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सोमवार, 02 अप्रैल, 2007 को 12:51 GMT तक के समाचार
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तेज़ गिरावट से निवेशकों में चिंता

निवेशक
सोमवार को आई भारी गिरावट से निवेशकों की चिंता बढ़ गई है
छोटी अवधि के लिए ब्याज़ दर बढ़ने का प्रतिकूल असर शेयर बाज़ार पर तो होना ही था लेकिन ये असर इतना अधिक होगा इसकी आशंका नहीं थी.

रेपो रेट वह ब्याज़ दर है जिस दर पर रिजर्व अन्य बैंको को कर्ज़ देता है और सीआरआर बैंकों के पास कुल जमा राशि का वह अनुपात है जो उन्हें रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है.

रिज़र्व बैंक की कोशिश लगातार बढ़ती मँहगाई पर लगाम कसने की थी. इन दरों में बढ़ोतरी का मतलब है कि रिजर्व बैंक बाज़ार में नगदी पर कुछ नियंत्रण करना चाह रहा है क्योंकि अगर ब्याज़ दरें बढ़ेंगी तो धन के प्रवाह में कमी तो आएगी ही.

इस क़दम के पीछे चुनाव के मौसम में मँहगाई को लेकर सरकार की चिंता साफ झलक रही है.

लेकिन मँहगाई की चिंता के चलते ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था की तेज़ रफ़्तार पर पड़ सकता है और इसी ख़याल से सोमवार को शेयर बाज़ार में जमकर बिकवाली हुई.

बिकवाली

खंबाटा सेक्युरिटीज़ के निदेशक सुनील शाह कहते हैं कि इस क़दम से मँहगाई पर रोक लगे या न लगे बाज़ार का रूख़ तो नकारत्मक होगा ही.

रिज़र्व बैंक के इन क़दमों से अगर अर्थव्यवस्था की गति धीमी होती है तो इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफ़े पर होगा.

शेयर बाज़ार में कंपनियों के शेयरों के भाव भविष्य में कमाई को नज़र में रखते हुए तय किया जाते हैं. ऐसे माहौल में एक सवाल ये उठेगा कि हमने कंपनियों द्वारा भविष्य में कमाई का जो अनुमान लगाया वो कहीं गड़बड़ा तो नहीं जायेगा. यही संशय बिकवाली को हवा दे रहा है.

 देखिए भारतीय बाज़ार में सुधार का अर्थ ही है क्रेश. और जब भी मार्केट बंद होने के बाद कोई घोषणा होती है जैसा कि शुक्रवार को हुआ घबराहट में बिकवाली शुरु हो जाती है, ऐसा पहले भी हो चुका है
हेमंत कपाड़िया, शेयर ब्रोकर

कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार फिलहाल सुधार के दौर से चल रहा था. रिजर्व बैंक की ब्याज़ दरों में फेरबदल ने इस गिरावट के लिए एक और वजह दे दी.

शेयर ब्रोकर हेंमत कपाड़िया ने बीबीसी को बताया, "देखिए भारतीय बाज़ार में सुधार का अर्थ ही है क्रेश. और जब भी मार्केट बंद होने के बाद कोई घोषणा होती है, जैसा कि शुक्रवार को हुआ, घबराहट में बिकवाली शुरु हो गई, ऐसा पहले भी हो चुका है."

असर

ब्याज़ की दरें बढ़ने का बड़ा नुकसान ज़ाहिर है बैंकों और वाहन क्षेत्र की कंपनियों पर पड़ा है. ऊँची ब्याज दरों पर ऋण लेने वालों में कमी आ सकती है जिसका असर बैंकों के मुनाफ़े पर पड़ सकता है.

गाड़ी ख़रीदने के इच्छुक ग्राहक भी मंहगी ब्याज़ दर के चलते अपना फ़ैसला टाल सकते हैं.

ब्याज दर बढ़ने का सबसे अधिक असर अचल संपत्ति के कारोबर पर पड़ेगा. रिजर्व बैंक की घोषणा के बाद आईसीआईसीआई और एचडीएफसी बैंक ने होम लोन पर ब्याज दर एक बार फिर बढ़ा दिया है.

दो साल पहले बीस साल की अवधि के लिए लगभग सात फ़ीसदी की दर से होम लोन मिल रहा था जो अब बढ़ कर 13 फ़ीसदी के आस-पास पहुँच चुका है.

आने वाले दिनों में कंपनियाँ चौथी तिमाही के नतीजों की घोषणा करेंगी और अगर नतीज़े अच्छे आएँ तो बाज़ार सुधर सकता है.

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