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सेंसेक्स पर विदेशी बाज़ारों का असर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अक्सर ये देखा गया है कि जब भी विदेशी बाज़ारों में उतार-चढ़ाव होता है तो उसका असर बीएसई यानी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर भी पड़ता है. कुछ दिन पहले अमरीकी डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ तो उसका असर भारतीय बाज़ार पर पड़ा. जानकारों का मानना है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया का परिणाम ये भी हुआ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और स्टॉक बाज़ार दुनिया के बाज़ारों के प्रभाव से अछूता नहीं रह गया है. केजरीवाल रिसर्च एंड इंफ़ॉर्मेशन सर्विस के निदेशक अरुण केजरीवाल कहते हैं, ''वैश्वीकरण के चलते विदेशी निवेशक आराम से एंट्री और एग्ज़िट कर सकते हैं. इसकी वजह ये हैं कि लोगों के पास एक मौका है कि वे दुनिया भर में जो बाज़ार अच्छा कर रहे हैं वहाँ निवेश करें" विदेशी बाज़ारों में उठापटक कुछ जानकार मानते हैं कि अमरीकी और बड़े एशियाई बाज़ारों की उठा-पटक का असर अस्थाई ही होता है. एचडीएफ़सी बैंक के अभय आइमा कहते हैं कि एक दिन का असर तो होता है लेकिन आम तौर पर भारतीय बाज़ार अपनी मज़बूती पर ही चलता है. उनका कहना है, "अंतरराष्ट्रीय प्लेयर मानते हैं कि इंडिया की ग्रोथ स्टोरी अलग है. जैसे अभी जो दक्षिण पूर्व एशिया के बाज़ारों में गिरावट के बाद बीएसई पर भी गिरावट तो आई लेकिन हमारी रिकवरी बाक़ियों से कहीं अधिक तेज़ थी." उनका मानना है कि किसी ठोस आर्थिक कारण के बजाय ये प्रभाव मनोवैज्ञानिक ज़्यादा होता है, लोग एहतियातन बिकवाली शुरु कर देते हैं ताकि जो कुछ भारत के बाहर हुआ उसके चलते उन्हें नुकसान ने उठाना पड़े. अभय आइमा का कहना है कि वास्तविक असर उतना नहीं होता जितना सेंटिमेंटल असर होता है और वो भी दिन-भर के लिए ही रहता है. इस बारे में मोतीलाल ओसवाल सिक्यूरिटीज़ के सीएमडी मोतीलाल ओसवाल का कहना है, "नेगेटिव सेंटीमेंट की वजह से बिकवाली का दबाव आ जाता है. इस दबाव में छोटे निवेशक और विदेशी निवेशक दोनों ही आ जाते हैं. ऐसे माहौल में ख़रीदारी इसलिए कम हो जाती है क्योंकि खरीदने वाला सोचता है कि बाज़ार नीचे जा रहा है तो क्यूँ न निचले स्तर पर खरीदूं." वैश्वीकरण
भारत की कई बड़ी-छोटी आईटी कंपनियाँ अमरिकी कंपनियों के लिए सॉफ़्टवेयर तैयार करती हैं. उनकी कमाई का अहम हिस्सा यहीं से आता है. ज़ाहिर है ऐसे में अमरीकी अर्थव्यवस्था में हलचल का असर इन कंपनियों पर भी पड़ता है. तो अगर न्यूयॉर्क का नैसडेक इंडेक्स अमरीका में महंगाई दर में बढ़ोत्तरी या डॉलर कमज़ोरी से प्रभावित होता है तो उसका असर भारतीय आईटी कंपनियों के व्यापार पर भी पड़ता है. इसलिए भारतीय बाज़ार में भी इन कंपनियों के शेयरों में उठापटक होती है. मोतीलाल ओसवाल कहते हैं," अमरीकी बाज़ार निश्चित तौर से एक चलन की अगुआई करते हैं. वहां की बड़ी इंवेस्टमेंट कंपनियों के पास इमर्जिंग मार्केट्स के लिए एक ख़ास एलोकेशन होता है. यही पैसा जहाँ भी बढ़िया कमाई की उम्मीद होती है वहाँ पहुंच जाता है." अरुण केजरीवाल का कहना है कि अमरीका में घरेलू बाज़ारों पर मुद्रास्फ़ीति, ब्याज़ दरों और रोज़गार के आंकड़ों का ख़ासा प्रभाव रहता है. अच्छे अमरीकी आंकड़े भारतीय और एशियाई बाज़ारों के लिए शुभ सूचना रहते हैं और ख़राब आंकड़ों का असर ज़ाहिर है नकरात्मक होता है. न्यूयॉर्क में जो कुछ होता है उसका असर सुबह एशिया के बाज़ारों जैसे - निक्केई, कोप्सी और हैंग सैंग में और उसके बाद भारत में होता है. वैश्वीकरण के कारण दुनिया करीब आ गई है और दुनिया का कारोबार राजनीतिक सीमाओं का मोहताज नहीं रहा है. वैसे अच्छी ख़बर ये है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी मज़बूती बनाए हुए है.आठ प्रतिशत से अधिक विकास दर ने भारत में निवेशकों की रुचि बरक़रार रखी हुई है. ये शेयर बाज़ार 17 मई 2004 के काले सोमवार के दिन 4505 पर बंद हुआ था और अब 13000 छू चुका है. दो साल में तीन गुना बढ़ोत्तरी से भला किसे एतराज़ होगा. |
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