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भारत में जी20 सम्मेलन क्या रूस-यूक्रेन युद्ध की छाया से उबर पाएगा?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत की राजधानी नई दिल्ली में 9 और 10 सितंबर को होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग़ैरमौजूदगी से कई सवाल खड़े हो गए हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और जर्मन चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स समेत कई वैश्विक नेता इस सम्मेलन में शिरकत करने पहुँच रहे हैं.
लेकिन दो प्रमुख नेताओं के शामिल न होने से महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर वार्ता के आगे बढ़ने की संभावना कम हो गई है.
प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी के लिए राजधानी पूरी तरह चाक चौबंद है. पहली बार है, जब ये सम्मेलन भारत की अध्यक्षता में आयोजित हो रहा है, जो प्रगति मैदान में होगा.
जी20 सम्मेलन के लिए प्रगति मैदान में एक नया और अत्याधुनिक सम्मेलन भवन, भारत मंडपम बनाया गया है.
यहीं पर आगामी सप्ताहांत में दुनिया के शीर्ष नेता मिलेंगे और मौजूदा मुद्दों पर बातचीत करेंगे.
पश्चिमी देशों के नेता, विदेश मामलों के एक्सपर्ट और विश्लेषकों का मानना है कि पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में हुए जी20 शिखर सम्मेलन की तरह ही इस सम्मेलन में भी यूक्रेन युद्ध का मुद्दा छाया रहेगा.
मतभेद
रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर बाली सम्मेलन के दौरान विकसित या पश्चिमी देशों और ग्लोबल साउथ कहे जाने वाले विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेद देखने को मिले थे.
इन मतभेदों के इस बार भी जारी रहने के कई संकेत पहले से मौजूद हैःं
- अमेरिकी विदेश मंत्रालय प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा, “हमारी बातचीत के सभी मुद्दों में यह (यूक्रेन में युद्ध) शीर्ष विषयों में से एक है. और इसमें कोई शक नहीं कि जी20 में यह सबसे बड़ा मुद्दा होगा.” उन्होंने ये टिप्पणी 8 अगस्त को एक प्रेस कांफ़्रेंस में यूक्रेन युद्ध को लेकर की थी.
- पिछले हफ़्ते जस्टिन ट्रूडो ने दिल्ली में अपनी भागीदारी की पुष्टि करते हुए कहा था, “मैं जी 20 में सम्मेलन में जाऊंगा और हम ये सुनिश्चित करना जारी रखेंगे कि दुनिया यूक्रेन के साथ खड़ी है.”
- बीती जुलाई में गांधीनगर में जी20 के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की दो दिन की बैठक, रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर क्या भाषा इस्तेमाल की जाए इस पर मतभेद के कारण, बिना किसी नतीजे के ख़त्म हुई.
इससे पहले मार्च में जी20 के विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस यूक्रेन युद्ध का मुद्दा हावी रहा और इसलिए अंतिम साझा विज्ञप्ति जारी नहीं हो सकी. मेज़बान के तौर पर भारत ने बैठक का सारांश जारी किया.
जी20 के लिए भारत के शेरपा अमिताभ कांत ने भारत की स्थिति को दुहराते हुए कहा है कि जी20 महत्वपूर्ण ग्लोबल आर्थिक मुद्दों पर बातचीत का फ़ोरम है.
13 जुलाई को शेरपाओं की एक बैठक के दौरान उन्होंने कहा, “रूस यूक्रेन युद्ध हमारी देन नहीं है, ये विकाशील और उभरते हुए देशों की देन नहीं है, ये हमारे लिए प्राथमिकता नहीं है...ये किसी और के लिए प्राथमिकता हो सकती है.”
क्या बाली सम्मेलन का मुद्दा दिल्ली में भी छाया रहेगा?
नवंबर 2022 में बाली सम्मेलन में रूस यूक्रेन युद्ध का मुद्दा छाया रहा, क्योंकि इससे कुछ ही महीने पहले रूस ने आक्रमण कर दिया था.
सम्मेलन के अंत में नेताओं ने संयुक्त बयान में ‘यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस की आक्रामकता की कड़ी निंदा की और यूक्रेन के इलाक़े से बिना शर्त पूरी तरह पीछे हटने का आह्वान किया.’
दूसरे साल में प्रवेश कर चुका रूस-यूक्रेन युद्ध न केवल लंबा खिंच रहा है बल्कि इसने वैश्विक संकट को बढ़ाया है, जिसकी वजह से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है.
युद्ध के कारण वैश्विक महंगाई और बेरोज़ग़ारी आसमान छू रही है और इसकी वजह से अफ़्रीका और कई अन्य ग़रीब देशों में खाने पीने की चीजों की भारी किल्लत हो गई है.
जी20 में सबसे ताक़तवर ब्लॉक जी7 का है, जिसके सदस्य विकसित देश हैं- कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका.
इसके अधिकांश सदस्य देश नैटो सैन्य गठबंधन के भी सदस्य हैं, जिसे रूस के कट्टर विरोधी के रूप में देखा जाता है.
विदेश मामलों की नीति के जानकारों का कहना है कि बाली सम्मेलन में उठा मुद्दा दिल्ली में भी चर्चा का विषय रहेगा.
दिल्ली में विदेशी नीति के जानकार और भारत सरकार की नीतियों के समर्थक डॉ. सुवरोकमल दत्ता कहते हैं, “अमेरिका कह चुका है कि दिल्ली सम्मेलन में यूक्रेन का मुद्दा उसकी प्राथमिकता होगी और कई अन्य नैटो देशों ने भी यही बात दुहराई है.”
“इसलिए जब सम्मेलन में इस मुद्दे पर चर्चा होगी, भारत का पक्ष स्पष्ट हो जाएगा. भारत किसी के प्रति पक्षपात नहीं दिखाएगा, चाहे यूक्रेन हो या रूस या अमेरिका. भारत यही कहेगा कि मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहिए.”
मीरा शंकर 2009 से 2011 के बीच अमेरिका में भारत की राजदूत थीं. उन्हें लगता है कि जी20 सम्मेलन के अध्यक्ष और मेज़बान के तौर पर भारत के लिए यह मुद्दा बहुत नाज़ुक और संवेदनशील है.
वो कहती हैं, "भारत को ऐसे समय अध्यक्षता मिली है, जब महाशक्तियों के बीच तनाव और मतभेद ने युद्ध का रूप ले लिया है. यूक्रेन में अमेरिका और पश्चिमी देशों और रूस के बीच एक छद्म युद्ध चल रहा है."
भारत की पूर्व राजदूत नीलम देव का मानना है कि हो सकता है कि यूक्रेन युद्ध को लेकर विकासशील देशों और विकसित देशों के बीच मौजूदा गहरा मतभेद दिल्ली सम्मेलन पर छाया रहे लेकिन इस संकट का हल यहां संभव नहीं है.
मीरा शंकर चेताती हैं कि ‘जी20 के एजेंडे पर यूक्रेन युद्ध का मुद्दा हावी नहीं होना चाहिए. जी20 का एजेंडा आर्थिक विकास है.’
हॉन्ग कॉन्ग में विदेश नीति के मामलों के एक थिंक टैंक, सोसाइटी फ़ॉर एडवांस स्टडी ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशंस से जुड़े प्रोफ़ेसर हेई सिंह त्सो का कहना है, “मुझे लगता है कि इस समय रूस यूक्रेन संघर्ष पर फ़ोकस अधिक है, जबकि जी20 आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित फ़ोरम है.”
कैसे बना था जी20 का फ़ोरम?
साल 2008 में दुनिया भारी आर्थिक संकट से जूझ रही थी. उसी दौरान दुनिया की 20 बड़ी अर्थवस्थाओं के शीर्ष नेता पहली बार वॉशिंगटन में मिले.
बड़ी ग्लोबल अर्थव्यवस्थाओं के तौर पर, इन नेताओं ने स्वीकार किया कि वैश्विक आर्थिक रिकवरी के लिए उनका सामूहिक सहयोग ज़रूरी है.
तब ये तय किया गया कि जी20 ग्रुप, जिसे 1997-99 के दौरान वित्तीय उथल पुथल से निपटने के लिए बनाया गया था, इसे शिखर सम्मेलन के स्तर तक ले जाया जाए.
तभी से इसने वित्तीय और मौजूदा ग्लोबल मुद्दों पर बातचीत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच का रूप ग्रहण किया.
जी20 में 19 विकसित और विकासशील देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं. इसके सालाना शिखर सम्मेलन में सबसे ताक़तवर देशों के नेता दुनिया के तत्कालीन मुद्दों पर बातचीत के लिए इकट्ठा होते हैं.
इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं.
हर साल एक सदस्य देश को इसके सम्मेलन की अध्यक्षता सौंपी जाती है. पिछले साल इसकी बागडोर इंडोनेशिया को दी गई थी. इस साल भारत को दी गई है. इसके बाद ब्राज़ील और फिर दक्षिण अफ़्रीका की बारी आएगी.
हालांकि जी20 मुख्य तौर पर वैश्विक आर्थिक संकट पर चर्चा का फ़ोरम है लेकिन अतीत में कुछ अन्य मुद्दों पर भी फ़ोकस किया गया.
इससे पिछले सम्मेलन में कोविड-19 महामारी, ईरान के परमाणु कार्यक्रमऔर सीरियाई गृहयुद्ध जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई लेकिन इन पर वार्ता बहुत सफल नहीं रही.
पिछले साल 1 दिसम्बर से जबसे भारत को जी20 की अध्यक्षता मिली है, उसकी प्राथमिकता वैश्विक अर्थव्यवस्था में कमज़ोरियों, विकास दर में गिरावट, बढ़ती महंगाई, सप्लाई चेन में रुकावट, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और फ़ूड सिक्योरिटी पर फ़ोकस करना रही है.
इस ग्रुप में मौजूद अधिकांश पश्चिमी देशों की, रूस यूक्रेन युद्ध को सम्मेलन का मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश के बावजूद भारत ने सम्मेलन की प्राथमिकता को आर्थिक मुद्दों और जलवायु परिवर्तन के ईर्द गिर्द ही रखा है.
विदेश नीति विश्लेषक डॉ. सुवारोकमल दत्ता का कहना है, “यूक्रेन ही जी20 का अकेला मुद्दा नहीं है. इसके साथ फ़ूड सिक्युरिटी, तेल संकट, बेरोज़गारी, पर्यावरणीय नुकसान और ग़रीबी भी मुद्दा है. इन सभी मुद्दों पर बातचीत होगी.”
क्या भारत ग्लोबल साउथ की आवाज़ है?
जी20 के अन्य देश जैसे भारत, चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीका और इंडोनेशिया, ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं और इस फ़ोरम में उनकी मज़बूत आवाज़ है.
ये विकासशील देश हैं और भारत, इन अर्थवस्थाओं की आकांक्षा को प्रतिध्वनित करता है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल की शुरुआत में दिए अपने भाषण में कहा था, “इस साल भारत जी20 की अध्यक्षता कर रहा है तो ये स्वाभाविक है कि हमारा मकसद ग्लोबल साउथ की आवाज़ को बुलंद करना है. ग्लोबल साउथ के लोग अब विकास से लाभान्वित हो सकते हैं. हमें बाहर नहीं रखा जा सकता. ग़रीबी ख़त्म करने, अवसरों को बढ़ाने, विकास को सपोर्ट करने और विकास और संपन्नता में वृद्धि के लिए वित्तीय प्रशासन और वैश्विक राजनीति को आकार देने के लिए हमें एक साथ काम करना होगा.”
भारत विकासशील देशों की आवाज़ रहा है, जो दिल्ली सम्मेलन के दौरान जी20 में अफ़्रीकी संघ को शामिल करने का मुद्दा उठाने के मोदी के वादे से ज़ाहिर भी होता है.
डॉ. सुवारोकमल दत्ता के अनुसार, इस कोशिश में ग्लोबल साउथ के देश भारत के साथ हैं, “शुरू से ही भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने की कोशिश की है. ग्लोबल साउथ के सभी छोटे देश, चाहे वो अफ़्रीका के हों या एशिया प्रशांत के या हिंद महासागर के देश, कैरिबियन द्वीपों या दक्षिण अमेरिकी देश हों, सभी ने भारत के इस स्टैंड की तारीफ़ की है और इसे स्वीकार किया है.”
लेकिन ये आम तौर पर माना जाता है कि जी20 में ग्लोबल साउथ की आवाज़ फिर भी कमज़ोर है.
अमेरिका में भारत की राजदूत रहीं मीरा शंकर के मुताबिक, भारत और चीन को विकासशील देशों की आवाज़ बननी चाहिए, “ग्लोबल साउथ की आवाज़ बहुत कमज़ोर है. ये बहुत अच्छा होगा, अगर भारत और चीन दोनों ही अपनी आवाज़ उठाएं, ये बहुत प्रभावी होगा.”
हॉंगकॉंग के प्रोफ़ेसर हेई सिंग त्सो का तर्क है कि ग्लोबल साउथ देशों की ये सामूहिक कोशिश होनी चाहिए.
वो कहते हैं कि भारत और चीन के अलावा, दक्षिण अफ़्रीका, ब्राज़ील, तुर्की और अर्जेंटीना जैसे सदस्य देशों को भी ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने की ज़रूरत है ताकि फ़ोरम के शिखर सम्मेलनों के दौरान इनकी आवाज़ प्रमुखता से सुनी जा सके.
दिल्ली सम्मेलन की सफलता का मापदंड क्या होगा?
विदेश नीति के कुछ जानकारों का मानना है कि अगर यूक्रेन का एजेंडा हावी होता है तो सम्मेलन में भारत मुख्य भूमिका निभा सकता है.
प्रोफ़ेसर हेई सिंग त्सो का कहना है कि जी20 के अध्यक्ष और मेज़बान होने के नाते भारत को युद्ध रोकने की पहल करने का प्रस्ताव देना चाहिए.
वो कहते हैं, “मेरा मानना है कि यूक्रेन युद्ध एक समस्या है. एक संकट है. लेकिन यह एक अवसर भी है. उदाहरण के लिए, पिछले साल कई देशों ने रूसी-यूक्रेन संकट में मध्यस्थता करने की कोशिश की. चीन की ओर से एक लिखित प्रस्ताव है. ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला ने दावा किया था कि वो मध्यस्थता करना चाहते हैं, दक्षिणी अफ़्रीकी नेता मध्यस्थता के लिए गए भी थे. तो फिर भारत क्यों नहीं? मुझे लगता है कि भारत को शांति प्रक्रिया और मध्यस्थता को बढ़ावा देना चाहिए.”
भारत को उनकी सलाह है कि उसे एक संघर्ष विराम का प्रस्ताव आगे करना चाहिए, “मुझे लगता है कि यूक्रेन और रूस के बीच सबसे अहम बात संघर्ष विराम है. ये पहली चीज है. युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है, ये बात में तय किया जा सकता है.”
प्रोफ़ेसर त्सो कहते हैं कि अगर भारत ऐसा कर सकता है तो ये मोदी के लिए एक सफलता होगी, “सम्मेलन की सफलता का ये एक मानक होगा.”
मुंबई में विदेशी मामलों के थिंक टैंक ‘गेटवे हाउस’ चलाने वाली पूर्व राजनयिक नीलम देव कहती हैं कि फ़ोरम में विकासशील देशों की बहुत पूछ नहीं है.
वो कहती हैं, “हम यूक्रेन में शांति बहाली चाहते हैं. लेकिन शांति कैसे स्थापित हो, इस बारे में ग्लोबल साउथ का बहुत प्रभाव नहीं है. असल में ये जी20 सम्मेलन के बाहर का मुद्दा है. इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों का स्टैंड ग्लोबल साउथ से अलग हो सकता है.”
विदेश नीति के जानकार और पूर्व राजनयिक कहते हैं कि मोदी के नेतृत्व की ये परीक्षा है. अध्यक्ष के रूप में भारत की सफलता को इस रूप में आंका जाएगा कि वो अंतरराष्ट्रीय जगत की अलग अलग प्राथमिकताओं के बीच कैसे संतुलन स्थापित करने में क़ामयाब रहता है.
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