आख़िर कैसे रोकी गई तेजाब की बारिश

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- Author, लीज़्ली इवांस ऑग्डेन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
इस समय पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन पर चिंता जताई जा रही है.
कहा जा रहा है कि जल्द ही इसे क़ाबू न किया गया, तो ये इंसान ही नहीं बहुत सी और प्रजातियों के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन जाएगा.
लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो जलवायु परिवर्तन को बस एक हौव्वा मानते हैं.
उनका तर्क है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है, जिससे धरती की आब-ओ-हवा पूरी तरह से बदल जाने वाली है. कुछ लोग बस यूं ही ये शोर मचा रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन को लेकर, इन विरोधाभासी बातों को कुछ वैज्ञानिक एसिड रेन के तजुर्बे से जोड़ कर देखते हैं.
उनका कहना है कि बरसों पहले जब एसिड रेन के नुक़सान को लेकर रिसर्च किए गए और कहा गया कि इसे रोकने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने हैं, तो भी बहुत से लोगों ने इन रिसर्च पर सवाल उठाए थे.
तब भी इसे बस हौव्वा कह कर ख़ारिज करने की कोशिश की गई. इनमें राजनेता भी थे और बड़े उद्योगपति भी, जिन्हें अपने उद्योग चलाने के लिए नई तकनीक इजाद करनी पड़ती.
इसलिए वो एसिड रेन के ख़तरों को ही कम करके बताने लगे. उस पर हुई रिसर्च को ख़ारिज करने लगे.
एसिड रेन पर रिसर्च
1970 के दशक में कनाडा और अमरीका की सीमा पर स्थित ग्रेट लेक्स में एसिड रेन पर रिसर्च की गई थी.
ओंटैरियो स्थित इन झीलों के आस-पास बहुत से कारख़ाने थे. जहां निकेल और तांबे जैसी धातुएं गलायी जाती थीं. सडबरी नाम के क़स्बे की एक झील का पानी एसिड रेन की वजह से बिल्कुल ही बदल गया था. उसमें काई तक नहीं उग रही थी. झील का पानी तो एकदम साफ़ होता था. लेकिन, उसमें जीवों का नाम-ओ-निशां मिट गया था.
उसके बाद से आज की बात करें, तो आज क़रीब चालीस साल बाद उस झील में धीरे-धीरे ज़िंदगी लौट रही है.
लेस्ली एवांस ओगडेन भी उन रिसर्चर में से एक हैं, जिन्होंने इन झीलों पर कारखानों से निकलने वाली प्रदूषित हवा के असर से होने वाली एसिड रेन का तजुर्बा किया है.

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वैज्ञानिकों की कोशिशों का नतीजा ये हुआ है कि केकड़े और झींगे जैसे जीव धीरे-धीरे, इन झीलों में लौट रहे हैं.
औद्योगीकरण की वजह से एक दौर ऐसा भी था, जब यूरोप में जंगल के जंगल वीरान हो गए थे. कनाडा और अमरीका की झीलें वीरान हो गई थीं.
अम्ल वर्षा की वजह से फ़सलें बर्बाद हो रही थीं और इंसानों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ रहा था. क्योंकि इन कारखानों से बड़ी तादाद में सल्फ़र डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे बहुत नुक़सानदेह केमिकल निकलते थे, जो वातावरण में मिलकर एसिड रेन के तौर पर धरती पर गिरते थे. पानी और ऑक्सीजन से मिलने के बाद ये सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड में तब्दील हो जाते थे, जो बेहद ख़तरनाक होते हैं.
उम्मीद की किरण
आज हमें ये सब बातें पता हैं. लेकिन, 1960 के दशक में लोग इन बातों से अनजान थे. 1963 में जीनी लाइकेंस ने अमरीका के न्यू हैम्पशायर सूबे में स्थित व्हाइट माउंटेंस से बारिश के पानी को जमा किया.
उन्होंने देखा कि ये बारिश के पानी से औसतन सौ गुना ज़्यादा अम्लीय था. यानी इस में एसिड की मात्रा बहुत ज़्यादा थी.
उनकी इस खोज के बाद से ही एसिड रेन को लेकर अमरीका और दूसरे औद्योगिक देशों में नए प्रयोग शुरू हुए.
इसका एक बड़ा सबूत मिला था, कनाडा और अमरीका की सीमा पर स्थित ओंटैरियो के एक्सपेरिमेंटल लेक एरिया से. यहां मीठे पानी की छोटी-छोटी कई झीलें हैं. दूसरी झीलों के मुक़ाबले, इन के पानी के बारे में काफ़ी दस्तावेज़ पहले से मौजूद थे.
लिहाज़ा यहां डेविड शिंडलर जैसे वैज्ञानिकों को एसिड रेन के असर का प्रयोग करने की सहूलत ज़्यादा दिखी. डेविड शिंडलर, कनाडा के अल्बर्टा विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं. उनकी टीम के लोग गोताख़ोरी कर के झीलों में उतरते थे और एसिड रेन जैसे केमिकल को झील के पानी में मिलाया करते थे.

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1976 से शुरू हुए इस प्रयोग के तहत झील में अम्ल की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई गई.
इस झील का नाम था लेक 223. जल्द ही इस झील से जीव ग़ायब होने लगे.
इस प्रयोग के दौरान ही एक और वैज्ञानिक कैरोल केली भी इस में शामिल होने 1978 में पहुंचीं.
डेविड शिंडलर कहते हैं कि उनके पास मौजूद एसिड कमोबेश ख़त्म हो गया था. लेकिन, अब झील के पानी पर इसका असर नहीं हो रहा था.

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इसके बाद कैरोल केली ने अपना प्रयोग शुरू किया. केली ने पाया कि क्षार पैदा करने वाले छोटे जीव कुछ एसिड सोख रहे हैं.
इससे झील के पानी में अम्लीय स्तर धीरे-धीरे कम होने लगा था.
यानी इन बैक्टीरिया की मदद से झील के पानी पर एसिड रेन के असर को कम किया जा सकता था.
कैरोल केली उस दौर को याद कर के कहती हैं कि 'तब लोग हमारे तजुर्बे पर यक़ीन करने को ही नहीं तैयार थे.' लेकिन, केली और शिंडलर ने अपना प्रयोग जारी रखा. वो ये पता लगाते रहे कि इन बैक्टीरिया की मदद से एसिड रेन के असर को कितना कम किया जा सकता है. उन्होंने इसके लिए कनाडा और नॉर्वे की दूसरी झीलों का भी रुख़ किया. उन्होंने पाया कि एसिड के असर को कम करने वाले बैक्टीरिया उन झीलों में भी पाये जाते हैं. तो केली और उनकी टीम ने सुझाव दिया कि अगर एसिड रेन यानी अम्लीय वर्षा पर क़ाबू पा लिया जाए, तो झीलों में ज़िंदगी की बहार फिर लौटाई जा सकती है.

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शंका और इनकार
आख़िरकार लेक 223 में भूखी मछलियों के मरने की तस्वीरें और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों की कोशिशों से कनाडा की सरकार पर दबाव पड़ा और उसने अम्ल वर्षा यानी कारखानों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े क़ानून बनाए.
लेकिन, ये सब अचानक नहीं हुआ था. इससे पहले कनाडा की सरकार तो एक्सपेरिमेंटल लेक एरिया के रिसर्च स्टेशन को ही बंद करने वाली थी.
शिंडलर कहते हैं कि एक बार जब वो अमरीका और कनाडा के अधिकारियों के सामने अपने रिसर्च का प्रेज़ेंटेशन दे रहे थे, तो एक अधिकारी ने उन पर आरोप लगाया कि वो तो ईएलए रिसर्च स्टेशन को बचाने के लिए एसिड रेन की कहानी गढ़ रहे हैं.

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लेकिन, वैज्ञानिक तमाम विरोधों के बावजूद अपना काम करते रहे. मीडिया उनके काम को सुर्ख़ियां बनाता रहा. हालांकि कुछ लोग लगातार बाधा डालते रहे. इससे एसिड रेन के ख़िलाफ़ मुहिम में देर लगी.
जीनी लाइकेंस कहते हैं कि 1970-80 के दशक में कई बार ऐसा हुआ कि वो एसिड रेन पर लेक्चर दे रहे थे और किसी ने बीच में टोक कर के बदतमीज़ी से कहा कि उसे एसिड रेन की हक़ीक़त पर भरोसा नहीं है. तो, लाइकेंस उसे सलाह देते कि कभी बारिश के पानी को जमा कर के उसका केमिकल परीक्षण करे, तब हक़ीक़त पता चलेगी.
जीनी लाइकेंस कहते हैं कि आज जिस तरह बहुत बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जलवायु परिवर्तन की चुनौती को महज़ छलावा कह कर टालती हैं. उसी तरह 1970-80 के दौर में एसिड रेन के रिसर्च को बार-बार ग़लत बताया गया. ख़ारिज किया गया. पहले पहल एसिड रेन की खोज 1963 में हुई थी. लेकिन, इसे लेकर अमरीका में क्लीन एयर एक्ट 1990 जाकर बना था. यानी पहले रिसर्च के 27 साल बाद.
डेविड शिंडलर उन दिनों को याद कर के कहते हैं कि, 'तब एसिड रेन पर होने वाली बैठकों में अक्सर अमरीका और कनाडा के अधिकारी इसके लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराते हुए लड़ने लगते थे. कोई कहता कि तुम्हारे हिस्से में जो कोयले की भट्ठी है उससे परेशानी हो रही है, तो कोई धातु गलाने वाले कारखानों को ज़िम्मेदार बताता.'
लेकिन, बाद में जमा आंकड़ों से साफ़ हुआ कि अमरीका के न्यू इंग्लैंड, पेन्सिल्वेनिया, ओहायो घाटी के कारखानों की वजह से ही अमरीका और कनाडा के बीच में स्थित झीलों की हालत बिगड़ी है.
कनाडा के ग़ैर सरकाीर संगठन कनाडियन कोएलिशन ऑन एसिड रेन की एडली हर्ले कहती हैं कि एक वक़्त में कनाडा और अमरीका के बीच विवाद का सबसे बड़ा मसला एसिड रेन ही था.
आज उन प्रयोगों को आधी सदी से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है. लेक 223 अब ज़रा भी अम्लीय नहीं है. एसिड निगलने वाले बैक्टीरिया अपना काम बख़ूबी कर रहे हैं. हालांकि अभी झील में पहले पाये जाने वाले सभी जीव वापस नहीं आए हैं. धीरे-धीरे झींगों और मछलियों को दूसरी झीलों से लाकर यहां बसाया जा रहा है. फिर भी, झीलों का भविष्य पहले के मुक़ाबले बेहतर है.

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आज इस इलाक़े में सल्फ़र वायुमंडल में बहुत कम मिलता है. हालांकि अब ये समस्या एशियाई देशों में ज़्यादा हो रही है. क्योंकि खाद के इस्तेमाल से अमोनिया और नाइट्रोजन वातावरण में मिल रहे हैं.
पर्यावरण की ऐसी पेचीदा चुनौतियों का कोई साधारण समाधान नहीं है. लेकिन, जिस तरह एसिड रेन को रोका गया, उससे हम सबक़ ज़रूर ले सकते हैं. शिंडलर कहते हैं कि, 'जलवायु परिवर्तन को लेकर वही रणनीति अपनायी जा रही है, जो कभी एसिड रेन के ख़िलाफ़ एक्शन रोकने के लिए आज़माई गई थी. रिसर्च पर सवाल उठाओ. सियासी जमात को पैसे देकर अपने हक़ में करो और कार्रवाई में अड़ंगे डालो. पर्यावरण को बचाने की हर मुहिम के ख़िलाफ़ यही फॉर्मूला अपनाया जाता है.'
हालांकि मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अक्सर पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जा रहे क़दमों को पीछे खींचने की बात करते हैं. इससे पर्यावरण बचाने की कोशिशों को झटका लग सकता है.
लेकिन, अगर वैज्ञानिक अपनी मुहिम में जुटे रहे और उन्हें मीडिया का समर्थन मिलता रहा, तो राजनीतिक चालबाज़ी की राह मुश्किल होती जाएगी. हां, इस में आम लोगों की भागीदारी होने से जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करना थोड़ा आसान होगा. तभी हम अपनी धरती को बदरंग होने से बचा सकेंगे.
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