|
कृषि की विकास दर बढ़ानी होगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने अपने राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम (एनसीएमपी) कृषि क्षेत्र के तेज विकास के साथ ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार के अधिक अवसर और विकास की गति तेज करने का वादा किया है. सरकार का जुलाई, 2004 में पेश पहला बजट इस उम्मीद पर खरा नहीं उतरा और इस साल कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.1 फ़ीसदी पर सिमटने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसलिए 28 फ़रवरी को पेश होने वाले 2005-06 के आम बजट में वित्त मंत्री पी चिदंबरम के सामने चुनौती है कि वे कृषि क्षेत्र को बजट के केंद्र में रखें और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र की सेहत सुधारने के लिए ठोस क़दम उठाएँ. चालू साल के बजट में कृषि, सहकारिता, पशुपालन और अनुसंधान के लिए कुल बजटीय प्रावधान 5303 करोड़ रुपए रहा था. इसमें आयोजना और ग़ैर-आयोजना दोनों तरह का प्रावधान शामिल है. विकास दर दूसरी ओर खुद योजना आयोग के उपाध्यक्ष इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की आठ फ़ीसदी की विकास दर के लिए कृषि विकास दर का 3.5 फ़ीसदी होना ज़रूरी है. इसे हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में निवेश का भी जीडीपी का 3.5 फ़ीसदी होना ज़रूरी है. लेकिन इस समय सार्वजनिक निवेश का स्तर एक फ़ीसदी से भी कम आ गया है. इसलिए इस रुख़ को बदलने का जिम्मा चिदंबरम को उठाना होगा. यह निवेश ढाँचागत सुविधाओं और खासतौर से सिंचाई सुविधाओं में करने की ज़रूरत है क्योंकि अभी भी भारतीय कृषि का दो-तिहाई हिस्सा असिंचित है. इसका कारण सिंचाई सुविधाओं में सार्वजनिक निवेश का घटता जाना रहा है. हालाँकि चालू साल के बजट में त्वरित सिंचाई सुविधा कार्यक्रम के तहत 2800 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था. लेकिन इसका क्या परिणाम रहा वह 28 फरवरी को बजट पेश करते समय वित्तमंत्री कार्यान्वयन का जो लेखा-जोखा रखेंगे उसमें ही पता चलेगा. बागवानी और विपणन कृषि मंत्री शरद पवार की प्राथमिकताओं और चिदंबरम के सलाहकारों की नीतियों को करीब से देखने पर एक बात स्पष्ट होती है कि इस बजट में सबसे अधिक जोर विपणन सुविधाओं और बागवानी क्षेत्र पर होगा. इन दोनों को बढ़ावा देने के लिए ढाँचागत सुविधाओं के भारी निवेश की जरूरत है और इस संबंध में कुछ कर प्रावधानों में ढील भी दी जा सकती है.
वहीं कृषि आय पर कर लगाने के लिए कारपोरेट जगत द्वारा हमेशा की तरह की जा रही माँग में वामपंथी दलों के कुछ संगठनों का सुर मिल जाने के बावजूद वित्तमंत्री इसे स्वीकार करने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है. इन लोगों का मानना है कि केवल खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ावा देने से किसानों का भला नहीं होने वाला है. इसके लिए एक ओर जहाँ किसानों को विविधिकरण के लिए प्रोतिसाहित करना होगा वहीं उनके लिए विपणन सुविधाओं को मज़बूत करना होगा ताकि किसान को उसकी उपज की उचित कीमत मिल सके. विविधिकरण के मामले में सबसे अधिक प्राथमिकता बागवानी फसलों को दी जा रही है. इसका एक कारण जहाँ देश में इन फसलों के लिए एक बड़े बाज़ार का होना है वहीं निर्यात बाज़ार में भी संभावनाएं बेहतर हैं. लेकिन इसके लिए जहाँ बेहतर ढाँचागत सुविधाओं की जरूरत है वहीं बेहतर गुणवत्ता की प्रजातियों की भी जरूरत है. इसलिए बजट में एक बार फिर कृषि शोध को महत्व दिया जाएगा और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के लिए वित्तीय आवंटन बेहतर रहने की संभावना है. अभी भी देश के अधिकांश हिस्से में किसानों को उचित विपणन सुविधाएं उपलब्ध नहीं है. इसके लिए केंद्र सरकार एक बार फिर राज्यों को कृषि विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में संशोधन कर इसे व्यावहारिक बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की ओर कदम उठा सकती है. ऋण सुविधाएँ कृषि क्षेत्र की एक अहम जरूरत सस्ती ब्याज़ दरों पर ऋण सुविधाएँ उपलब्ध कराना है. पिछले दो साल में कृषि क्षेत्र के लिए ब्याज़ दरों में कमी तो आई है, लेकिन कृषि ऋण ढाँचा अभी भी बेहतर स्थिति में नहीं है.
कृषि ऋण को चालू साल में एक लाख पाँच हज़ार करोड़ रूपए तक पहुँचाने का लक्ष्य सरकार ने रखा है और यह लक्ष्य के करीब पहुँचता भी दिख रहा है लेकिन किसान क्रेडिट कार्ड के सहारे बढ़ रहे इस ऋण आवंटन में सहकारी क्षेत्र की भूमिका बहुत अधिक नहीं है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी वित्तीय संस्थाओं की पहुँच अधिक है. इसलिए सहकारी बैंकों के वित्तीय पुनर्गठन के लिए गठित व्यास समिति की जो सिफारिशें सरकार को मिल चुकी हैं उन पर अलम की घोषणा वित्तमंत्री इस बजट में कर सकते हैं. कृषि क्षेत्र से जुड़ा एक अहम सवाल सहकारिता का है. सहकारी आंदोलन का फ़ायदा पशुपालन और डेयरी क्षेत्र के साथ ही चीनी उद्योग में भी किसानों को मिल चुका है और अब महाराष्ट्र में बागवानी क्षेत्र में सहकारी आंदोलन कामयाब होता दिख रहा है. इसलिए सहकारी आंदोलन को मज़बूत करने के लिए केंद्र सरकार संविधान संशोधन की घोषणा बजट में कर सकती है क्योंकि बहुराज्यीय सहकारी अधिनियम बनने के बावजूद अधिकांश राज्यों में सहकारी क्षेत्र को स्वायत्ता नहीं दी गई है. कृषि उत्पादों के विपणन में किसानों के लिए अहम भूमिका निभाने वाले इस क्षेत्र के लिए कुछ कदम बजट के जरिए सामने आ सकते हैं. इसी तरह किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और फसलों में लगने वाली बीमारियों से वित्तीय संरक्षण प्रदान करने के लिए कृषि बीमा योजना को अधिक कारगर बनाने की कवायद एक बार फिर से की जाएगी. सब्सिडी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था के बदलाव के लिए आर्थिक सुधारों के एक वर्ग द्वारा की जाने वाली लगातार लाबिंग के बावजूद कोई बदलाव नहीं हो रहा है. जहाँ तक सब्सिडी का सवाल है तो वह उर्वरक सब्सिडी हो या फिर खाद्य सब्सिडी, दोनों में से किसी का सीधा फायदा किसान को नहीं मिलता है. किसान के नाम पर दी जाने वाली इस करीब 40, हज़ार करोड़ रुपए की सब्सिडी को कम करने के लिए उर्वरकों के दाम बढ़ाने या एमएसपी समाप्त करने का जोखिम वित्तमंत्री नहीं उठा सकेंगे. आगामी बजट यूपीए सरकार पूरी तैयारी के साथ पेश कर रही है और यह बजट कृषि क्षेत्र के प्रति इसकी जवाबदेही को तय करने वाला होगा. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||