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गुरुवार, 24 फ़रवरी, 2005 को 11:26 GMT तक के समाचार
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बजट : संतुलन की बड़ी चुनौतियाँ

मनमोहन सिंह और चिदंबरम
किसानों की हालत को सुधारना सरकार की प्राथमिकता सूची में रखना होगा
बजट 2005-2006 भारतीय राजनीति और अर्थनीति के उस मोड़ पर आ रहा है, जिसमें आर्थिक चिंतन के दो परस्पर विरोधी ध्रुव न सिर्फ सरकार चला रहे हैं, बल्कि एक-दूसरे के विरुद्ध राजनीति भी कर रहे हैं.

कुल मिलाकर यह बजट ऐसी ही विरोधाभासी क़िस्म की राजनीति की छाया में बनेगा.

बजट की राजनीति यह है कि सरकार को समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियों का एकदम खुला विरोध उन नीतियों से रहा है, जिनके प्रणेता वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, और वर्तमान वित्तमंत्री पी चिदंबरम माने जाते हैं.

राजनीति

पिछले कुछ महीनों में समय –समय पर वामपंथी पार्टियों ने उन तमाम क़दमों का विरोध किया है, जो आर्थिक उदारीकरण की नीति के तहत इस सरकार ने उठाए थे.

बजट की राजनीति का सिलसिला रेल बजट से ही शुरु हो गया है. रेल बजट की निर्माण प्रक्रिया में प्रधानमंत्री का निर्देश था कि तमाम तरह के अनुदानों में कटौती की जाए. इसका विरोध सरकार के एक घटक दल राजद के लालू यादव ने किया है, जो खुद रेलमंत्री हैं.

सीताराम येचुरी और हरकिशन सिंह सुरजीत
वामपंथी दलों ने सरकार से कहा है कि वे न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर कायम रहें

115 मार्गों पर चल रही रेलगाड़ियों का घाटा, मुफ्त पास जारी करने की लागत वग़ैरह मिलाकर क़रीब 5,500 करोड़ रुपए का घाटा रेलवे को उठाना पड़ता है.

अर्थशास्त्र के तर्क के हिसाब से इसे ख़त्म कर दिया जाना चाहिए. पर राजनीति के तर्क से इसे बंद करना मुश्किल होगा. बीच का रास्ता क्या होगा, यह सामने आना बाक़ी है.

उधर आम बजट को लेकर वामपंथी पार्टियों ने अपने दबाव काफी पहले बनाने शुरु कर दिए हैं.

वामपंथी पार्टियों का दबाव है कि कॉरपोरेट क्षेत्र को दी जाने वाली तमाम छूटों को ख़त्म किया जाए और विदेशी मुद्रा के देश से बाहर जाने पर कर लगाया जाए और उच्च वर्गों पर अधिक कर लगाया जाए.

ऐसा कर पाना आसान नहीं है. पर ऐसा न कर पाना भी आसान नहीं है, क्योंकि वामपंथी पार्टियों की मांग है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम के लिए 50,000 करोड़ रुपए की व्यवस्था की जाए.

इसके तहत 20,000 करोड़ रुपए रोजगार अवसरों के सृजन के लिए, 8,000 करोड़ रुपए शिक्षा और सेहत के इंतज़ाम के लिए और 14,000 करोड़ रुपए ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए रखने की माँग की है.

चिंताएँ और अर्थशास्त्र

ज़ाहिर है कि वामपंथी पार्टियों और लालूजी अपने वोटरों की चिंता कर रहे हैं. पर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की चिंताएं और भी हैं.

सवाल यह उठता है कि तमाम संसाधन कहाँ से आएंगे? इसके लिए करों में बढ़ोत्तरी ज़रुरी है. पर उद्योग जगत की मांग है कि उत्पाद शुल्कों और आयात शुल्कों में कमी की जाए ताकि औद्योगिक विकास की रफ्तार को क़ायम रखा जा सके.

बजट के अर्थशास्त्र का सवाल यह है कि अगर करों में बढ़ोत्तरी न की जाए, नए संसाधन कहाँ से आएंगे.

वैसे आसार ये हैं कि इस साल के बजट में सेवाकर में बढ़ोत्तरी होगी. सेवाओं का कारोबार तेज़ी से विकसित हुआ कारोबार है.

 पब्लिक प्रॉवीडेंट फंड जैसी छोटे निवेशकों की प्रिय योजनाओं की ब्याज दर गिरने के आसार व्यक्त किए जा रहे हैं. हाल में जीएन वाजपेयी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऐसी योजनाओं की ब्याज दर मुद्रा-स्फीति से जोड़ देनी चाहिए. ग़ौरतलब है कि मुदास्फीति की दर फिलहाल करीब पाँच प्रतिशत के आसपास है

आसार हैं कि सेवाकर दस प्रतिशत से बढ़कर कर 12 प्रतिशत हो जाएगा.

इस कर में बढ़ोत्तरी का वामपंथी पार्टियों द्वारा विरोध किए जाने की संभावना भी न्यूनतम हैं. पर परोक्ष तौर पर इसका असर उपभोक्ताओं पर ही पड़ने के आसार हैं.

इस बजट से पहले सबसे ज़्यादा चिंता की बात उन निवेशकों के लिए है जो सुरक्षित निवेश की तलाश कर रहे हैं.

पब्लिक प्रोविडेंट फंड जैसी छोटे निवेशकों की प्रिय योजनाओं की ब्याज दर गिरने के आसार व्यक्त किए जा रहे हैं. हाल में जीएन वाजपेयी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऐसी योजनाओं की ब्याज दर मुद्रा-स्फीति से जोड़ देनी चाहिए. ग़ौरतलब है कि मुदास्फीति की दर फिलहाल करीब पाँच प्रतिशत के आसपास है.

अगर पीपीएफ और ऐसी योजनाओं की ब्याज दर छह प्रतिशत कर दी गई, तो यह सुरक्षित निवेश चाहने वालों के लिए बहुत बड़ा झटका होगा.

पीपीएफ की वर्तमान ब्याज दर आठ प्रतिशत है.

वैसे वामपंथी पार्टियों द्वारा समर्थित ट्रेड यूनियनों ने तो मांग की प्रोविडेंट फंड से जुड़ी योजनाओं पर ब्याज दर कम से कम 12 प्रतिशत होनी चाहिए. मुद्रास्फीति के वर्तमान स्तर को देखते हुए इस दर का प्रावधान तो लगभग असंभव है.

उद्योग

आसार है कि यह बजट लघु उद्योगों के लिए भी कुछ सकारात्मक ख़बर लेकर न आए. इस बजट में घोषणा संभावित है कि लघु उद्योगों के लिए आरक्षित कुछ आइटम अनारक्षित कर दिए जाएँ यानी उन्हें बनाने की छूट बड़े उद्योगों को भी दी जा सकती है.

फ़िक्की का मुख्यालय
उद्योगपतियों और व्यावसायियों को बजट से बड़ी उम्मीदें हैं

ऐसा करने की वजह यह है कि कपड़े, साइकिल, रबर से जुड़े तमाम उत्पादों के क्षेत्र में चीन जिस तरह से प्रतिस्पर्धा कर रहा है, उससे सिर्फ लघु उद्योगों के बूते नहीं निपटा जा सकता.

ग़ौरतलब है कि लघु उद्योगों का भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है.

देश का करीब 40 प्रतिशत औद्योगिक उत्पादन लघु उद्योग क्षेत्र में ही होता है और क़रीब 34 प्रतिशत निर्यात भी यहीं से होता है.

इसके अतिरिक्त बजट में रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के दरवाजे खोले जाने के आसार भी हैं.

कुल मिलाकर आगामी बजट में तमाम प्रस्तावों पर उदारवादी और वामपंथी धड़ों की मारामारी की छाप होने के आसार हैं.

कारपोरेट क्षेत्र को ज्यादा राहतों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

उच्च आय वर्गों की आयकर में बढ़ोत्तरी संभावित है. सेवा क्षेत्र के उद्यमों को और अधिक कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए. और छोटे निवेशकों को कम ब्याज में ही काम चलाने की मानसिक तैयारी भी कर लेनी चाहिए.

कुल मिलाकर यह देखना दिलचस्प होगा, कि बजट में दो विपरीत राजनीतिक विचारधाओं के बीच बजट किस राह पर जाता है.

(लेखक पत्रकार एवं आर्थिक मामलों के विश्लेषक हैं)

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