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गुरुवार, 08 जुलाई, 2004 को 15:39 GMT तक के समाचार
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तीतर भी, बटेर भी

चिदंबरम
सबका ध्यान रखने का प्रयास किया है चिदंबरम ने
विपरीत विचारधाओं के नेताओं को साथ काम करना पड़े, तो परिणामस्वरुप जो हो सकता है, वह बजट 2004-2005 है.

आर्थिक सुधारों के प्रबल समर्थक मनमोहन सिंह, और चिदबंरम की आकांक्षाएं और उन पर वामपंथी दबाव से जो कुछ सामने आया है, उसमें एक तरफ तो आर्थिक सुधारों के रास्ते पर तेजी से चलने की मंशा दिखायी पड़ती है. दूसरी तरफ यह कृषि क्षेत्र, शिक्षा क्षेत्र के प्रति अपनी जवाबदेही जताने में भी बजट पीछे नहीं हटता.

जबकि शिक्षा क्षेत्र में सरकारी निवेश का विचार चिदंबरम की मंशाओं से मेल नहीं खाता. पर यहां मामला वामपंथी दबाव का है.

एक सिरे तो यह बजट तीतर दिखायी पड़ता है, तो दूसरे सिरे से यह बटेर लगता है.

विदेशी निवेश

चिदंबरम और मनमोहन सिंह की सुधारवादी महत्वाकांक्षाएं दिखाई पड़ती हैं विदेशी निवेश के मामले में उदारता के मामले में.

बजट में दूरसंचार क्षेत्र में विदेशी निवेश 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत तक करने की इजाज़त दे दी गयी है.

नागरिक उड्डयन के मामले में इसे 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया है.

बीमा क्षेत्र के मामले में यह प्रतिशत 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया है. यह उदारता सरकार की घटक-वामपंथी पार्टी सीपीआई को रास नहीं आयी है, और उसने इसका विरोध करने का फैसला कर लिया है.

वामपंथियों की पसंद के प्रावधान

पर कृषि और शिक्षा के क्षेत्र में यह बजट यूपीए के वामपंथी दलों को प्रसन्न करने की कोशिश करता दिखायी देता है.

शिक्षा के लिए इस बजट ने 2 प्रतिशत का शुल्क वसूलने का प्रस्ताव किया है.

ट्रेक्टरों को उत्पाद शुल्क से मुक्त कर दिया गया है. शेयर बाजार के सौदों पर 0.15 प्रतिशत का शुल्क लगाने के कदम से भी वामपंथी घटकों को प्रसन्नता होगी.

शेयर बाजार ने इस बजट के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाते हुए गिरावट का रुख अख्तियार किया.

चिंताएँ

इस बजट से जो महत्वपूर्ण चिंताएं रेखांकित होती हैं, वे महंगाई, मुदास्फीति और ब्याज दर को लेकर हैं.

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वामपंथियों का दबाव, पर हर क्षेत्र में नहीं

यह इन चिंताओं के निराकरण के लिए कुछ भी करता प्रतीत नहीं होता.

सेवा कर के दायरे में सेवा क्षेत्र की कई सेवाएं लायी गयी हैं.

सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका होती जा रही है. मुद्रास्फीति बताने वाले सूचकांक में भले ही सेवा क्षेत्र की बढ़ती लागत दिखायी न पड़ती हो, पर वास्तविक जीवन में आम उपभोक्ता इसे महसूस कर रहा है.

सेवा क्षेत्र में कर की दर 8 प्रतिशत से बढ़ाकर दस प्रतिशत किये जाने का परोक्ष प्रभाव तमाम वस्तुओं और सेवाओं की कीमत पर पड़ेगा। ट्यूशन संस्थानों से लेकर विज्ञापन एजेंसियों का बढ़ा हुआ कर.

दायित्व आखिर आयेगा तो उपभोक्ता की जेब से.

इसे यूं समझा जा सकता है कि एक विज्ञापन कंपनी को, जो किसी साबुन का विज्ञापन बनाती है, उसे अब ज्यादा कर देना पड़ेगा.

यह विज्ञापन कंपनी इस बढ़े हुए कर को अपनी साबुन निर्माता कंपनी से वसूलेगी. और साबुन निर्माता कंपनी देर-सबेर इसे उपभोक्ता से वसूलेगी ही.

उत्पाद शुल्क में बढ़ोत्तरी और कटौती के विश्लेषणों तक सीमित अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं को अब इस तरह के परोक्ष प्रभावों का विश्लेषण भी करना चाहिए. दुर्भाग्य से इस ओर दृष्टि कम ही अर्थशास्त्रियों और नेताओं की जाती है.

महंगाई और छोटे निवेशकों की समस्या

मुदास्फीति के मामले में आर्थिक सर्वेक्षण में उम्मीद की गयी थी कि यह पांच प्रतिशत के आसपास रहेगी. पर इस उम्मीद के पूरे होने के आसार बहुत कम हैं.

बैकिंग क्षेत्र में उम्मीद जतायी जा रही है कि भविष्य में उपभोक्ताओं को दिये जाने वाले कर्ज के ब्याज में बढ़ोत्तरी होने की संभावना है. अर्थात बैंकों से मिलने वाले कर्ज तो महंगे होने की संभावना है पर बैंकों द्वारा दी जाने वाली ब्याज दर में बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद नहीं है.

एक आम निवेशक के लिए बजट बहुत उम्मीदें नहीं जगाता. शेयर बाज़ार का जो रुख इस बजट के प्रति दिखाई पड़ता है, उससे साफ होता है कि शेयर बाज़ार में निवेश आम निवेशक के लिए अक्लमंदी का सौदा नहीं है.

उधर बैंकों में निवेश लगातार अनाकर्षक ही हुआ है. ऐसी सूरत में निवेशक करे क्या, इस सवाल का जवाब बजट नहीं देता.

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