रेगिस्तान को बढ़ने से रोकने के लिए बन रही दीवार

पगा में रेगिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, रिचर्ड ग्रे
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

अगर आप अफ्ऱीकी देश घाना जाएं, तो वहां के उत्तरी इलाक़े में स्थित पगा के सफ़र पर निकलने पर आप को बहुत सावधानी से क़दम उठाना पड़ेगा. एक भी ग़लत क़दम आप का सामना धारदार दांतों वाले घड़ियालों से करा सकता है.

बरसों से स्थानीय लोगों का इन घड़ियालों से क़रीबी ताल्लुक़ रहा है. वो घाना के लोगों के हिसाब से पगा के पवित्र तालाबों में रहते हैं.

एक लोककथा के मुताबिक़, पगा के एक क़बीले के सरदार की जान एक घड़ियाल ने बचाई थी. तब उस सरदार ने अपने लोगों को हुक्म दिया था कि घड़ियालों को मारें नहीं, बल्कि उनकी पूजा करें. क्योंकि घड़ियाल किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे. आज भी स्थानीय लोग इन घड़ियालों का ख़याल रखते हैं.

आज भी पगा के लोग घड़ियालों से नज़दीकी ताल्लुक़ रखते हैं. उन्हें खिलाते-पिलाते हैं और उनकी सुरक्षा करते हैं. यहां आने वाले सैलानी भी अक्सर घड़ियालों के साथ अजीब-ओ-ग़रीब शक्लें बनाकर तस्वीरें खिंचवाते हैं. ये घड़ियाल आप का नुक़सान नहीं करेंगे, बशर्ते आप उन्हें पीछे की तरफ़ से छुएं.

लेकिन, पगा और यहां के घड़ियालों को एक तेज़ी से बढ़ती आ रही चुनौती से ख़तरा है. पगा, उत्तरी अफ्रीका में स्थित दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तान, सहारा से लगे साहेल इलाक़े का हिस्सा है.

इसका एक बड़ा हिस्सा अब रेगिस्तान की गिरफ़्त में आता जा रहा है क्योंकि इसकी मिट्टी बहुत मुलायम और बलुई है. कभी हरे-भरे रहे इस इलाक़े में अब छोटी-छोटी घास और तुड़े-मुड़े पेड़ ही नज़र आते हैं. जो, मिट्टी को बमुश्किल उड़ने से रोक पा रहे हैं.

अब बढ़ती आबादी के दबाव की वजह से पगा के आस-पास के थोड़े-बहुत पेड़ भी काटे जा रहे हैं. ताकि इनका ईंधन और मकान बनाने के सामान के तौर पर इस्तेमाल हो सके. इन पेड़ों के कट जाने से इलाक़े की बलुई मिट्टी के लिए रेतीले तूफ़ानों का सामना करना मुश्किल हो रहा है. आज मिट्टी पर रेत हावी हो रही है. बचे-ख़ुचे घास और पेड़ रेतीली आंधी के आगे टिक नहीं पा रहे हैं. नतीजा ये कि यहां की उपजाऊ ज़मीन, रेगिस्तान में तब्दील हो रही है.

पगा में रेगिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

एक नई शुरुआत

एक स्थानीय पर्यावरण संगठन के संस्थापक जूलियस अवारेग्या कहते हैं, ''इस इलाक़े में भूमि का बहुत क्षरण हो रहा है. क्योंकि बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं. हमारी आने वाली नस्लों पर इसका गहरा असर होगा. जो बचा है, उसे सहेजने के लिए हमें अभी से संरक्षण शुरू करने की ज़रूरत है.''

अवारेग्या अब रेगिस्तान का दायरा बढ़ने से रोकने के लिए काम कर रहे हैं. वो पेड़ों की एक दीवार का निर्माण करने में जुटे हैं, जिनके तने और पत्तियां, रेगिस्तान के हमले को रोकेंगी. अवारेग्या और उनका संगठन पगा में बबूल , कीकर, महोगनी, नीम और बाओबाब के पेड़ लगा रहे हैं.

इनमें से बाओबाब का स्थानीय समाज से गहरा नाता रहा है. पूरी तरह से विकसित ये पेड़ बड़े दिलकश लगते हैं. इनके मोटे तने किसी और ही दुनिया का एहसास कराते हैं. बाओबाब का पेड़ रूख़े इलाक़ों में रहने के हिसाब से ढला हुआ है. वो अफ्ऱीका के सवाना घास के मैदानों में 2000 साल तक ज़िंदा रहते हैं.

क़रीब 200 साल का होने के बाद बाओबाब का पौधा जवां होता है, जब इसमें फल आते हैं. इनका स्वाद खट्टा होता है यानि अवारेग्या आज जो पेड़ लगा रहे हैं, वो असल में भविष्य का निवेश हैं. यूं तो स्थानीय लोग बाओबाब के फल नहीं खाते हैं. लेकिन, इनसे उनकी काफ़ी कमाई होती है. इनके तैयार फल तोड़ कर पीसा जाता है. इसकी यूरोप और अफ्ऱीका में भारी मांग है.

इसलिए अब पगा ही नहीं, पूरे घाना में बाओबाब के फलों की मांग बढ़ गई है. स्थानीय लोग इन्हें खाते नहीं हैं बल्कि महिलाएं इन फलों को तोड़ कर घर लाती हैं और इन्हें पीस कर पाउडर तैयार करती हैं. जिसे यूरोपीय देशों और अमरीका को बेचा जाता है. इससे पगा की महिलाओं की आमदनी बढ़ी है. आर्थिक रूप से सक्षम होने की वजह से महिलाओं का घर के फ़ैसलों में योगदान और हक़ भी बढ़ा है.

बाओबाब के पाउडर का कारोबार अगले पांच साल में बढ़कर 5 अरब डॉलर पहुंचने की संभावना है. इसमें विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम और आयरन की मात्रा काफ़ी ज़्यादा पायी जाती है. इसीलिए, कोका-कोला, कोस्टको, इनोसेंट स्मूदीज़, सुजा जूस और येओ वैली जैसी बड़ी कंपनियां इसकी बड़ी तादाद में ख़रीद करती हैं.

बाओबाब का फल

इमेज स्रोत, Aduna

इमेज कैप्शन, बाओबाब का फल फसल कटने से महीनों पहले धूप में सूखकर हरे से भूरा हो जाता है.

बाओबाब के फ़ायदे

हेल्थ फूड बनाने वाली कंपनी एडुना के संस्थापक एंड्रयू हंट कहते हैं कि बाओबाब में काफ़ी संभावनाएं हैं. घाना और बर्किना फ़ासो को इससे काफ़ी विदेशी मुद्रा मिल रही है. हंट के मुताबिक़ ये ख़ास दरख़्त होता है और इसका ताल्लुक़ पश्चिमी अफ्ऱीका की संस्कृति से भी है. बाओबाब के पाउडर की मांग बढ़ने से पहले इसकी कोई ख़ास अहमियत नहीं थी. पहले खेती-बाड़ी के लिए इसे काटा जा रहा था लेकिन अब बाओबाब के नए पेड़ लगाए जा रहे हैं.

हंट की कंपनी एडुना घाना के लोगों को बाओबाब के पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करती है. इससे साहेल रेगिस्तान इलाक़े में ग्रेट ग्रीन वॉल बनाने में काफ़ी मदद मिल रही है. इसे पूरे सहारा रेगिस्तान में तैयार किया जाना है, ताकि रेगिस्तान के फैलाव को रोका जा सके.

पिछले एक दशक में सहारा मरुस्थल ने 7600 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा इलाक़े को अपने आगोश में समेट लिया है. ख़ास तौर से दक्षिणी यानी साहेल इलाक़े में. 1920 के मुक़ाबले आज की तारीख़ में सहारा रेगिस्तान का क्षेत्रफल 94 करोड़ वर्ग किलोमीटर हो गया.

वैसे, ये मंज़र पूरी दुनिया में आम हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ दुनिया में हर साल एक लाख 20 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन रेगिस्तान में समा जाती है.

रेगिस्तान का फैलाव रोकने के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेज़र्टिफ़िकेशन के इब्राहिम थियाव कहते हैं कि रेगिस्तान का विस्तार कैंसर की तरह होता है. इससे दुनिया को हर रोज़ क़रीब 1.3 अरब डॉलर का नुक़सान हो रहा है. क्योंकि रेगिस्तान की चपेट में खेती योग्य ज़मीन और चरागाह ही नहीं आ रहे हैं बल्कि जो ज़मीन हम रेगिस्तान के हाथों गंवा रहे हैं, उसका इस्तेमाल इंसानों के लिए कई तरह से हो सकता है. मसलन रिहाइश या टूरिज़्म के लिए.

बाओबाब को घर ले जाकर महिलाएं इससे पाउडर बनाती हैं.

इमेज स्रोत, Aduna

रेगिस्तान को रोकने की कोशिश

ग्रेट ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की शुरुआत अफ्ऱीकी यूनियन ने 2007 में की थी. इसका मक़सद, दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान के विस्तार को रोकना है. इस काम में संयुक्त राष्ट्र भी अफ्ऱीकी यूनियन की मदद कर रहा है. साहेल में पेड़ लगाए जा रहे हैं ताकि रेत के दानव को दूर रखा जा सके.

प्रोजेक्ट के तहत अफ्ऱीकी देशों में खेती के नए तरीक़ों के विकास और ज़मीन का क्षरण रोकने के तरीक़े सिखाने के लिए अब तक 8 अरब डॉलर का निवेश किया गया है. इसमें अफ्ऱीका के लोगों के सदियों पुराने तजुर्बे की भी मदद ली जा रही है.

बर्किना फ़ासो, माली और सेनेगल में किसान, पत्थरों की लाइन और क़तारें बनाकर ज़मीन को बचाने का काम कर रहे हैं. इससे पानी जमा होता है और ज़मीन सोख लेती है जो बाद में काम आता है.

लेकिन, इस प्रोजेक्ट में सबसे ज़्यादा ज़ोर पेड़ लगाने पर ही है. अकेले सेनेगल ने ही अपने यहां एक करोड़ बीस लाख से ज़्यादा पेड़ लगाए हैं, ताकि सूखे को रोका जा सके.

इब्राहिम थियाव बताते हैं, ''20 देशों में 3 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन में पेड़ लगाकर हरियाली लौटाई गई है. हालांकि, ये प्रोजेक्ट मेरी ज़िंदगी में तो नहीं बल्कि मेरे बाद आने वाली पीढ़ी के ही काम आएगा. तो ये निवेश भविष्य के लिए है.''

यूएनडीसीसी ने अफ्ऱीका में 2030 तक 10 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन को दोबारा हरा-भरा बनाने का लक्ष्य रखा है. जिससे अफ्ऱीकी देशों को खाद्य सुरक्षा मिल सकेगी और उपज भी बढ़ सकेगी.

हालांकि, अब तक इस प्रोजेक्ट में क़ामयाबी सीमित तौर पर ही मिली है. प्रोजेक्ट की धीमी रफ़्तार की वजह से इसकी आलोचना भी की जा रही है.

बाओबाब का फल

इमेज स्रोत, Aduna

निजी क्षेत्र से मदद

अफ्ऱीका से बाहर ऐसे प्रोजेक्ट नाकाम भी रहे हैं. चीन ने गोबी के मरुस्थल में पेड़ लगाकर रेगिस्तान को बढ़ने से रोकने की कोशिश की थी लेकिन इसके नतीजे उल्टे ही रहे. रेगिस्तान का दायरा सिमटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है.

लेकिन, यूएनडीसीसी को इसी में उम्मीद दिखती है. वो स्थानीय लोगों को पेड़ लगाने को प्रोत्साहित कर रहे हैं. जब बाओबाब जैसे पेड़ आमदनी का ज़रिया बनेंगे, तो किसान उन्हें काटने के बजाय उनका संरक्षण करेंगे. बाओबाब की वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भी यहां निवेश करने की उम्मीद है.

इब्राहिम थियाव कहते हैं, ''ये ऐसा काम है, जो केवल सरकारें नहीं कर सकतीं. इस में निजी क्षेत्र को जोड़ना ज़रूरी है.''

इसलिए कई बड़ी खाद्य कंपनियों को लुभाने की कोशिश की जा रही है और इसका ज़रिया केवल बाओबाब ही नहीं है. भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्ता में पाया जाने वाला मोरिंगा भी साहेल में लगाया जा रहा है. इसके अलावा शिया बटर के पौधे को भी लगाया जा रहा है क्योंकि इसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक और मॉइश्चराइजर बनाने में होता है. ये भी भारतीय उप महाद्वीप में पाया जाने वाला पौधा है.

एंड्रयू हंट का मानना है कि कौस कौस जैसे अनाज भी अफ्ऱीका के इस प्रोजेक्ट में मददगार हो सकते हैं. ये भी सुपरफूड कहे जाने वाले क्विनोआ जैसा ही होता है यानि इस प्रोजेक्ट में बाओबाब एक कड़ी भर है.

घाना में रेतीली मिट्ठी

इमेज स्रोत, Alamy

कुछ ख़तरे भी

हालांकि, कुछ लोगों को आशंका है कि बड़े पैमाने पर एक ही पेड़ की नस्ल लगाने के नुक़सान भी हो सकते हैं. जैसे कि एक ज़माने में एशिया, मध्य अमरीका और दक्षिणी अमरीका में हुआ था, जब पाम ऑयल के लिए ढेर सारे ताड़ के पेड़ लगाए गए थे.

ब्रिटेन की जानकार लिंडसे स्ट्रिंगर कहती हैं कि इससे रेगिस्तान के विस्तार की समस्या घटने के बजाय बढ़ सकती है. क्योंकि आर्थिक नज़रिए से अगर कोई काम किया जाता है, तो उसके बुरे ही नतीजे होते हैं. स्थानीय लोगों की आमदनी रुकती है, तो ऐसे प्रोजेक्ट में उनकी दिलचस्पी ख़त्म होने लगती है.

लिंडसे का मानना है कि प्रोजेक्ट के तहत अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे लगाने पर ज़ोर होना चाहिए. जिसमें खजूर जैसे पेड़ भी हों और ऐसे दरख़्त भी हों जो साया दे सकें और स्थानीय लोगों को खाना भी मुहैया करा सकें. लिंडसे कहती हैं कि, 'केवल पेड़ लगाने से नहीं होगा. हमें उन वजहों को भी दूर करना होगा, जिससे ये हालात पैदा हुए हैं. ताकि रेगिस्तान का विस्तार रोका जा सके.'

जैसे कि सोलर एनर्जी का प्रचार करके ईंधन के तौर पर लकड़ी की ज़रूरत कम की जा सकती है. बर्किना फासो में राजमा और बबूल के पेड़ों पर बैक्टीरिया और फफूंद उगाए जा रहे हैं, ताकि ये देखा जा सके कि वो सूखे माहौल में ख़ुद को विकसित कर सकते हैं या नहीं.

पगा में ज़मीन का उपजाऊपन बढ़ाने के लिए बायोचार नाम के तारकोल का इस्तेमाल हो रहा है. इसे सूखी घास और फ़सल के दूसरे कचरों से तैयार किया जाता है.

बाओबाब से कमाई कर रहीं महिलाओं के लिए ग्रेट ग्रीन वॉल का प्रोजेक्ट वरदान बन गया है. अरागेव्या कहते हैं कि स्थानीय समुदाय भी बदल रहे हैं. वो अब पेड़ जलाते नहीं बल्कि उनकी हिफ़ाज़त करते हैं.

ज़्यादा पेड़ और ज़मीन बेहतर होने से पगा और उसके घड़ियालों का भविष्य सुरक्षित बनेगा. वो स्थानीय लोगों के साथ पहले की तरह हंसी-ख़ुशी से रह सकेंगे.

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)