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भारत की वृद्धि दर उम्मीद से बेहतर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की अर्थव्यवस्था में वर्ष 2004 की पहली तिमाही में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. भारतीय अर्थव्यवस्था में आई यह वृद्धि पूर्वानुमानों से कहीं बढ़कर है. पूर्वानुमान 6.9 प्रतिशत का था और माना जा रहा है कि ऊँची वृद्धि दर की वजह निर्माण और सेवा क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन है. इस अवधि में कृषि क्षेत्र की धीमी प्रगति से आई कमी को इन दो क्षेत्रों ने पाट दिया है, विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कृषि क्षेत्र में औसत से बेहतर वृद्धि होती तो आँकड़ा 8.5 प्रतिशत तक पहुँच सकता था. इस तिमाही में कृषि क्षेत्र में सिर्फ़ 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिसके कारण कुल वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा बहुत बड़ा है और जानकारों का मानना है कि कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार के बिना वृद्धि दर को बनाए रखना संभव नहीं होगा. कृषि क्षेत्र दुनिया की मशहूर वित्तीय सलाहकार कंपनी जेपी मॉर्गन सिंगापुर के अर्थशास्त्री राजीव मलिक कहते हैं, "असली कमज़ोरी कृषि के क्षेत्र में है, लेकिन उद्योग और सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा है." वे कहते हैं, "मेरा मानना है कि भारत की वृद्धि दर अब भी पटरी पर है क्योंकि हमारे हिसाब से भारत की वार्षिक वृद्धि दर छह प्रतिशत होनी चाहिए." पिछले वर्ष भारत की अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी जो दुनिया में चीन के बाद दूसरे पर नंबर पर रही थी. विश्लेषकों का कहना है कि ब्याज दर में कमी के कारण भारत में अधिक संख्या में लोग मकान और कार ख़रीद रहे हैं जिससे अर्थव्यवस्था में तेज़ी आई है. इस वृद्धि का असर साफ़ दिखाई दिया जब मुंबई का तीस प्रमुख शेयरों का सूचकांक तेज़ी से उछला और उसमें 60 अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई. |
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