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चंद दिनों में साफ़ हो गए अरबों रुपए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय शेयर बाज़ारों में इस हफ़्ते के पहले दो कारोबारी दिनों में आई ज़बर्दस्त गिरावट से निवेशकों को लगभग दस लाख करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है. दिसंबर के आख़िरी पखवाड़े में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक 21 हज़ार के आँकड़े के पार कर 22 हज़ारी होने की कग़ार पर था लेकिन पिछले एक हफ़्ते में सारी तेज़ी धरी की धरी रह गई. जब मंगलवार को कारोबार ख़त्म हुए तो वही सेंसेक्स 16 हज़ार 729 अंकों पर बंद हुआ. हाल तो और बुरा था जब सूचकांक 16 हज़ार के भी नीचे चला गया लेकिन वित्त मंत्री के ठोस बयान से बाज़ार में कुछ सुधार हुआ. गिरावट की इस आंधी में कंपनियों को हुए नुकसान पर सरसरी नज़र डालें तो अनिल अंबानी की कंपनी एक लाख करोड़ रूपए से अधिक पूँजी खो चुकी है. वहीं हाल ही में शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध हुए डीएलएफ़ को 72 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक का नुकसान हुआ है. सेंसेक्स के कुछ प्रमुख शेयरों पर नज़र डालें तो रिलायंस इंडस्ट्रीज का एक शेयर हफ़्ता भर पहले जहाँ 3200 रूपए में मिल रहा था, उसके भाव टूट कर 2100 रूपए रह गए. यही हाल फर्मा, आईटी, मेटल या यूँ कहें कि सभी क्षेत्रों की कंपनियों का है. मिसाल के तौर पर चीनी और ईथेनॉल का कारोबार करने वाली कंपनी बजाज हिंदुस्तान का एक शेयर पिछले हफ़्ते 350 रूपए से ऊपर में बिक रहा था, मंगलवार को उसी शेयर को 150 रूपए में ख़रीदने वाले नहीं मिल रहे थे. उम्मीद की किरण अमरीका में पहले बेरोज़गारों की संख्या में वृद्धि और फिर मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र में सुस्ती की ख़बर आने के बाद मंदी की आशंका में दुनिया भर के पूँजी बाज़ार को झटका लगा है.
जापान का निक्केई, ताईवान स्ट्रेट, हॉंगकॉंग का हैंगसेंग, कोरियाई कोस्पी सभी सूचकांक गोता लगा रहे हैं. मामाल 1997 में आए संकट जैसा है, लेकिन तब सिर्फ़ दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश ही प्रभावित हुए थे. कारण था, विदेशी निवेशकों का पैसा समेट कर निकल लेना. यही अब हो रहा है. भारतीय शेयर बाज़ारों में पिछले साल लगभग दस अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक बाहर निकल रहे हैं. अमरीकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज़ दरें घटा कर स्थिति नियंत्रण में करने की कोशिश की है. उम्मीद है कि इससे बाज़ार में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा. लेकिन भारतीय बाज़ारों में ऊतार-चढ़ाव का दौर अभी कुछ दिनों तक जारी रह सकता है. इसके घरेलू कारण भी हैं. महँगाई की दर फिर बढ़ी है और आर्थिक विकास दर (जीडपी) में भी इस साल कुछ कमी आने की संभावना जताई गई है. ऊपर से भयभीत ख़ुदरा निवेशक अभी थोड़े सहमे हुए हैं. हाँ, गिरावट ने ख़रीदारी के लिए कुछ आकर्षक अवसर ज़रूर दे दिए हैं. मार्जिन मनी जानकारों के मुताबिक गिरावट का रूख़ तेज़ करने में ब्रोकिंग कंपनियों की भी भूमिका रही है.
दरअसल शेयरों में लगातार निवेश करने वाला व्यक्ति हमेशा पूरे पैसे देकर शेयर नहीं खरीदा करता. ब्रोकिंग कंपनियाँ अपने ग्राहकों को उधार देती हैं और आप एक निश्चित अनुपात में पैसे चुकता कर शेयर ख़रीद सकते हैं, बाकी पैसे बाद में देने होते हैं जिसे मार्जिन मनी कहते हैं. लेकिन बाज़ार गिरता देख ब्रोकिंग कंपनियों ने ऐसे ग्राहकों के शेयर बेचने शुरू कर दिए क्योंकि उन्हें लगा कि शेयर भाव ज़मीदोंज़ होने पर ग्राहक उधारी चुकाने में असमर्थ हो सकता है. इसलिए निवेशकों के लिए फिलहाल सही रणनीति है कि वो पूरे पैसे देकर शेयर ख़रीदें. |
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