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भारत: अंतरिम बजट की कड़ी आलोचना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के वर्ष 2009-10 के अंतरिम बजट की दिल्ली से छपने वाले अनेक अख़बारों ने आलोचना की है और संपादकीयों में तीखी टिप्पणी भी की है. अधिकतर अख़बारों का मानना है कि आर्थिक मंदी के दौर में सरकार अंतरिम बजट के दौरान कोई विशेष घोषणा करने से बची है. समाचार पत्र दैनिक जागरण की सुर्खी है - 'प्रणब के पिटारे में कुछ नहीं.' अख़बार ने लिखा है - "....उम्मीदों का टोकरा...सूखे आंकड़ों से भरा! न चुनावी चूरन न आर्थिक दवाई, दादा का पिटारा तो बिलकुल खाली निकला भाई!" उधर अमर उजाला की हेडलाइन है - 'बिना राहत वोट की चाहत.' समाचार पत्र ने मुख्य पृष्ठ पर छपे कार्टून में बिना किसी असर के सेनिया, लालू, मनमोहन को गर्म गैस के गुबारे में फूक भरते दिखाया है. अख़बार का कहना है - "...अंतरिम बजट के ज़रिए मंदी से निपटने और करों में छूट की उम्मीद लगाए लोगों को निराशा ही मिली." 'आम शहरी, कॉरपोरेट निराश' ग़ौरतलब है कि नवभारत टाइम्स ने प्रथम पृष्ठ पर बजट की ख़बर पर किसी हेडलाइन की जगह केवल लिखा है - 'फ़ुस्स...' समाचार पत्र अपने संपादकीय में 'बंधे हाथ, खाली हाथ' शीषर्क के तहत लिखता है - "कार्यवाहक वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने अंतरिम बजट में आम शहरी और कॉरपोरेट सेक्टर को तो निराश किया है, लेकिन संवैधानिक मर्यादाओं का पाल भी किया है...." जहाँ जनसत्ता का शीर्षक है - 'मध्यवर्ग पर नहीं रहा हाथ, सिर्फ़ दिलासा,' वहीं अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की हेडलाइन है - "बजट: यूपीए राइट्स प्रेसक्रिप्शन, लीव्स ट्रीटमेंट टु नेक्सट गवर्नमेंट," यानी बजट पर यूपीए ने प्रसक्रिप्शन तो लिख दी लेकिन इलाज अगली सरकार के लिए छोड़ दिया. अंग्रेज़ी अख़बार द ट्रिब्यून ने हेडलाइन दी है - 'क्वाइट सोशल बट सोपलेस टॉक' यानी समाजिक क्षेत्र के लिए अच्छा लेकिन राहत नहीं. समाचार पत्र हिंदूस्तान की सुर्खी है - 'गणनायक की आरती.' हिंदुस्तान का कहना है कि बजट में मिनी बजट के बहाने सरकार के हाथ मज़बूत करने की अपील की गई है. 'औपचारिक अंतरिम बजट' दैनिक जागरण ने अपने संपादकीय में इसे 'औपचारिक अंतरिम बजट' बताया है. अख़बार का कहना है - "बजट भले ही अंतरिम हो, उससे उतनी ही उम्मीदें होती हैं जितनी आम बजट से - और तब तो और भी जब चुनाव होने जा रहे हों तथा अर्थव्यवस्था की हालत भी पतली हो. यह एक पहेली है कि वित्त मंत्री के रूप में प्रवब मुखर्जी अंतरिम बजट के माध्यम से एक भी ऐसी घोषणा क्यों नहीं कर सके जो समाज के किसी भी वर्ग को उत्साहित करने वाली साबित होती?" उधर अमर उजाला ने अपने संपादकीय में लिखा है - "अंतरिम बजट में सरकार ने सामाजिक क्षेत्र के प्रति जैसी उदारता दिखाई है, वैसा ही नज़रिया वह उद्योग क्षेत्र के प्रति दिखाती तो अर्थव्यवस्था को गति मिलती, जिसकी फ़िलहाल बेहद ज़रूरत है." |
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