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पाकिस्तान शिमला समझौते से बाहर होकर भारत का कितना नुक़सान करेगा, जानिए एक्सपर्ट से
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में चरमपंथी हमले के एक दिन बाद भारत ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कई अहम फ़ैसले लिए थे.
इन फ़ैसलों में रजनयिक मिशन छोटा करने और बॉर्डर बंद करने के अलावा सबसे बड़ा फ़ैसला सिंधु जल संधि को स्थगित करना था.
अब जवाब में पाकिस्तान ने भी भारत के ख़िलाफ़ कई फ़ैसले लिए हैं. भारत अब पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र इस्तेमाल नहीं कर पाएगा. इसके अलावा पाकिस्तान ने 1972 के शिमला समझौते को निलंबित करने की घोषणा की है.
सिंधु जल संधि को स्थगित करने के बाद से ही पाकिस्तान में मांग हो रही थी कि शिमला समझौते से बाहर हो जाना चाहिए.
पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मीर ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा था, ''पाकिस्तान में एक नई बहस चल रही है. अगर भारत विश्व बैंक के मातहत हुई सिंधु जल संधि को अलविदा कहने के लिए प्रतिबद्ध है तो पाकिस्तान को भी शिमला समझौते से बाहर हो जाना चाहिए, जिसमें कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था शामिल नहीं है.''
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पूर्व 'प्रधानमंत्री' राजा मोहम्मद फ़ारूक़ हैदर ख़ान ने एक्स पर लिखा था, ''भारत ने सिंधु जल समझौते को निलंबित करने का एकतरफ़ा फ़ैसला किया है. हमें इसके जवाब में शिमला समझौते से बाहर हो जाना चाहिए. ख़ास कर कश्मीर से जुड़े मामलों में.''
अब पाकिस्तान ने जब शिमला समझौते को निलंबित करने का फ़ैसला किया है, तब कई पाकिस्तानी कह रहे हैं कि इससे उसे फ़ायदा होगा.
इनका तर्क है कि शिमला समझौता पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने से रोकता था लेकिन अब पाकिस्तान बिना किसी राजनयिक बाध्यता के कश्मीर का मुद्दा हर अंतरराष्ट्रीय फोरम पर उठाएगा.
हालांकि शिमला समझौते में रहते हुए भी पाकिस्तान ऐसा करता रहा है. पाकिस्तानी विश्लेषकों का कहना है कि शिमला समझौते से बाहर होने के बाद पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी ज़ोर शोर से उठा सकता है.
क्या है शिमला समझौता
1971 में भारत-पाकिस्तान की जंग के बाद शिमला समझौता हुआ था. यह एक औपचारिक समझौता था, जिसे दोनों देशों के बीच शत्रुता ख़त्म करने के लिए अहम माना गया था.
इसके साथ ही शांतिपूर्ण समझौते को आगे बढ़ाने में भी शिमला समझौते की ख़ास भूमिका मानी जाती थी.
शिमला समझौते के मुताबिक़ दोनों देश सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और शांतिपूर्ण तरीक़ों से करेंगे.
1971 की जंग के बाद शिमला समझौते के तहत लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) बना और दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि इसका सम्मान करेंगे और कोई भी एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं लेगा.
दोनों पक्ष एलओसी को पैमाना मान एक दूसरे के इलाक़े से सैनिकों को हटाने पर सहमत हुए थे.
सिंधु जल संधि को स्थगित करने का जवाब शिमला समझौते से बाहर होना पाकिस्तान के लिए कितना माकूल होगा?
इस सवाल के जवाब में दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं, ''शिमला समझौता पहले से ही मृत है जबकि सिंधु जल संधि की हर लाइन अब भी ज़िंदा है. एक मरे हुए समझौते से ज़िंदा और प्रभावी संधि की तुलना नहीं हो सकती है. पाकिस्तान के लोग उस समझौते को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं, जिसकी हत्या ख़ुद पाकिस्तान बहुत पहले कर चुका है.''
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ''पाकिस्तान पर सिंधु जल संधि को स्थगित होने का बहुत बुरा असर पड़ेगा. पाकिस्तान की 80 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी प्रभावित होगी क्योंकि सिंधु का 70 फ़ीसदी पानी पाकिस्तान को जाता है. पाकिस्तान का 80 फ़ीसदी से ज़्यादा कृषि उत्पाद सिंधु जल संधि से मिलने वाले पानी पर निर्भर है. अगर यह पानी बंद होता है तो पाकिस्तान के लोगों को भारी परेशानी होगी.''
''जहाँ तक शिमला समझौते की बात है तो इसका अब कोई मतलब नहीं है. इसका उल्लंघन पाकिस्तान हर दिन करता है. ऐसे में अच्छा ही है कि वह इस समझौते बाहर हो गया.''
'मरे हुए समझौते की अंत्येष्टि'
थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) के सीनियर फेलो और पाकिस्तान पर नज़र रखने वाले सुशांत सरीन कहते हैं कि पाकिस्तान का शिमला समझौते से बाहर होना भारत के लिए तनिक भी झटका नहीं है.
सरीन कहते हैं, ''इससे भारत को कश्मीर के मामले में बड़े फ़ैसले लेने में मदद ही मिलेगी. दिलचस्प यह है कि शिमला समझौते को पाकिस्तान कब का छोड़ चुका है. पाकिस्तान इस समझौते के साथ कभी रहा ही नहीं. पाकिस्तान अगर इस समझौते को मानता तो करगिल की जंग नहीं छेड़ता. हर दिन सीमा पार से गोलीबारी नहीं करता और आतंकवादियों को पनाह नहीं देता. ऐसे में पाकिस्तान एक मरे हुए समझौते की अंत्येष्टि करना चाहता है तो कर दे.''
क्या भारत ने शिमला समझौते का उल्लंघन नहीं किया है? क्या जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करना शिमला समझौते का उल्लंघन नहीं था?
प्रोफ़ेसर महेंद्र लामा कहते हैं, ''अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना शिमला समझौते का उल्लंघन नहीं था. 370 भारत के संविधान का मामला था और संसद के पास संविधान संशोधन का अधिकार है. शिमला समझौते से पाकिस्तान बाहर होता है तो भारत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. ऐसे भी पाकिस्तान का सामना ताक़त से ही किया जा सकता है न कि शिमला समझौते से.''
क्या भारत सिंधु जल संधि तोड़कर इसके पानी को संभाल सकता है?
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ''संभव है कि अभी संभालना मुश्किल हो लेकिन किसी अहम फ़ैसले पर पहुँचने की शुरुआत ऐसे ही होती है. पानी के कुछ हिस्से को संभालने की व्यवस्था भारत ने की है लेकिन आने वाले सालों में यह व्यवस्था और बढ़ेगी.''
क्या पाकिस्तान का बदला लेगा चीन?
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सरकार में सचिव रहे और वरिष्ठ अधिवक्ता राजा मोहम्मद रज़्ज़ाक़ ने एक्स पर लिखा है, ''भारत सिंधु जल संधि पर कोई भी एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं ले सकता है. भारत को यह अंदाज़ा होना चाहिए कि चीन ब्रह्मपुत्र नदी के मामले में लोअर रिपेरीअन है. यानी ब्रह्मपुत्र चीन से निकलती है. बांग्लादेश में पहुँचने से पहले ब्रह्मपुत्र चीन से भारत आती है. पूर्वोत्तर भारत ब्रह्मपुत्र नदी पर बहुत हद तक निर्भर हैं. चीन भी भारत की तरह फ़ैसला कर सकता है.''
प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा से पूछा कि क्या चीन भी इस तरह का फ़ैसला ले सकता है?
प्रोफेसर लामा कहते हैं, ''ब्रह्मपुत्र नदी के साथ अगर चीन ऐसा करेगा तो बांग्लादेश पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. चीन पाकिस्तान को ख़ुश करने के लिए दो देशों को परेशान करेगा, मुझे ऐसा नहीं लगता है.''
सिंधु नदी भी चीन से ही निकलती है, ऐसे में भारत सिंधु नदी के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकेगा तो क्या चीन चुप रहेगा?
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ''सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है और मुझे नहीं लगता है कि तिब्बत में चीन पानी को संभाल सकता है. अगर चीन पानी रोक भी लेगा तब भी पाकिस्तान को नहीं पहुँचेगा.''
'ये 1971 वाला पाकिस्तान नहीं है'
2016 में उरी में हमले के बाद पीएम मोदी ने सिंधु जल संधि को लेकर कहा था कि पानी और ख़ून साथ नहीं बह सकते.
अब यह बात पाकिस्तान की तरफ़ से कही जा रही है कि अगर सर्वाइवल का संकट होगा तो पानी न सही तो ख़ून ही बहेगा.
दरअसल भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने एक वीडियो पोस्ट कर कहा है, ''133 मिलियन एकड़ फिट पानी हमें मिलता है और मिलता ही रहना चाहिए. अगर ये पानी नहीं मिलेगा और हमारी नदियों में पानी नहीं आएगा तो ख़ून ही बहेगा. ये पाकिस्तान 1971 का नहीं है. ये पाकिस्तान 1998 के बाद का है और हमारे पास परमाणु बम है. इसका ख़्याल आप भी रखिएगा.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.