनकी सबसे बेहतरीन पेशकश में से एक, 1982 की फ़िल्म, उमराव जान को ही लीजिए.

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ये एक उपन्यास उमराव जान अदा पर आधारित फ़िल्म थी जिसमें 19वीं सदी की एक तवायफ़ की कहानी है.
ख़य्याम ने इस फ़िल्म का संगीत देने के लिए न सिर्फ़ वो उपन्यास पूरा पढ़ा बल्कि दौर के बारे में बारीक से बारीक जानकारी हासिल की- उस समय की राग-रागनियाँ कौन सी थीं, लिबास, बोली आदि.
एसवाई क़ुरैशी को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में ख़य्याम बताते हैं, "बहुत पढ़ने-लिखने के बाद मैंने और जगजीत जी (उनकी पत्नी) ने तय किया कि उमराव जान का सुर कैसा होगा. हमने आशा भोंसले को उनके सुर से छोटा सुर दिया.
मैंने अपनी आवाज़ में उन्हें गाना रिकॉर्ड करके दे दिया. लेकिन रिहर्सल के दिन आशा जी ने जब गाया तो काफ़ी परेशान दिखीं और कहा कि ये उनका सुर नहीं है. मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की मुझे आशा का नहीं उमराव जान का सुर चाहिए. इस पर उनका जवाब था पर आपकी उमराव तो गा ही नहीं पा रही."

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"फिर हम दोनों के बीच एक समझौता हुआ. मैंने कहा कि हम दो तरह से गाना रिकॉर्ड करते हैं. आशा ने मुझे क़सम दिलाई कि मैं उनके सुर में भी गाना रिकॉर्ड करूँगा और मैंने उन्हें क़सम दिलाई कि वो मेरे वाले सुर में पूरी शिद्द्त से गाएँगी. आशा ने उमराव वाले सुर में गाना गाया और वो इतना खो गईं कि वो ख़ुद भी हैरान थीं. बस बात बन गईं."
उमराव जान के लिए ख़य्याम और आशा भोंसले दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

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अपने 88वें जन्मदिन पर बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था उमराव जान का संगीत देने से पहले वो बहुत डर गए थे क्योंकि उससे कुछ समय पहले ही फ़िल्म पाकिज़ा आई थी जो संगीत में एक बेंचमार्क थी.
साथी कलाकारों के साथ संगीत को लेकर ऐसे कई क़िस्से ख़य्याम के साथ हुए. मान मनुहार से वे अपने गायकों को मना लिया करते पर थे वो अपनी धुन के पक्के.

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अतीत में चलकर ख़य्याम के फ़िल्मी सफ़र की बात करें तो उन्होंने 1947 में अपना सफ़र शुरु किया हीर रांझा से. रोमियो जूलियट जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया और गाना भी गाया.
1950 में फ़िल्म बीवी के गाने 'अकेले में वो घबराते तो होंगे' से लोगों ने उन्हें जाना जो रफ़ी ने गाया था.
1953 में आई फ़ुटपाथ से ख़य्याम को पहचान मिलने लगी और उसके बाद तो ये सिलसिला चल निकला.

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1958 में फ़िल्म 'फिर सुबह होगी' में मुकेश के साथ 'वो सुबह कभी तो आएगी' बनाया , 1961 में फ़िल्म 'शोला और शबनम' में रफ़ी के साथ 'जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें रचा'. तो 1966 की फ़िल्म 'आख़िरी ख़त' में लता के साथ 'बहारों मेरा जीवन भी सवारो' लेकर आए.
दिलचस्प बात ये है कि राजकपूर के साथ उन्हें 'फिर सुबह होगी' मिलने की एक बड़ी वजह थी कि वो ही ऐसे संगीत निर्देशक थे जिन्होंने उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट पढ़ी थी जिस पर वो फ़िल्म आधारित थी.
ख़य्याम ने 70 और 80 के दशक में कभी-कभी, त्रिशूल, ख़ानदान, नूरी, थोड़ी सी बेवफ़ाई, दर्द, आहिस्ता आहिस्ता, दिल-ए-नादान, बाज़ार, रज़िया सुल्तान जैसी फ़िल्मों में एक से बढ़कर एक गाने दिए. ये शायद उनके करियर का गोल्डन पीरियड था.

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प्रेम कहानी
ख़य्याम के जीवन में उनकी पत्नी जगजीत कौर का बहुत बड़ा योगदान रहा जिसका ज़िक्र करना वो किसी मंच पर नहीं भूलते थे. जगजीत कौर ख़ुद भी बहुत उम्दा गायिका रही हैं.
चुनिंदा हिंदी फ़िल्मों में उन्होंने बेहतरीन गाने गाए हैं जैसे बाज़ार में देख लो हमको जी भरके या उमराव जान में काहे को बयाहे बिदेस..
अच्छे ख़ासे अमीर सिख परिवार से आने वाली जगजीत कौर ने उस वक़्त ख़य्याम से शादी की जब वो संघर्ष कर रहे थे. मज़हब और पैसा कुछ भी दो प्रेमियों के बीच दीवार न बन सका.

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दोनों की मुलाक़ात तो संगीत के सिलसिले में हो चुकी थी लेकिन जब मुंबई की एक संगीत प्रतियोगिता में जगजीत कौर का चयन हुआ तो उन्हें ख़य्याम के साथ काम करने का मौक़ा मिला और वहीं से प्रेम कहानी शुरु हुई.
जगजीत कौर ख़ुद भले फ़िल्मों से दूर रहीं लेकिन ख़य्याम की फ़िल्मों में जगजीत कौर उनके साथ मिलकर संगीत पर काम किया करती थीं.
दोनों के लिए वो बहुत मुश्किल दौर था जब 2013 में ख़य्या के बेटे प्रदीप की मौत हो गई. लेकिन हर मुश्किल में जगजीत कौर ने ख़य्याम का साथ दिया.

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दोनों की प्रेम कहानी देखकर ऐसा लगता है कि जगजीत कौर ने ख़य्याम के लिए ही उनके निर्देशन में ये गाना गाया हो
"तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
मैं देखूँ तो सही दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिए अपनी निगहबानी मुझे दे दो"

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जब छुड़ाया 'बदक़िस्मती' का टैग
यहाँ 1976 की फ़िल्म कभी-कभी के ज़िक्र के ब़गौर ख़य्याम पर बात अधूरी है.
बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ख़य्याम ने बताया था, "यश चोपड़ा मुझसे अपनी फ़िल्म के लिए संगीत लेना चाहते थे. लेकिन सभी उन्हें मेरे साथ काम करने के लिए मना कर रहे थे. उन्होंने मुझे कहा भी था कि इंडस्ट्री में कई लोग कहते हैं कि ख़य्याम बहुत बदक़िस्मत आदमी हैं और उनका म्यूज़िक हिट तो होता है लेकिन जुबली नहीं करता. लेकिन मैंने यश चोपड़ा की फ़िल्म का संगीत दिया और फ़िल्म ने डबल जुबली कर सबका मुंह बंद कर दिया."

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वाक़ई साहिर लुधियानवी की शायरी में डूबा और ख़य्याम के संगीत में निखरा कभी-कभी का एक एक गीत बेमिसाल है.
यहाँ याद आता है कभी कभी का गीत -
"मैं पल दो पल का शायर हूँ"…..
"कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले
कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे
मैं पल दो पल का शायर हूँ...

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ख़य्याम भले ही संगीत प्रेमियों से जुदा हो गए हों लेकिन बहुत सारे संगीत प्रेमियों के लिए वाक़ई उनसे बेहतर कहने वाला कोई नहीं होगा.
वो दौर जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का गोल्डन युग कहा जाता है, उस दौर के अंतिम धागों से जुड़ी एक और डोर ख़य्याम के जाने से टूट गई है.
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