| इस साल बहुत तेज़ी से बढ़ेगी अर्थव्यवस्था | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) का कहना है कि तेल की बढ़ती क़ीमतों के बावजूद दुनिया की अर्थव्यवस्था को इस वर्ष पिछले 30 साल में सबसे ज़्यादा तेज़ी से बढ़ना चाहिए. आईएमएफ़ ने वृद्धि की दर का आकलन 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर पाँच प्रतिशत कर दिया है. इस तरह 1973 के बाद से इसे सर्वाधिक वृद्धि दर बताया जा रहा है. घरों के बाज़ार और व्यावसायिक मुनाफ़े में बढ़ोत्तरी की वजह से इस साल ये वृद्धि हो रही है. मगर आईएमएफ़ ने अगले साल के लिए ये आकलन 4.4 प्रतिशत से गिराकर 4.3 प्रतिशत कर दिया है और इसकी वजह तेल से जुड़ी चिंताएँ बताई गई हैं. आईएमएफ़ के मुख्य अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने कहा कि तेल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी का औद्योगित दुनिया में वृद्धि और महँगाई पर सिर्फ़ सीमित असर ही देखने को मिलेगा. उनका कहना है कि विकसित देश तेल की क़ीमतों में होने वाली बढ़ोत्तरी से अब आराम से निबट लेते हैं जबकि केंद्रीय बैंक महँगाई के मामले में अधिक विश्वसनीयता पा रहे हैं. मगर उन्होंने तेज़ी से उभर रहे देशों को चेतावनी दी कि उनको नुक़सान का ख़तरा सबसे ज़्यादा बना रहता है और उन देशों के केंद्रीय बैंकों को सचेत रहने की ज़रूरत है. तेल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी चिंता का विषय बनी हुई है क्योंकि चीन और भारत में माँग बढ़ रही है जबकि मध्य पूर्व और नाइजीरिया से आपूर्ति में बाधा का संकट बना हुआ है. आईएमएफ़ के अनुसार वैश्विक वृद्धि में अमरीका की ही प्रमुख भूमिका है जिसे एशिया से सहयोग भी मिल रहा है. वैसे अमरीका की वृद्धि दर अगले साल 3.5 प्रतिशत रखी गई है जिसका इस साल 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. आईएमएफ़ के अनुसार औद्योगिक उत्पादन और व्यावसायिक विश्वास यूरोप में बढ़ रहा है जबकि ब्रिटेन यूरोप में सबसे मज़बूत अर्थव्यवस्था बना हुआ है. |
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