हमास के कब्ज़े में वो इसराइली बंधक, जिनका बरसों से अता-पता नहीं, क्या कभी छूटेंगे?

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- Author, लॉरेंस पीटर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
हमास ने 7 अक्टूबर के हमले के दौरान इसराइल के जिन 200 लोगों को बंधक बनाया, उनको लेकर उभरा ग़ुस्सा तो सुर्ख़ियों में है लेकिन उन दो लोगों का क्या, जो बरसों से हमास के कब्ज़े में हैं?
इन बंधकों में से एक हैं इथियोपिया-इसराइली मूल के अवेरा मेन्गिस्तो जिन्हें हमास ने 2014 में अगवा किया था. दूसरे शख्स हैं अरब-इसराइली मूल के हिशाम-अल-सईद, जिन्हें हमास ने 2015 में बंधक बनाया था.
इसी तरह, उन दो इसराइली सैनिकों के परिजन भी परेशान हैं जिनके शव हमास ने आज भी ग़ज़ा में अपने कब्ज़े में रखे हैं.
ये दो सैनिक हैं- हदार गोल्डिन और ओरोन शॉल जो 2014 में हमास के साथ हुए संघर्ष में मारे गए थे.
ईरान का समर्थन रखने वाले हमास को कई पश्चिमी देश 'आतंकी संगठन' मानते हैं. हमास अपने बंधकों का इस्तेमाल फ़िरौती की बेहद ऊंची क़ीमत वसूलने के लिए करता है.
ओरोन शॉल के भाई अविराम शॉल कहते हैं कि उन्हें और उनके परिवार को पिछले 10 साल से न तो ये पता है कि हमास ने उनके भाई के शव को कहां छिपा रखा है और न ही अब शव की वापसी की उम्मीद नज़र आ रही है.
ओरोन शॉल का हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट साल 2014 में इसराइली सेना को ग़ज़ा में हमास की एक सुरंग में मिले थे. इसके बाद से उनके बारे में कोई ख़बर नहीं.

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कैसे होगी बंधकों की वापसी?
बीबीसी से बातचीत में अविराम शॉल कहते हैं, "मुझे लगता है कि इसराइली सेना अपने उन दो सैनिकों को भूल चुकी है."
लेकिन अपने भाई को लेकर अविराम को फिर से उम्मीद जगी है.
वो कहते हैं, "अभी अच्छा मौक़ा है क्योंकि 200 से ज़्यादा परिवार और उनके रिश्तेदार ग़ज़ा में बंधक बनाए गए लोगों के बारे में बात कर रहे हैं. सरकार ने मेरे भाई को वापस लाने के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अब इन्हें बड़ी पहल करनी पड़ेगी.’’
अविराम शॉल ये भी कहते हैं कि बंधकों को वापस लाने के लिए इसराइल को मानवीय पहल करने की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "अगर हमास को बिजली-पानी चाहिए तो उन्हें बंधक बनाए गए हमारे लोगों और सैनिकों के शव वापस करने चाहिए.’’
2011 में एक गुप्त समझौते के बाद इसराइल ने एक बंधक बनाए गए सैनिक को छुड़ाया था. लेकिन इसके बदले उसने अपनी जेलों में बंद 1027 फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ा.
लेकिन इसराइल ने अब तय कर लिया है कि वो हमास को उखाड़ फेंकेगा.
इसके लिए जिस तरह वो ग़ज़ा पर हवाई हमले कर रहा है, उसमें बड़ी तादाद में जान-माल का नुक़सान हो रहा है. ऐसे में बंधकों के बदले नए क़ैदियों की रिहाई मुश्किल और विवादास्पद होगी.
जैसे-जैसे ग़ज़ा में मरने वालों की तादाद बढ़ रही है, इसराइल पर फ़लीस्तीनियों का ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है.

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बंधकों की रिहाई का रास्ता क्या?
इसराइल के पूर्व मिलिट्री कमांडर और खुफ़िया एजेंसी मोसाद के पूर्व अधिकारी हैगाई हदास ने गिलाड शालित की रिहाई में अहम भूमिका निभाई थी.
बीबीसी से बातचीत में हैगाई हदास बताते हैं कि फ़लस्तीनियों से इस तरह के क़ैदियों का सौदा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा था. लेकिन मौजूदा हालात में जिस तरह हमास पर इसराइल का गुस्सा फूटा है, उन हालात में 'पहले की तरह कोई समझौता नहीं हो सकता. ये नामुमकिन है.’
हैगाई ये भी कहते हैं कि शालित की रिहाई इसलिए मुमकिन हुई थी क्योंकि एक तो प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू तब ख़ुद को राजनीतिक रुप से स्थिर मान रहे थे और दूसरा, वो समझौता शालित की रिहाई से दो साल पहले हो चुका था.
हैगाई इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि अभी इसराइल के पास और भी कई विकल्प हैं. जैसे बंधकों की रिहाई के लिए सीधी सैनिक कार्रवाई, अगर उनकी लोकेशन के बारे में सटीक खुफ़िया जानकारी मिलती है.
इसके अलावा रिहाई के लिए पैसे का इस्तेमाल भी एक विकल्प है. एक और विकल्प है ‘रिहाई के बदले हमास के नेताओं को ग़ज़ा से बाहर, जैसे कि क़तर जाने देना.’
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि ज़्यादातर बंधक हमास के कब्ज़े में हैं लेकिन कई ऐसे भी है जो उनके हाथ में नहीं. मुझे पक्का यकीन है कि इसराइल इन सबका पता-ठिकाना ढूंढने की कोशिश कर रहा है और सैन्य ऑपरेशन के जरिए इन्हें वापस लाने की तैयारी में है.’’
हैगाई ये भी कहते हैं कि ग़ज़ा में गंभीर युद्ध के हालात में भी इसराइल बंधकों को रिहा कराने के लिए समझौते का दबाव बनाएगा.

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रिहाई की राह में असल चुनौतियां
हैगाई हदास कहते हैं, "इसराइल इसका समाधान ढूंढने के लिए आख़िरी मौक़े तक प्रयास करेगा. क्योंकि हम ज़िंदगी की क़द्र करते हैं और हम लोग इसके लिए हर क़ीमत चुकाने को तैयार हैं."
हैगाई ये भी मानते हैं कि 2014 से जिन दो इसराइली नागरिकों को हमास ने बंधक बना रखा है, उन्हें किडनैप नहीं किया गया था, बल्कि वो मानसिक रूप से संतिलुत नहीं थे और खुद ग़ज़ा गए थे.
दूसरी तरफ हमास का दावा है कि 2014 में अगवा किए गए अवेरा मेन्गिस्तो और हिशाम-अल-सईद, दोनों इसराइली सैनिक हैं.
हालांकि, इनके बारे में इसराइल ने मानवाधिकार संगठनों के सामने जो दस्तावेज़ पेश किए उनके मुताबिक़ ये दोनों आम नागरिक हैं, जिन्हें ‘सैन्य सेवाओं’ से छूट दी गई थी.
अवेरा की रिहाई के लिए अभियान चलाने वाली टिला फेन्टा को भी अब नई उम्मीद बंधी है. वह इसराइली सरकार के रवैये से निराश थीं लेकिन उन्हें लगता है कि नए बंधकों का मामला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उभरने के बाद अवेरा जैसे पुराने बंधकों की रिहाई में मदद मिलेगी.

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क्यों नहीं हो पा रही है रिहाई?
बीबीसी से बातचीत में टिला फेन्टा ने ज़ोर देते हुए कहा, ‘हमास के हमले के बाद बाक़ी इसराइलियों की तरह हम भी सदमे में हैं.’
उन्होंने ये भी कहा कि रिहाई अभियान से जुड़े तमाम लोग अवेरा और हिशाम की सुरक्षित रिहाई में इसराइल सरकार की नाकामी से निराश थे.
टिला फेन्टा कहती हैं, "वो दोनों सैनिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से बीमार हैं. हमास ने इन्हें तमाम मानवीय मूल्यों की अनदेखी करते हुए बंधक बनाया.’’
टिला फेन्टा इन दोनों की रिहाई में नाकामी के पीछे उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि की तरफ़ भी इशारा करती हैं. इसराइली समाज में इथोपियाई यहूदी और बद्दू अरब के प्रति भेदभाव आम है.
वो कहती हैं, "मेरे ख़्याल से अवेरा वो शख्स हैं, जिन्हें इसराइली समाज उसके रंग और मानसिक स्थिति की वजह से पसंद नहीं करता. इसके अलावा वो अश्केलोन के पिछड़े इलाक़े में पैदा हुए और पले बढ़े.’’
टिला फेन्टा साफतौर पर कहती हैं, "इन्हीं सब बातों ने अवेरा को इसराइली समाज के लिए ग़ैर-ज़रूरी बना दिया. अगर उसका रंग गोरा होता या फिर अच्छे खासे समृद्ध इलाके से उनका संबंध होता तो समाज का रवैया भी कुछ अलग होता. मुझे पता है ये सही समय नहीं है अपने देश के बारे में ऐसी ग़लत बातें कहने का, लेकिन सच को सामने लाना भी ज़रूरी होता है.’’

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'अवेरा अब भी हैं ज़िंदा'
वो ये भी कहती हैं कि बड़े मानवाधिकार संगठनों को भी उनकी रिहाई की दिशा में बेहतर प्रयास करने चाहिए थे. यही बात अवेरा की तरह हिशाम पर लागू होती हैं. दोनों ही पिछड़े तबके से हैं.
इन दोनों के अलावा एक तीसरे इसराइली नागरिग जुमा अबु ग़नीमा भी हैं, जो 2016 में सीमा पार कर ग़ज़ा चले गए थे. तब से ये भी गुमशुदा हैं.
हिशाम की तरह ज़ुमा भी बद्दू अरब समुदाय से हैं. इनके बारे में ठीक-ठीक पता तो नहीं, लेकिन ये भी हमास के कब्ज़े में हो सकते हैं.
इसी जनवरी में हमास ने एक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो के रिकार्ड करने की तारीख़ नहीं थी मगर इस में एक शख़्स को हिब्रू में बुदबुदाते हुए ये कहते सुना जा रहा था, ‘मैं अवेरा मेन्गिस्तु एक बंधक हूं. मैं कब तक यहां अपने दोस्तों के साथ रहूंगा?’
बंधकों के लिए अभियान चलाने वाले संगठन के मुताबिक़, अवेरा के परिवार ने वीडियो देखकर उनकी पहचान की पुष्टि की.
तब प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अवेरा की मां एगुर्नेश से कहा था कि 'उन्हें मिली पक्की सूचना के मुताबिक अवेरा अब भी ज़िंदा हैं.'
नेतन्याहू ने ये भी कहा था, ‘इसराइल अवेरा और दूसरे बंधकों को वापस लाने की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.’

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रिहाई के लिए एक और जंग या समझौता?
साल 2022 में में हमास ने एक और वीडियो जारी किया था जिसमें हिशाम उनके कब्ज़े में दिख रहे थे. उस वीडियो के जरिए उनकी पहचान की पुष्टि उनके पिता ने की थी.
हिशाम के बारे में हमास ने बस इतना ही कहा था कि उनकी तबीयत बिगड़ी है. इसके अलावा हिशाम के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी.
उस वीडियो में हिशाम वेंटिलेटर पर थे. उनके बगल में इसराइल का जारी किया हुआ पहचान पत्र दिख रहा था.
हमास के साथ संघर्ष में मारे गए हदार गोल्डिन के भाई ज़ुर गोल्डिन ने इसराइल से अपील की है कि वो हमास की किडनैपिंग रोकने के लिए पारदर्शी नीति अपनाए.
इसराइल के नेशनल न्यूज़ ने ज़ु़र गोल्डिन के बयान का उल्लेख करते हुए लिखा है, ‘हर अपहरण परिवारों पर असर डालता है. अपहरण को परिवार और समाज को तोड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसे लेकर हम एक ही ढर्रे वाले बर्ताव के आदी हो गए हैं. बंधकों और लापता लोगों से किनारा करने को अपनी नियति मान चुके हैं.’’
वो ये भी कहते हैं, ‘’एक बार लड़ाई का दौर शुरू होता है, फिर शांति होती है, उसके बाद फिर लड़ाई और उसके बाद थोड़ी देर और शांति.‘’
बीबीसी से बातचीत में हैगाई हदास ने कहा कि हमास के बंधकों को छुड़ाना बेहद जटिल और विवादास्पद है.
हैगाई हदास बताते हैं, "कहीं भी आतंकियों से कोई डील करने में दुविधा होती है क्योंकि नतीजे अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी.’’
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