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थाली पर लगी महँगाई की नज़र | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महँगाई दर के दहाई अंक में पहुँचने के पीछे पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों में हुई बढ़ोत्तरी की अहम भूमिका रही है लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरत के सामानों के दाम महीनों पहले से बढ़ रहे थे. इससे घर की थाली भी अछूती नहीं रही क्योंकि खाने-पीने के सामानों के दाम भी आसमान छूने लगे. आटा, दाल, चावल, फल, दूध और सब्ज़ियों के भाव अलग-अलग कारणों से बढ़ते चले गए. इसने घरेलू बजट का सारा हिसाब बिगाड़ कर रख दिया. ऐसे में ये जानना महत्वपूर्ण है कि एक आम आदमी के खाने के मद में कितना असर पड़ा है. सबसे पहले नज़र डालते हैं भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मानकों पर जिसमें एक स्वस्थ कामकाजी व्यक्ति के संतुलित आहार में क्या-क्या चीजें शामिल होनी चाहिए, ये बताया गया है. न्यूनतम भोजन सामग्री आईसीएमआर के मुताबिक एक स्वस्थ कामकाज़ी व्यक्ति के लिए हर दिन 520 ग्राम अनाज, 50 ग्राम दाल, 200 ग्राम सब्ज़ी, 200 ग्राम दूध और 45 ग्राम तेल या वसा का सेवन करना ज़रूरी है.
पिछले एक वर्ष के दौरान खाने-पीने की इन बुनियादी चीजों में से अधिकतर के दाम बढ़ गए हैं. अब हम 18 जून 2007 और 18 जून 2008 की क़ीमतों के आधार पर थाली की महँगाई का आकलन करते हैं. उपभोक्ता मंत्रालय में मूल्यों पर नज़र रखने वाले प्रकोष्ठ की रिपोर्ट को आधार मानें तो पिछले साल 18 जून को इन सामानों की क़ीमत बैठती है 20 रूपए 75 पैसे. अगर इसमें खाने बनाने के लिए ज़रूरी ईंधन की क़ीमत जोड़ें तो ये हो जाता है 23 रूपए 75 पैसे. दूसरी ओर ताज़ा भाव (18 जून, 2008) के हिसाब से प्रति दिन के भोजन का खर्च आता है 25 रूपए 40 पैसे. ईंधन की क़ीमत जोड़ने पर यह 28 रूपया 40 पैसा हो जाता है. इस तरह रूपए के हिसाब से खाने के मद में चार रूपए 65 पैसे अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे. प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो एक आदमी की थाली 19.57 फ़ीसदी महँगी हो चुकी है. पैसे कहाँ हैं? चिंता की बात ये है कि इतनी तेज़ रफ़्तार भागती महँगाई के हिसाब से आम आदमी की आमदनी नहीं बढ़ी है.
अगर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट पर नज़र दौड़ाएँ तो ग्रामीण इलाक़ों में लगभग 30 फ़ीसदी आबादी एक दिन में सिर्फ़ दस रूपए खर्च करने की स्थिति में हैं. 40 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग बीस रूपए प्रति दिन और 15 फ़ीसदी 30 रूपए प्रति दिन खर्च करते हैं. सिर्फ़ पाँच फ़ीसदी ऐसे हैं जिनका एक दिन का खर्च 30 रूपए से ज़्यादा है. इस लिहाज़ से देखें तो गाँवों में रहने वाले ग़रीब लोगों पर महँगाई की मार का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. हालाँकि इस वर्ष गेहूँ का उत्पादन राहत का संदेश लेकर आया है. ताज़ा आकलन के मुताबिक इस वर्ष रिकॉर्ड सात करोड़ 80 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ है और मॉनसून के समय से पहले पहुँचने से ख़रीफ़ की फ़सल भी बेहतर होने की उम्मीद की जा रही है. |
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