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शुक्रवार, 20 अगस्त, 2004 को 21:19 GMT तक के समाचार
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तेल की क़ीमत नई ऊँचाई की ओर
तेल कारोबारी
तेल व्यापारियों के सामने संशय की स्थिति
इराक़ी पाइप लाइनों पर चरमपंथी हमलों के ख़तरे को देखते हुए अमरीका में कच्चे तेल के दाम 48.70 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुए.

एशियाई बाज़ार में भी दाम 50 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुँच गए हैं.

तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के अध्यक्ष पूर्नोमो युसगियान्तोरो ने पत्रकारों को बताया कि वो तेल की क़ीमतों के चढ़ने से काफ़ी चिन्तित हैं.

इराक़ के शिया नेता मुक़्तदा अल सद्र के वफ़ादार लड़ाकुओं के साउथ ऑयल कम्पनी के मुख्यालय में घुसने की ख़बर ने तेल की क़ीमतें और चढ़ा दीं.

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कम्पनी के गोदाम और दफ़्तर में आग लगा दी गई.

न्यू यॉर्क मर्कैंटाइल ऐक्स्चेंज ने तेल के वायदा कारोबार में एक और रिकार्ड बनाया. पिछले साल के जून महीने से क़ीमतों में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन अगर मुद्रास्फ़ीति को ध्यान में रखा जाए तो ये अब भी 1979 में ईरान में आई इस्लामिक क्रान्ति के समय बढ़ी क़ीमतों जैसी नहीं. आज की क़ीमत में देखें तो तब कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल बिका था.

आपूर्ति चिन्ताएँ

तेल की क़ीमतों में हुई यह वृद्धि इराक़ में हिंसा के बढ़ने और तेल सप्लाई के अवरुद्ध होने की आशंका प्रदर्शित करती है. सउदी अरब के बाद इराक़ में दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है.

अधिकांश विश्लेषक ये मानते हैं कि क़ीमतें अभी और चढ़ेंगीं, कम्पनियां और उपभोक्ता, ईंधन और कच्चे माल के बढ़ते दामों से जूझेंगे, जिससे दुनिया का आर्थिक विकास प्रभावित होगा.

कुछ जानकारों का अनुमान है कि कच्चे तेल के दाम 50 डॉलर प्रति बैरल की सीमा लांघ जाएंगे.

तेल की क़ीमतें बढ़ने का एक और कारण ये है कि दुनिया में तेल की मांग बहुत बढ़ गई है. और मांग बढ़ी है अमरीका में विकास दर तेज़ होने और चीन में आ रही आर्थिक ख़ुशहाली से.

हाल के आंकड़े बताते हैं कि चीन में कच्चे तेल का आयात इस वर्ष के पहले सात महीनों में पिछले साल के मुक़ाबले 40 प्रतिशत बढ़ा है.

इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये तेल उत्पादक देश अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं.

उधर रूसी सरकार और तेल कम्पनी यूकोस के बीच चल रहे कर विवाद के कारण भी तेल की क़ीमतों पर असर पड़ा है.

यूकोस ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार उसकी सम्पत्ति ज़ब्त करती है तो उसे तेल उत्पादन बंद करने पर मजबूर होना पड़ेगा.

इस सप्ताह के शुरु में वेनेज़ुएला में एक जनमत संग्रह हुआ था कि राष्ट्रपति के ह्यूगो शावेज़ को सत्ता में रहने दिया जाय या नहीं. इससे तेल बाज़ार में घबराहट पैदा हो गई थी.

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