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बजट: इंडिया के लिए, भारत के लिए नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बजट 2005 दरअसल यह बताता है कि उसकी चिंता के दायरे में अब भारत नहीं, बल्कि इंडिया है. इंडिया से आशय महानगर और बड़े शहर हैं, बड़े निवेशक हैं. अर्थव्यवस्था के बुनियादी मुद्दों जैसे रोज़गार, ग्रामीण क्षेत्र को आधारभूत ढांचे की खास चिंता यह बजट नहीं करता है. बजट और लघु उद्योग जैसे के आसार बन रहे थे कि लघु उद्योगों के आरक्षित सौ से ऊपर वस्तुओं को अनारक्षित कर दिया गया है और लघु उद्योग में निवेश की सीमा को तीन करोड़ से बढ़ाकर चार करोड़ कर दिया गया है. अर्थात और बड़े उद्योग पिछले दरवाजे से लघु उद्योग क्षेत्र में दाखिल हो सकते हैं, और छोटी पूंजी वाले लघु उद्योगों के लिए स्थितियां और मुश्किल होती जाएंगी. बजट और आधारभूत ढांचा बजट में 5,500 करोड़ रुपये बड़े शहरों के विकास के लिए रखे गये हैं। इसके अलावा बजट में प्रस्ताव है कि विदेशी मुद्रा कोष की रकम से देश के आधारभूत ढांचे का विकास किया जाएगा. विदेशी मुद्रा कोष से देश के आधारभूत ढांचे के विकास के विचार में कई तरह की समस्याएं हैं. विदेशी मुद्रा कोष से किस तरह से आधारभूत ढांचे का विकास किया जायेगा, यह अभी तक साफ़ नहीं हो पाया है. क्या इस कोष से सीधे ही विदेश से ही सामग्री और श्रम सेवाओं का आयात किया जाएगा, या फिर विदेशी मुद्रा कोष की विदेशी मुद्रा के बदले देशी मुद्रा ली जाएगी और उससे आधारभूत ढांचे का विकास किया जाएगा. विदेशी मुद्रा कोष में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, उससे देश के आधारभूत ढांचे को जोड़ा जाना उचित नहीं है. अगर किसी कारण से भविष्य में विदेशी मुद्रा कोष में कमी आती है, तो क्या आधारभूत ढांचे के विकास के काम रोक दिए जाएंगे. फिर इस बजट ने आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर पेट्रोल और डीजल पर पचास पैसे प्रति लीटर भाव बढ़ाने के इंतज़ाम कर लिए हैं. इस बढ़ोत्तरी का सीधा परिणाम तमाम वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों की शक्ल में सामने आएगा. गौरतलब यह है कि परिवहन व्यय में हुई बढ़ोत्तरी अधिकांश वस्तुओं की कीमत को प्रभावित करती है. इस तरह से यह बजट परोक्ष रुप से महंगाई बढ़ाएगा. दस हज़ार रुपए की निकासी पर कर बजट का सर्वाधिक विवादास्पद प्रस्ताव है-बैंकों से दस हजार रुपए की निकासी पर 0.1 प्रतिशत की दर का कर. ऐसा वित्तमंत्री ने कालेधन पर रोक लगाने के लिए किया है. इसका मतलब यह हुआ कि हर बार दस हजार रुपए निकालने पर खाताधारकों को 0.1 प्रतिशत का कर देना पड़ेगा. यह समझ पाना मुश्किल है कि दस हजार रुपये की निकासी पर इस तरह के टैक्स से काला धन कैसे रुकेगा. दस हज़ार की रकम आज की तारीख़ में इतनी बड़ी रकम नहीं है कि उसमें सिर्फ़ काले पैसे वाले ही डील करें. इससे तमाम निम्नमध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय निवेशकों के लिए परेशानी बढ़ेंगी. कालेधन को बाहर निकालने के कई उपाय हैं, एक हज़ार रुपये के नोट का चलन बंद करना उनमें से एक हो सकता था. शेयर बाजार और बजट शेयर बाज़ार ने बजट पर धांसू प्रतिक्रिया दी है. मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक सेनसेक्स 144 बिंदु उछलकर बंद हुआ है. शेयर बाजार के जानकारों की मान्यता है कि इस बजट से कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा. कंपनियों का मुनाफ़ा बढ़ेगा, पर आम आदमी के रोजगार बढ़ने की जुगाड़ इस बजट में नहीं दिखाई पड़ती. बजट और रोजगार वैसे वित्तमंत्री का दावा है कि बजट से रोज़गार के अवसरों में बढ़ोत्तरी होगी, पर साफ़ नहीं होता कि वह अपने दावे को किस तरह से पूरा करेंगे. लघु उद्योग देश में रोजगार मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उसके लिए समस्याएं इस बजट के बाद बढ़ जाएंगी. रोजगार के आंकड़े जो आर्थिक सर्वेक्षण ने पेश किए हैं, वे काफी निराशाजनक थे. उनकी निराशा बजट के आंकड़ों से दूर नहीं होती. 2004 में करीब चार करोड़ पंजीकृत बेरोजगार थे. सन् 2004-05 के पहले नौ महीनों में सिर्फ़ एक लाख लोगों को ही रोजगार दिया जा सका. एक तरफ स्टाक बाजार और उद्योग जगत लगातार बढ़ोत्तरी दिखा रहा है, दूसरी तरफ रोजगार की बढ़ोत्तरी दर लगातार कम हो रही है. बजट पर बड़े उद्योगों और शेयर बाजार ने सकारात्मक प्रतिक्रिया जतायी है. पर गौरतलब है कि इन दोनों क्षेत्रों का रोजगार सृजन से बहुत कम संबंध है. |
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