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मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008 को 14:05 GMT तक के समाचार
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अनाज इतना महँगा क्यों, उपाय क्या?
कई देशों में चावल, गेहूँ, मक्के की क़ीमतें दोगुनी तक बढ़ गई हैं
दुनिया के कई देशों में गेहूँ, चावल और मक्के की क़ीमतें पिछले एक साल में दोगुनी हो गई हैं.

चावल की क़ीमत एक दशक में सबसे ऊँचे स्तर पर है. जबकि कुछ देशों में दूध और माँस के दाम भी दुगुने हो चुके हैं.

भारत, चीन, बांग्लादेश, थाइलैंड, इंडोनेशिया, पाकिस्तान से लेकर कैरिबायाई देशों तक में अनाज का संकट गहराता जा रहा है.

अनाज के इस विश्वव्यापी संकट से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब

महंगाई इस समय क्यों बढ़ने लगी है?

ऐसा लग रहा है कि तीन दशकों की सुविधाजनक स्थितियाँ ख़त्म हो चुकी हैं, जब बुनियादी खाद्य पदार्थों के दाम कमोबेश क़ाबू में रहे थे.

महँगाई की मार ग़रीबों पर सबसे ज्यादा

इतना ही नहीं बाक़ी चीज़ों की तुलना में गेहूँ, मक्के और सोयाबीन के दाम बरसों तक घटते भी रहे. खाद्यान्नों की आसान उपलब्धता का एक असर ये रहा कि कई देशों ने विषम परिस्थितियों के लिए अनाज का ज़्यादा बड़ा सुरक्षित स्टॉक रखना छोड़ दिया.

यानी सब कुछ बढ़िया चल रहा था. लेकिन अब लगता है कि खाद्य सुरक्षा की वो स्थिति ख़त्म होने जा रही है. अधिकतर विश्लेषकों को लगता है कि अस्थिरता के एक दौर की शुरुआत हो रही है, जिसमें महंगाई की मार लंबे समय तक पड़ने वाली है.

मौजूदा स्थिति में किसको हानि हो रही है, और कौन फ़ायदा कमा रहे हैं?

सबसे ज़्यादा परेशानी विकासशील देशों के उन करोड़ों ग़रीबों को हो रही है, जिनकी आय का अधिकांश हिस्सा खाद्यान्न पर ख़र्च हो रहा है. ग़रीबों की हताशा विरोध प्रदर्शनों के रूप में निकल रही है. इसके कारण हैती से लेकर इंडोनेशिया तक राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बन गया है. विश्व बैंक का कहना है कि महंगाई के कारण कई विकासशील देश निर्धनता उन्मूलन के लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएँगे.

आसमान छूती क़ीमतों से जिन लोगों को फ़ायदा हो रहा है, उनमें अमरीका, ब्राज़ील, अर्जेंटीना, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के किसान प्रमुख हैं. जिन्हें उनकी उपज की ज़बरदस्त क़ीमत मिल रही है.

खाद्यान्नों की बढ़ती क़ीमतों के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?

सबसे बड़ी वज़ह है दुनिया की आबादी का लगातार बढ़ते जाना. एक अनुमान के अनुसार इस सदी के मध्य तक दुनिया की आबादी नौ अरब को पार कर जाएगी. इतनी बड़ी आबादी को दो वक़्त की रोटी उपलब्ध करना ज़ाहिर है, कोई आसान काम नहीं है. क्योंकि बढ़ती आबादी का बोझ भूमि, जल और तेल के साथ-साथ खाद्यान्नों की आपूर्ति पर भी पड़ता है.

अब पहले की तरह बड़े बफ़र स्टॉक नहीं रखे जाते

लेकिन ये भी सच नहीं है कि महँगाई बढ़ने का एकमात्र कारण आबादी में वृद्धि ही है. चीन और भारत की बढ़ती समृद्धि को भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है. सीधे-सीधे कहें तो एक धनी व्यक्ति किसी ग़रीब से ज़्यादा खाता-पीता है. यानी चीन और भारत के बढ़ते मध्यवर्ग के लिए ज़्यादा मात्रा में माँस और प्रसंस्करित खाद्य पदार्थ चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य संगठन का मानना है कि खाने पीने के सामान की विश्वव्यापी बिक्री में 80 प्रतिशत हिस्सा प्रसंस्करित खाद्य और पेय पदार्थों का होता है.

ये तो माँग-आपूर्ति से जुड़ी बातें हुईं. और क्या कारण हो सकते हैं?

बढ़ती आबादी का विपरीत असर पर्यावरण पर भी पड़ा है और पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन के असर की बात से तो अब कोई भी इनकार नहीं कर रहा है.

चीन और सहारा के दक्षिणवर्ती अफ़्रीका में उपजाऊ ज़मीन के ऊसर बनने की प्रक्रिया बड़े पैमान पर चल रही है. साथ ही बरसात के पैटर्न बदलने और बाढ़ की निरंतरता बढ़ने का भी कृषि उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है.

खाद्यान्नों की क़ीमत पर जलवायु परिवर्तन का असर एक और तरह से पड़ा है. कृषि उत्पादों में बायोईंधन के लिए उगाई जा रही चीज़ों का अनुपात बढ़ता जा रहा है. उदाहरण के लिए 2010 तक अमरीका में उगाए जा रहे मक्के की 30 प्रतिशत एथेनॉल नामक ईंधन के लिए होगा. मतलब खाद्यान्नों के लिए उपलब्ध ज़मीन कम रह जाएगी. सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उपलब्ध मक्के के आटे पर पड़ेगा.

अब करना क्या होगा?

कई देश खाद्य पदार्थों पर रियायतों की घोषणा कर चुके हैं. विश्व बैंक ने ग़रीबों के लिए और ज़्यादा रियायतें देने की माँग की है.

बढ़ती समृद्धि को भी एक कारण माना जा रहा है

बैंक ने अफ़्रीका के किसानों को सहायता राशि दुगुना करने की घोषणा की है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य कार्यक्रम ने आपातकालीन खाद्य सहायता के लिए 50 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त व्यवस्था किए जाने की माँग की है.

माना जाता है कि विश्व व्यापार वार्ताओं के आगामी दौर में सहमति पर पहुँचना और भी मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि वार्ताओं के केंद्र में कृषि का मुद्दा ही होगा.

ऑक्सफ़ैम जैसी संस्थाओं का तो ये भी कहना है कि विकासशील देशों के बाज़ार को खोलने की माँग करने वाले अमीर देशों को छोटे किसानों के हित की बात भी सोचनी चाहिए.

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