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विकासशील देशों ने अधिकारों की माँग की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विकासशील देशों ने अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यस्था के मामलों के नीति निर्धारण में छोटे देशों को ज़्यादा अधिकार नहीं दिए जाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की आलोचना की है. दुनिया भर के वित्त मंत्रियों की वाशिंगटन में हो रही बैठक के मौक़े पर विकासशील देशों के संगठन जी-24 ने यह शिकायत की है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के नीति निर्माताओं की यह वार्षिक बैठक शनिवार से शुरू हो रही है. विकासशील देशों ने इस बात पर भी निराशा जताई कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में मतदान छोटे देशों के पक्ष में करने के लिए कोई प्रगति नहीं हुई है. और उन्होंने यह भी कहा है कि अमरीका के खाते में चल रहे नुक़सान की भरपाई भी ग़रीब देशों से ही होती है. विकासशील देशों के मंत्रियों ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता और निराशा जताई कि क़रीब ढाई साल के प्रयासों के बावजूद छोटे देशों के मतदान अधिकार बढ़ाने और मुद्रा कोष में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाने के मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है. विकासशील देश मुद्रा कोष और विश्व बैंक में अपनी सक्रिय भूमिका की माँग कर रहे हैं. यह कशमकश अगले साल जून में और बढ़ सकती है जब विश्व बैंक के अध्यक्ष जेम्स वोल्फ़ेंसन का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. विकासशील देशों के संगठन जी-24 के मंत्रियों ने एक बयान में कहा है कि अगर वोल्फ़ेंसन फिर से पाँच साल के लिए अपना चुनाव नहीं चाहते हैं तो चुनाव प्रक्रिया ज़्यादा पारदर्शी होनी चाहिए जिसमें सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार छाँटे जाने चाहिए. अभी तक यही परंपरा है कि विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर कोई अमरीकी ही बैठता है और मुद्रा कोष के प्रबंध निदेशक का पद किसी यूरोपीय को मिलता है. यह भी सही बात है कि विकासशील देशों के बढ़ते दबाव के बावजूद विकसित देश यही मानते हैं कि मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर उन्हीं का प्रभाव रहना चाहिए क्योंकि अमीर देश इन्हें ज़्यादा धन देते हैं. |
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