| भारत को भी कुछ मिला है:कमलनाथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व व्यापार संगठन के 147 सदस्य देशों ने विश्व व्यापार को खोलने के प्रस्ताव के मसौदे पर आख़िरकार शनिवार को मुहर लगा दी जिसे मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है. इस समझौते से ये समझा जा सकता है कि सभी तरह के अमीर देशों में किसानों को दी जाने वाली सभी तरह की सब्सिडी को ख़त्म कर दिया जाएगा और विकासशील देश अपने आयात करों में कमी करेंगे. अमरीका तथा यूरोपीय संघ के देश अपने किसानों को खरबों डॉलर की सब्सिडी देते हैं जिसमें कमी करने पर सहमति हुई है. इसके बदले विकासशील देशों को तैयार माल को अपने यहाँ आने देने के लिए आयात शुल्कों में कमी करनी होगी. पर सवाल ये है कि ये समझौता आख़िर भारत के लिए कितनी महत्वपूर्ण है. भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री कमलनाथ ने बीबीसी हिंदी से इस विषय पर बात की और कहा कि ये भारत के लिए बहुत बड़ी सफलता है. "भारत के लगातार सवाल उठाने पर ही विकसित देशों ने विकासशील देशों की चिंताओ पर ध्यान दिया है."
कमलनाथ का कहना था कि सब्सिडी घटाए जाने से भारत और विकासशील देशों के किसानों को विश्व के कृषि व्यापार में भाग लेने का मौक़ा मिलेगा. कानकुन में पिछले साल हुई बैठक की विफलता के बाद इस सहमति को मील का पत्थर माना जा रहा है. जबकि इन वार्ताओं पर नज़र रखने वाले अर्थशास्त्रियों और चीन जैसे कुछ देशों का मानना है कि इस वार्ता से कुछ तो हासिल हुआ है लेकिन वो विकासशील देशों की उम्मीदों से काफी कम है. बराबरी लेकिन भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ इस बात से सहमत नहीं हैं. उनका कहना था, "हर विकासशाल देश की अपनी ज़रूरतें हैं लेकिन अगर भारत की बात करें तो हमें इस समझौते से फ़ायदा होगा." "जब धनी देश अपने किसानों को सब्सिडी नहीं देंगे तो कृषि उत्पादन का मूल्य बढेगा. भारत के किसान अमरीकी किसान का मुक़ाबला कर सकते हैं पर अमरीकी सरकार का नहीं, अब मुक़ाबला बराबरी का होगा."
लेकिन कई विश्लेषकों की राय में विकासशील देशों को कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ है और ये समझौता विकसित देशों के दबाव में हुआ है. भारत के परिप्रेक्ष्य में भी कहा जा रहा है कि वो अमरीका सहित दूसरे देशों के दबाव में आ गया है. भारत विकासशील देशों की अगुवाई करता रहा है, फिर क्या उसके दबाव में आने की बात उचित है? कमलनाथ ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा, "ये सही नहीं है. हम पर कौन दबाव डालेगा, और दबाव बनाकर कौन सफल होगा ये तो भविष्य की बात होगी, सच तो ये है कि जो हमें कानकुन और दोहा में नहीं मिला वो अब जाकर मिला है. अब अगले साल से ये प्रावधान लागू होने की प्रक्रिया शुरू होगी." अमीर देशों के किसानों को सरकारी मदद इतनी मिलती है कि वो बाज़ार में अपनी चीज़ें बहुत सस्ती क़ीमतों पर बेच सकते है लेकिन उन क़ीमतों का मुक़ाबला ग़रीब देश नहीं कर पाते हैं और इसीलिए विश्व व्यापार में मामला बराबरी का नहीं होता. अब इस समझौते से स्थिति बेहतर होने की उम्मीद तो ज़रूर लगाई जा रही है लेकिन ये सबकुछ कितने ठोस रूप में होगा, इसके लिए अभी कुछ और साल की बातचीत का इंतज़ार करना पड़ सकता है. |
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