दुनिया के सबसे बड़े हिमखंड से हम क्या जान सकते हैं?- दुनिया जहान

आइसबर्ग

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एक विशाल आइसबर्ग यानि हिमखंड सफ़र पर निकल चुका है. इसे ए23ए (A23a) के नाम से जाना जाता है. यह कोई मामूली हिमखंड नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड है.

यह लगभग 35 साल पहले अंटार्कटिका के तट से टूटकर अलग हो गया था और तैरते-तैरते दक्षिणी समुद्र में जाकर अटक गया था.

लेकिन 2020 में यह फिर सफ़र पर निकल पड़ा है. एक खरब टन की जमी हुई बर्फ़ का यह आइसबर्ग समुद्र में आगे बढ़ रहा है.

इस हफ़्ते दुनिया जहान में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े हिमखंड से हम क्या जान सकते हैं?

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जन्म

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मैसेच्यूसेट्स स्थित वुड्स होल ओशनोग्राफ़िक इंस्टीट्यूशन में ग्लेसियोलॉजिस्ट यानि हिमनद वैज्ञानिक डॉक्टर कैथरिन वाकर बताती हैं कि दरअसल आइसबर्ग या हिमखंड बर्फ़ का एक विशाल टुकड़ा होता है जो पृथ्वी की दक्षिणी आइस शीट यानि बर्फ़ीली चादर- अंटार्कटिका और उत्तरी ध्रुव की आइस शीट यानि ग्रीनलैंड आइस शीट से टूटकर बिखर जाते हैं.

इसके अलावा कनाडा और रूस के पास भी छोटे आइसबर्ग पाए जाते हैं.

कैथरिन वाकर के अनुसार, ‘अंटार्कटिका ग्रीनलैंड से 10 गुना बड़ा है. ग्रीनलैंड लोरेंटाइड आइस शीट या बर्फ़ीले इलाक़े का हिस्सा था जो हिमयुग के दौरान अमेरिका और यूरोप में फैला हुआ था. लेकिन अब वो पिघल कर सिकुड़ गया है. हालांकि अंटार्कटिका की स्थिति कुछ अलग है.’

“अंटार्कटिका की आइस शीट भी हज़ारों साल पुरानी है. लेकिन यह पत्थर पर बिछी है जिसकी वजह से यह ग्रीनलैंड शीट के मुकाबले आसानी से बरकरार रही है और बढ़ती गर्मी का इस पर उतना ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ा है.”

अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में एक और अंतर है जिसकी वजह से अंटार्कटिका के हिमखंड या आइसबर्ग ज़्यादा बड़े होते हैं.

दोनों ही जगहों पर आइस शेल्फ़ के एक्सटेंशन हैं मगर कैथरिन वाकर का कहना है कि ग्रीनलैंड के आइस शेल्फ़ पिघल कर सिकुड़ते चले गए हैं.

जब अंटार्कटिका के आइस शेल्फ़ के किनारे पतले हो जाते हैं तो वो टूट कर बिखरते हैं और पानी में तैरने लगते हैं. मगर यह टूटे हुए आइस शेल्फ़ पिघलते और जमते रहते हैं और अंटार्कटिका की आइस शीट के इर्द-गिर्द एक बाड़ का काम करते हैं जिसकी वजह से वो समुद्र के गर्म पानी से बचा रहता है.

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डॉक्टर कैथरिन वाकर ने बताया कि यह बर्फ़ की चादर 500 मीटर से भी ज़्यादा मोटी होती है और 100 किलोमीटर तक चौड़ी हो सकती है जो इस महाद्वीप को समुद्र से कुछ दूर रखती हैं.

दुनिया की सबसे बड़ी आइस शेल्फ़ ‘रॉस आइस शेल्फ़’ कहलाती है. इसका सामने वाला हिस्सा जो समुद्र को छूता है वह 200 मीटर मोटा है जबकि पिछला हिस्सा जो अंटार्कटिका से जुड़ता है वो एक किलोमीटर गहरा है.

एक समय आएगा जब यह पतला होते होते आइस शेल्फ़ या बर्फ़ की चट्टान से टूट कर अलग हो जाएगा. और इस प्रकार आइसबर्ग का जन्म होगा. इसे ‘काविंग’ भी कहते हैं.

कुछ हिमखंड छोटे होते हैं लेकिन कुछ किसी बड़े शहर से भी बड़े होते हैं. कई छोटे हिमखंड जहाज़ों के लिए ख़तरा बन जाते हैं क्योंकि वो आसानी से दिखाई नहीं देते. इन हिमखंडों पर हवा और समंदर की धार या करंट का असर पड़ता है.

डॉक्टर कैथरिन वाकर कहती हैं कि, “आइस शीट से टूटने के बाद यह हिमखंड अस्थिर हो जाते हैं या समुद्र में पलट भी जाते हैं या डूब जाते हैं. इन हिमखंडों का ऊपरी हिस्सा सफ़ेद होता है जैसा कि हम तस्वीरों में देखते हैं. लेकिन इसके निचले हिस्से में हज़ारों सालों तक अंटार्कटिका की चट्टानों से घर्षण की वजह से कई तरह के खनिज तत्व होते हैं जिसकी वजह से उनका रंग नीला या हरा भी हो सकता है.”

लेकिन A23a हिमखंड फिर से गतिमान क्यों हो गया?

विघटन

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कैंब्रिज में ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वे के ग्लेसियोलॉजिस्ट डॉ. ओलिवर मार्श कहते हैं कि A23a हिमखंड का क्षेत्रफल लगभग 3800 वर्ग किलोमीटर है जो न्यूयॉर्क राज्य के लांग आयलैंड इलाके जितना बड़ा है.

उन्होंने बताया कि, “A23a हिमखंड का आकार कुछ अलग है. यह चौकोर है और दोनों दिशाओं में 60 किलोमीटर तक फैला है. यह लगभग 300 मीटर मोटा है जिसका 10 प्रतिशत हिस्सा पानी की सतह के ऊपर है. हिमखंडों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पानी की सतह के नीचे तैरता है. A23a उस हिमखंड से हज़ारों गुना बड़ा है जिससे टकरा कर टाइटैनिक जहाज़ डूब गया था.”

ओलिवर मार्श दक्षिणी समुद्र में वेडेल सागर की आइस शेल्फ़ पर स्थित रीसर्च स्टेशन से हिमखंड के विघटन या टूटने की प्रक्रिया का अध्ययन करते हैं.

सिर्फ़ बड़े हिमखंडों को ही आधिकारिक तौर पर अमेरिका के आइस सेंटर द्वारा नाम दिया जाता है. A23a के नाम का पहला अक्षर A23 दरअसल अंटार्कटिका के उस हिस्से को दर्शाता है जो अंटार्कटिका और वेडेल प्रायद्वीप क्षेत्र के बीच स्थित है.

छोटा a दर्शाता है कि आइस शेल्फ़ यानि बर्फ़ की चट्टान से टूटने के बाद इस हिमखंड का दोबारा विघटन हुआ है और इसके सबसे बड़े हिस्से को A23a के नाम से जाना जाता है.

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फ़िलहाल A23a दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड इसलिए है क्योंकि उसका आकार अभी तक बरकरार रहा है. लेकिन अब तक का सबसे बड़ा हिमखंड B15 था जिसकी जानकारी साल 2000 में सैटेलाइट के ज़रिए मिली थी.

वह रॉस आइस शेल्फ़ से टूट गया था और A23 से तीन गुना बड़ा था.

अनुमान है कि जुलाई 1986 में यह हिमखंड आइस शेल्फ़ से टूट कर अलग हुआ था और बहते हुए कुछ दूर तक चला गया था.

डॉक्टर ओलिवर मार्श ने कहा कि यह टूटने के बाद बहते हुए फ़िल्चनर आइस शेल्फ़ के उथले हिस्से में जाकर अटक गया था मगर वहां भी इस पर बर्फ़ गिरती रही. हालांकि वह इलाक़ा काफ़ी ठंडा है मगर बीतते समय के साथ उसके किनारे पिघल गए होंगे और यह दोबारा आगे बहने लगा.

A23a के आगे के सफ़र को हवा और दक्षिण समुद्री करंट या धारा दिशा दे रही है.

डॉक्टर ओलिवर मार्श कहते हैं, “अंटार्कटिका से हिमखंड समुद्री धाराओं के साथ बहते हुए वेडेल सागर तक पहुंच जाते हैं और वहां से अंटार्कटिका प्रायद्वीप के पूर्व में एक ऐसे क्षेत्र से गुज़रते हैं जिसे हम आइसबर्ग एली यानि हिमखंडों की पगडंडी कहते हैं. A23a फ़िलहाल एक से दो किलोमीटर प्रतिदिन की रफ़्तार से सफ़र कर रहा है. इसकी रफ़्तार हवा, समुद्री धारा और मौसम पर निर्भर है.”

लेकिन अपने इस सफ़र के दौरान A23a पारिस्थितिकी या इकोलॉजी में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहा है.

हिमखंडों की भूमिका

वीडियो कैप्शन, अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन की परत में मौजूद छेद अब ज़्यादा समय तक नज़र आने लगा है

नॉर्वे की यूआईटी या आर्कटिक यूनिवर्सिटी में ग्लेसियोलॉजी यानि हिमनद विज्ञान की प्रोफ़ेसर जेमा वेडहैम का कहना है कि हिमखंड समुद्री जीवन में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

“जैसे जैसे हिमखंड पिघलते हैं उनके भीतर से कई पोषक तत्व और खनिज समुद्र के पानी में घुलते हैं जो समुद्री पौधों के फलने फूलने में खाद का काम करते हैं. इन पौधों पर छोटी मछलियां पलती हैं जो बड़ी मछलियों का आहार बनती हैं. इसलिए हिमखंडों के इर्द-गिर्द पानी पर तैरने वाले कई पौधे और शैवाल पलते हैं और पक्षियों के लिए भी यह बेहद अनुकूल साबित होता है. यानि समुद्री जीवन के तेज़ी से फलने-फूलने में हिमखंड काफ़ी मददगार साबित होते हैं.”

जेमा वेडहैम कहती हैं कि दक्षिणी सागर में धूल से मिलने वाले आयरन की काफ़ी कमी होती है. हवाओं के ज़रिए धूल पूरे वायुमंडल में आयरन बिखेरती है. लेकिन दक्षिणी सागर आयरन के स्रोतों से बहुत दूर है.

फॉयटोप्लैंक्टन और कई समुद्री पौधों को पलने के लिए आयरन की ज़रूरत होती है जो उन्हें हिमखंडों से मिलता है. मगर हिमखंडों में यह आयरन कहां से आता है?

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जेमा वेडहैम ने कहा, “मूल रूप से आइस शीट यानि बर्फ़ की चादर में आयरन होता है क्योंकि सदियों से वायुमंडल से धूल आइस शीट की बर्फ़ पर बिखर कर जमा होती रही है और इस प्रकार वो हिमखंडों में भी जम जाती है.”

हिमखंडों से मिलने वाले आयरन से उसके इर्द गिर्द पलने वाले फॉयटोप्लैंक्टन वायुमंडल से कार्बन डाई ऑक्साइड को सोखते हैं. जब यह मर जाते हैं तो वो कार्बन समुद्रतल में जमा हो जाता है.

यानि पर्यावरण में कार्बन को कम करने में भी हिमखंडों की भूमिका है. वो कितना कार्बन सोखते हैं यह जानने के लिए वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं.

जेमा वेडहैम कहती हैं कि कुछ का अनुमान है कि दक्षिणी समुद्र में फॉयटोप्लैंक्टन चंद प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड सोखते हैं जबकि कुछ अनुमानों के अनुसार वो लगभग 30 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड सोखते हैं. लेकिन हिमखंडों से कुछ नुकसान भी होता है.

जेमा वेडहैम ने कहा, “हम यह भी सुनते हैं कि हिमखंडों के कारण व्हेल मारी जाती हैं. इसमें जमा कार्बन की वजह से दूसरे पौधों और जीवों को भी काफ़ी नुकसान पहुंचता है. लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि इससे कोई एक प्रजाति अत्याधिक प्रबल नहीं होती और जैव विविधता बरकरार रहती है.”

यानि प्रकृति एक हाथ से देती है और दूसरे हाथ से छीन लेती है. लेकिन हिमखंडों की यह भूमिका जारी रहे इसलिए आवश्यक है कि धरती पर आइस शीट यानि बर्फ़ की चादर भविष्य में भी बरकरार रहे.

आख़िरी सफ़र

वीडियो कैप्शन, जलवायु परिवर्तन से अंटार्कटिका पर हो रहे प्रभाव को समझने में ड्रोन करेगा मदद.

अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा से जुड़े वैज्ञानिक क्रिस्टोफ़र शूमैन का मानना है कि हिमखंड आइस शीट के जीवनचक्र का हिस्सा हैं. इसमें ग़ौरतलब बात तब होती है जब बड़े हिमखंड आइस शीट से टूट कर समुद्र में आ जाते हैं.

“छोटे और बड़े हिमखंडों का टूट कर अलग होना जलवायु परिवर्तन के संकेत देता है. मगर हिमखंडों के समुद्र के गर्म पानी में पहुंच कर पिघलने से विश्व में समुद्र का जलस्तर नहीं बढ़ता क्योंकि हिमखंड में उतना ही ताज़ा पानी जमा रहता है जितना उसके समुद्र में पहुंचने के सफ़र के दौरान समुद्र से खारा पानी विस्थापित होता है.”

पृथ्वी पर गर्मी बढ़ने से अलास्का, हिमालय और ऐंडीज़ के छोटे बड़े कई ग्लेशियर तेज़ी से पिघलने लगते हैं. और दोनों ध्रुवीय आइस शीट पर भी गर्मी का यही असर दिखाई देता है.

ग्रीनलैंड के इर्द गिर्द ग्लेशियर काफ़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं. आसपास की भूमि पर बढ़ती गर्मी के कारण बर्फ़ तेज़ी से पिघलने लग सकती हैं.

क्रिस्टोफ़र शूमैन ने कहा कि उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया में भी यह देखा गया है कि ग्लेशियर के नज़दीक भूमि पर गर्मी के मौसम में तापमान बहुत बढ़ जाता है. कई जगह जंगलों में आग लग जाती है जिसके धुएं के कण ग्लेशियर तक पहुंच जाते हैं जिसकी वजह से उनका रंग काला पड़ने लगता है और इन धुंए के कणों की वजह से गर्मी के दौरान बर्फ तेज़ी से पिघलने लगती है.

पिछले कुछ सालों से उत्तर पूर्वी ग्रीनलैंड में गर्मियों के दौरान काफ़ी मात्रा में पिघला हुआ पानी ग्लेशियर के नज़दीक की समुद्री बर्फ़ तक पहुंच गया.

समुद्र पर तैरती यह बर्फ़ एक तरह से ग्लेशियर को गर्म पानी से बचाने का काम करती है. जब समुद्री बर्फ़ पिघल जाती है तो आसपास के हिमखंड आइस शेल्फ़ से अलग होकर तैरने लगते हैं.

जब समुद्री गर्म पानी की धार समुद्री बर्फ़ को पिघला देती है तो वो पानी समुद्र में मिल जाता है.

तो हम कह सकते हैं कि समुद्री बर्फ़ के घटते स्तर से जलवायु परिवर्तन के स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. लेकिन समुद्री बर्फ़ पिघलने की यह प्रक्रिया ग्रीनलैंड के मुक़ाबले अंटार्कटिका में कम देखी जा रही है.

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क्रिस्टोफ़र शूमैन ने कहा, “आर्कटिक या उत्तरी ध्रुव के क्षेत्र की स्थिति कई दशकों से बिगड़ती जा रही है और सैटेलाइट डाटा के ज़रिए उसका अध्ययन भी किया गया है मगर अंटार्कटिका की स्थिति इतनी स्पष्ट नहीं है. हालांकि अब उस दिशा में शोधकार्य चल रहा है. लेकिन दोनों ध्रुवीय क्षेत्रों में समुद्री बर्फ़ का घटता स्तर बड़ी चिंता का विषय है.”

जब ऊपरी सतह पर बर्फ़ पिघलती है तो निचली पुरानी बर्फ़ सूर्य की रोशनी के संपर्क में आती है और पिघलने लगती है. इसलिए ग्लेशियरों और ध्रुवीय आइस शेल्फ़ को हिमवृष्टि के ज़रिए नयी बर्फ़ की चादर की ज़रूरत रहती है. तभी आइस शेल्फ़ का संतुलन बना रह पाएगा और वो बरकरार रहेंगे.

मगर क्रिस्टोफ़र शूमैन आगाह करते हैं कि पिछले कई सालों से हर जगह बर्फ़ कम होती जा रही है. इसका बहुत बुरा असर तटीय समुदायों पर पड़ रहा है. साथ ही बर्फ़ के घटते स्तर से ग्लेशियरों, आइस शेल्फ़ और हिमखंडों के अस्तित्व को ही ख़तरा पैदा हो गया है.

क्या हम ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां ग्लेशियर और हिमखंड नहीं होंगे?

क्रिस्टोफ़र शूमैन कहते हैं, “भविष्य में ऐसा हो सकता है. कई सालों बाद, हो सकता है कि ग्लेशियर पिघल कर पीछे हट जाएं और उनका पानी समुद्र में आना बंद हो जाए. यह भी हो सकता है कि कुछ सदियों बाद हिमखंड धरती की ख़ूबसूरती का हिस्सा ना रहें.”

तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- दुनिया के सबसे बड़े हिमखंड से हम क्या जान सकते हैं?

हिमखंड केवल समुद्री पौधों और जीवों के लिए तैरता हुआ एक ख़बसूरत खाने का डिब्बा नहीं है जिस पर वह फलफूल सकें बल्कि यह हिमखंड एक मोबाइल वॉर्निंग सिस्टम है जो हमें भविष्य के ख़तरों के बारे में चेतावनी दे रहा है.

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