संगीत परंपरा के विद्रोही संगीतकार आरडी बर्मन

- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, संगीत समीक्षक
राहुल देव बर्मन यानी 'आरडी' (आत्मीय लोगों में 'पंचम') एक ऐसे विलक्षण संगीतकार के रूप में हिंदी सिनेमा की दुनिया में मौजूद हैं, जिनका सारा काम ही पारम्परिक फ़िल्म-संगीत के संसार से विद्रोह या विचलन का रहा है.
'आरडी' के संगीत को इसी अर्थ में विश्लेषित किया जा सकता है कि जब बीसवीं सदी के साठ वाले दशक के उत्तरार्ध में लोक व शास्त्रीय रंग में डूबी हुई रूढ़ हो चुकी धुनों के हम अभ्यस्त हो चले थे, उस समय एकदम नए तेवर और युवा संवेदना से लबरेज़ राहुल देव बर्मन का जादू जगाता संगीतमय दौर आरम्भ हुआ.
पंचम के लिए सदैव राहत देने वाली बात यह अलग से बनी रही कि उन्हें एसडी बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकार का सान्निध्य नसीब हुआ, जो सौभाग्य से उनके पिता ही थे.
आरडी बर्मन के संगीत-जीवन में कई दिलचस्प मोड़ों को एक साथ सक्रिय देखा जा सकता है. उनके काम में आने वाली तमाम सूक्ष्मताओं के साथ उसी समय जटिलताओं का प्रवेश, शास्त्रीय ढंग की अत्यंत सलोनी धुन बनाने के अलावा नए चलन के अनुसार इन धुनों की सम्पूर्ण काया बदलने की जद्दोजहद और 'एसडी' के आजमाए हुए सफल, मगर अपनी सीमा तय कर चुके रास्ते से पीछा छुड़ाकर एक नई सड़क पर दौड़ने की मंशा के बीच ही इस संगीतकार के जीवन का पूरा फ़लसफ़ा खड़ा नज़र आता है.

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आरडी बर्मन को ऐसा क्रांतिकारी संगीतकार भी कहा जा सकता है जिसने फ़िल्म-संगीत की प्रचलित मान्यताओं को एक हद तक पुराना और बासी साबित करते हुए एक नए ट्रेंड का सूत्रपात ही कर दिया था.
प्रयोगधर्मी संगीत
फ़िल्म संगीत में आए हुए रचनात्मक रूप से परिवर्तनकारी समयों को यदि हम यहाँ पर रेखांकित करना चाहें तो पाएंगे कि यह काम मास्टर ग़ुलाम हैदर ने 'खजांची' (1941), शंकर-जयकिशन ने 'बरसात' (1949), ओ. पी. नैय्यर ने 'नया दौर' (1957), आर. डी. बर्मन ने 'तीसरी मंज़िल' (1966) एवं 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) और एआर रहमान ने 'रोजा' (1993) के माध्यम से पिछली शताब्दी में सृजित किया है.

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यह हम सभी जानते हैं कि राहुल देव बर्मन का क्रान्तिकारी संगीत उस दौर में ही फ़िल्मी दुनिया में सफलता के ऊँचे स्तर पर पहुँच गया था, जिस समय उनके पिता एसडी बर्मन का काम भी बुलंदियों पर टिका हुआ था.
यह देखना महत्वपूर्ण है कि 'तीसरी मंज़िल' (1966) जैसी फ़िल्म से अपना बिल्कुल अलग ही मुहावरा गढ़ने में सफल रहे 'आरडी' के यहाँ स्वयं उनके घर में एक बड़ी रचनात्मक कीर्ति 1965 में ही दादा बर्मन द्वारा 'गाइड' के माध्यम से रची थी. एक वर्ष के समयांतराल पर दो महत्वपूर्ण संगीतमय फ़िल्में जिनका कलेवर और आस्वाद बिल्कुल जुदा थे, 'एसडी' बनाम 'आरडी' के तहत सिनेमा-प्रेमियों को नसीब हो सके.

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सन् 1961 से 1970 वाले दशक में आई कुछ प्रमुख फ़िल्मों- 'तीसरी मंज़िल', 'बहारों के सपने', 'पड़ोसन', 'प्यार का मौसम' और 'कटी पतंग' जैसी फ़िल्मों की सफलता के बाद आगे के दौर में तो आरडी बर्मन ने इतनी विपुलता में संगीत रचा कि उनकी संगीतबद्ध फ़िल्मों की संख्या भी उनके पिता की संगीत-निर्देशन वाली फ़िल्मों से काफ़ी आगे निकल गई.
ऐसे में 1970 के बाद संगीत की दृष्टि से आई सार्थक फ़िल्में हैं - अमर प्रेम, बुड्ढा मिल गया, कारवां, हरे रामा हरे कृष्णा, पराया धन (1971), जवानी-दीवानी, परिचय, रामपुर का लक्ष्मण (1972), अनामिका, हीरा-पन्ना, यादों की बारात, (1973), आपकी क़सम (1974), आंधी, ख़ुशबू, खेल-खेल में (1975), हम किसी से कम नहीं, किनारा (1977), घर (1978), द ग्रेट गैंबलर, झूठा कहीं का (1979), आँचल, खूबसूरत, सितारा (1980), कुदरत, लव स्टोरी, रॉकी (1981), सनम तेरी क़सम, आमने-सामने, मासूम (1982), अगर तुम न होते, बेताब (1983), सनी, मंज़िल-मंज़िल (1984), सागर (1985), इजाज़त (1987), लिबास (1991) और 1942 ए लव स्टोरी (1993).
कामयाब धुनें

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उपर्युक्त उल्लेखित फ़िल्मों में शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म हो जिसका संगीत आमतौर पर संगीत-प्रेमियों की ज़ुबान पर न चढ़ा हो. इन फ़िल्मों की सुचिंतित, प्रयोगधर्मी और नई दिशा का मार्ग खोजने वाली संगीत वैचारिकी ने इतनी बेहतर व कामयाब धुनें हिन्दी फ़िल्म-संगीत को मुहैया कराई हैं कि उसका सिलसिलेवार उदाहरण दे पाना इस छोटी टिप्पणी के माध्यम से सम्भव नहीं है.
आरडी बर्मन के गंभीर और क्रान्तिकारी संगीत के प्रमुख तत्वों को समझने के लिए हमें उनकी कुछ ऐसी मान्यताओं की चर्चा भी करनी पड़ेगी जो कहीं न कहीं इस संगीतकार के मानस को प्रभावित करने के साथ उनकी दिशा को तय करने में भी अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं. जैसे, हम पहले ही इस बात की चर्चा कर आए हैं कि पंचम के यहाँ पारिवारिक रूप से मिले संगीत के संस्कार ने उनको शास्त्रीय और लोक-संगीत की व्यापक जानकारी और समझ से समृद्ध बनाया है.
इस अर्थ में यह जानना प्रासंगिक है कि वे एसडी के साथ सन् 1955 से लगातार सहायक संगीत-निर्देशक के बतौर काम कर रहे थे जिसने कहीं न कहीं उनकी शुरुआती प्रेरणा में व्यावहारिक योगदान किया. उन्होंने अपने युवा दिनों में तबला-वादक ब्रजेन बिस्वास से कुछ दिनों तक तबला की तालीम भी ली थी, जो अंधे होने के बावजूद एक बेहतरीन कलाकार थे और जिन्होंने 'ब्रज-तरंग' नाम का वाद्य विकसित किया.
सीखने का क्रम चलता रहा

यह देखना दिलचस्प रूप से पंचम की प्रतिभा के प्रति कुछ रोचक ढंग से नए तथ्य मुहैया कराता है कि उनका तबला सीखने का क्रम लगातार जीवन भर टुकड़ों-टुकड़ों में चलता रहा.
पचास के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने बम्बई में पंडित सामता प्रसाद 'गुदई महाराज' से भी तबले की बारीकियां सीखीं. इसके अलावा कलकत्ता में रहकर उस्ताद अली अकबर खां से सरोद भी सीखा. मगर सरोद सीखने से ज़्यादा मन उन लम्बी बैठकों में लगा, जहाँ उस्ताद अली अकबर खां और पंडित रविशंकर आपस में सरोद और सितार की जुगलबंदियों का अभ्यास किया करते थे.
स्वयं आरडी बर्मन ने कई अवसरों पर यह बात पूरी विनम्रता से साथ स्वीकारी थी कि कलकत्ता में चलने वाले इन दोनों महान कलाकारों की जुगलबंदियों के अभ्यास के तहत मिलने वाले सानिध्य के कारण उन्हें अपने संगीत के लिए पर्याप्त विचार व तर्क सुलभ हुए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)
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