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ओपेक के फ़ैसले से तेल की क़ीमतें बढ़ीं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के तेल उत्पादन घटाने के बाद, छह महीने में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल से निचे गिरीं तेल की क़ीमतों में फिर से वृद्धि हुई है. पिछले छह महीनों में पहली बार तेल की क़ीमतें 100 डॉलर से नीचे चली गई थीं. इस बीच तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने तेल उत्पादन पाँच लाख बैरल प्रति दिन कम करने का फ़ैसला किया है. इसके बाद तेल की क़ीमतों में फिर तेज़ी आई और ये बढ़कर 104 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गईं. हालांकि वियना में ओपेक की बैठक से पहले सऊदी अरब ने कहा था कि उत्पादन में कटौती की ज़रूरत नहीं है. वेनेज़ुएला के ऊर्जा मंत्री ने भी मौजूदा उत्पादन स्तर को बरक़रार रखने का समर्थन किया था. जबकि अलजीरिया, ईरान और लीबिया तेल के उत्पादन में कटौती करने के पक्ष में थे. ग़ौरतलब है कि मंगलवार को यूरोपीय बाज़ार में ब्रेंट कच्चे तेल की क़ीमतें 99.30 डॉलर तक जा पहुँची थीं. जबकि इस जुलाई में तेल की क़ीमतों में भारी उछाल आया था और ये 147 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गई थी. माँग आपूर्ति का खेल एक रिपोर्ट में ऐसी चेतावनी दी गई थी कि यदि माँग और आपूर्ति में ऐसा ही अंतर बना रहा तो तेल की क़ीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुँचेगी. इसके बाद पूरी दुनिया में खलबली मच गई थी. विशेषज्ञों का कहना था कि चीन की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण वहाँ तेल की ज़रुरत बढ़ी है और इससे थोड़ी कम ज़रुरत भारत की है, वहाँ भी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है. ये दोनों ही देश अब तेल की माँग के मामले में अमरीका, यूरोपीय संघ और जापान की बराबर पहुँचने लगे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की मौजूदा क़ीमतों में गिरावट की एक वजह आर्थिक मंदी के कारण माँग में कमी है. इसके पहले मई और जून में सऊदी अरब तेल का उत्पादन बढ़ाने पर सहमत हो गया था ताकि क़ीमतों में गिरावट आ सके. |
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