You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
लंदन-सिंगापुर प्लेन में टर्बुलेंस का अनुभव पैसेंजरों ने बताया, जानिए क्यों होता है टर्बुलेंस
लंदन-सिंगापुर फ्लाइट के टर्बुलेंस में फँसने के कारण 73 साल के ब्रितानी नागरिक जैफ किचन की मौत हो गई और क़रीब 30 लोग घायल हुए.
बैंकॉक में अधिकारियों के मुताबिक़, संदेह है कि जैफ की मौत हार्ट अटैक के कारण हुई.
इस टर्बुलेंस में घायल हुए सात लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है.
एक यात्री ने बताया कि जिस किसी ने भी सीट बेल्ट नहीं लगा रखी थी, वो प्लेन की छत से जा टकराया.
एक दूसरे यात्री ने कहा कि कई लोग घायल हुए हैं और कुछ के सिर पर चोट लगी है.
सिंगापुर एयरलाइंस ने कहा है कि म्यांमार के ऊपर से गुज़रते हुए प्लेन को काफ़ी ज़्यादा टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा.
एयरलाइन कंपनी के सीईओ गोह चून फूंग ने यात्रियों को हुए इस भयावह अनुभव के लिए माफ़ी मांगी है.
सिंगापुर एयरलाइंस की मानें तो फ्लाइट में 211 यात्रियों के अलावा क्रू के 18 लोग थे.
किस देश के कितने नागरिक फ्लाइट में थे?
- भारत- 3
- ऑस्ट्रेलिया- 56
- यूनाइटेंड किंगडम- 47
- सिंगापुर- 41
- न्यूज़ीलैंड 23
- मलेशिया- 16
यात्रियों ने बताया- फ्लाइट के अंदर कैसा था मंज़र
ब्रितानी नागरिक एंड्रयू डेविस ने बताया कि जब टर्बुलेंस शुरू हुआ तो बहुत ज़ोर से आवाज़ हुई और लोग चिल्लाने लगे.
वो कहते हैं- ''पहली चीज़ जो मुझे याद आती है वो ये कि चीज़ें हवा में उड़ती दिख रही थीं. मेरे ऊपर कॉफी गिर गई थी. ये बहुत तगड़ा टर्बुलेंस था.''
एक दूसरे यात्री ने बताया कि प्लेन अचानक ज़ोर से हिलने लगा.
28 साल के दज़ाफराम अज़मीर बोले, ''मैं इस टर्बुलेंस से संभलने की कोशिश करने लगा तभी बहुत नाटकीय तरीके से प्लेन नीचे आया. जिन लोगों ने सीट बेल्ट नहीं लगाई हुई थी, वो प्लेन की छत से जा टकराए. कुछ लोग सामान रखने वाले कैबिन से टकराए.''
एयरलाइन कंपनी का कहना है कि वो थाईलैंड के अधिकारियों के साथ मिलकर यात्रियों को मेडिकल मदद मुहैया करवाने पर काम कर रही है. कंपनी ने बैंकॉक में अपनी एक टीम भी भेजी है.
इस फ्लाइट में सफ़र कर रहे जोश की मां ने अपने बेटे के भेजे मैसेज के बारे में बताया. इस मैसेज में जोश कहते हैं- ''नहीं चाहता कि आप घबराएं पर मैं एक ख़तरनाक फ्लाइट में हूं. ये प्लेन इमर्जेंसी लैंडिंग करने जा रहा है. आई लव यू ऑल.''
जोश को इस सफर में मामूली चोटें आई हैं. मगर वो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि मौत के इतने क़रीब आने का जोश पर असर रहेगा.
68 साल के जैरी प्लेन से ऑस्ट्रेलिया अपने बेटे की शादी में जा रहे थे.
वो कहते हैं- ''मेरा सिर छत से टकराया. प्लेन के ज़ोर से हिलने से पहले कोई चेतावनी नहीं दी गई थी.''
एक यात्री ने कहा कि वो ख़ुशकिस्मत हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य इस हादसे में मारा नहीं गया.
उन्होंने कहा, ''प्लेन में पहले बिल्कुल टर्बुलेंस नहीं था और फिर अचानक प्लेन ज़ोर से हिलने लगा. मैं छत से जा टकराया. ये सब अचानक हुआ.''
जलवायु परिवर्तन के कारण टर्बुलेंस बढ़ेंगे?
टर्बुलेंस होने का सबसे कॉमन कारण है- किसी फ्लाइट का बादलों से गुज़रना.
लेकिन एक क्लीयर एयर टर्बुलेंस भी होता है, जो किसी प्लेन के मौसम वाले रडार में नहीं दिखता है.
एविएशन एक्सपर्ट जॉन स्ट्रिकलैंड ने बीबीसी को बताया, ''लाखों फ्लाइट रोज़ उड़ान भरती हैं. ऐसे में ज़ोरदार टर्बुलेंस की घटना तुलनात्मक तौर पर कम ही होती हैं.''
जॉन बोले, ''हालांकि कुछ टर्बुलेंस नाटकीय हो सकते हैं और इस कारण लोग चोटिल हो सकते हैं. या जैसा इस केस में हुआ कि किसी की जान भी जा सकती है.''
वो बताते हैं कि फ्लाइट क्रू को इस बात की ट्रेनिंग दी जाती है कि टर्बुलेंस आने पर कैसे निपटा जाए.
जॉन कहते हैं- एयरलाइन कंपनियां फ्लाइट के दौरान सीट बेल्ट लगाए रखने की सलाह यूं ही नहीं देती हैं. फिर चाहे यात्रा छोटी हो या लंबी.
एविएशन जर्नलिस्ट सैली गेथिन का कहना है कि सीट बेल्ट लगाने से ज़िंदगी और मौत का फ़र्क़ हो सकता है.
एक रिसर्च में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में गंभीर तरह के टर्बुलेंस और बढ़ सकते हैं.
फ्लाइट टर्बुलेंस क्या है और क्यों होता है?
जो लोग प्लेन की यात्रा करते रहते हैं, वो टर्बुलेंस से वाकिफ होंगे. टर्बुलेंस के कारण प्लेन की ऊंचाई और स्थिरता में बदलाव दिखता है.
ये समझिए कि टर्बुलेंस में प्लेन ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगता है.
बीबीसी वेदर के सिमॉन किंग के मुताबिक़, बादलों में ज़्यादातर टर्बुलेंस तब होता है जब हवाएं ऊपर और नीचे की ओर चल रही होती हैं.
इनमें से ज़्यादातर टर्बुलेंस हल्के ही होते हैं. लेकिन क्यूम्यलोनिम्बस जैसे बड़े बादलों में हवा की दिशा और रफ़्तार गंभीर तरह के टर्बुलेंस के पैदा कर सकती है.
क्यूम्यलोनिम्बस यानी वो विशाल बादल जिनसे गरजने की भी आवाज़ आती है और बिजली भी चमकती है.
एक दूसरे तरह का टर्बुलेंस क्लीन एयर टर्बुलेंस कहलाता है. जैसा कि नाम से पता चल रहा है कि इसमें बादल नहीं होते हैं और इन्हें देखा नहीं जा सकता.
ये प्लेन के रडार में नहीं दिखते हैं और ये ज़्यादा दिक़्क़त की बात है कि इन्हें पकड़ना मुश्किल भी है.
हवाओं की तेज़ बहती 'नदी'
एविएशन एक्सपर्ट और कर्मशियल पायलट ग्रैट्टन कहते हैं- इस तरह के टर्बुलेंस जेट स्ट्रीम के क़रीब होते हैं.
आसान भाषा में कहें तो जेट स्ट्रीम को आप तेज़ बह रही हवाओं की एक 'नदी' समझिए, जो आमतौर पर 40-50 हज़ार फुट की ऊंचाई पर पाई जाती हैं.
ग्रैटन कहते हैं कि जेट स्ट्रीम और इसके आस-पास की हवा में आप 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार आसानी से रख सकते हैं.
जेट स्ट्रीम के आस-पास की धीमी और तेज हवाओं में टकराव के कारण टर्बुलेंस होता है. ये हमेशा मौजूद रहती हैं और इसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता है.
उदाहरण के लिए अगर आप यूरोप से उत्तरी अमेरिका की ओर जा रहे हैं तो इससे बचना मुश्किल है. इस कारण ज़ोरदार टर्बुलेंस हो सकते हैं.
टर्बुलेंस कितने ख़तरनाक हो सकते हैं?
एविएशन के प्रोफेसर एयरक्राफ्ट ऐसे डिजाइन किए जाते हैं कि वो बुरे से बुरे टर्बुलेंस का सामना कर सकते हैं.
वो बोले, ''इसकी आशंका कम ही है कि टर्बुलेंस के कारण कभी कोई विमान बर्बाद हो जाए.''
हालांकि इससे एयरक्राफ्ट की मुश्किलें आसान नहीं होती हैं. इसी कारण पायलट या तो अपनी गति कम करते हैं या फिर सीट बेल्ट लगाने के लिए कहते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि बुरे हालात में तेज़ हवाओं के कारण टर्बुलेंस से प्लेन के ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है.
ज़ोरदार टर्बुलेंस यात्रियों के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं क्योंकि जैसी हलचल होती है, उस कारण सीट बेल्ट ना पहने हुए यात्री कहीं भी जाकर टकरा सकते हैं.
हालांकि एविएशन सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि टर्बुलेंस के कारण मौत या गंभीर चोटें लगने की संभावनाएं कम ही होती हैं.
यूएस नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड का कहना है कि 2009 से 2022 के बीच अमेरिकी एयरलाइन कंपनियों की फ्लाइट्स में अब तक 163 ज़ोरदार टर्बुलेंस होने की घटनाएं हुई हैं. औसतन हर साल 12.
पायलट टर्बुलेंस से कैसे निपटते हैं?
उड़ान भरने से पहले पायलटों को ख़ास तरह की मौसम संबंधी जानकारियां दी जाती हैं.
पायलट उड़ान के लिए रूट प्लान करने से पहले इन जानकारियों का अध्ययन करते हैं.
इसका मतलब ये हुआ कि पायलट उसे रास्तों पर जाने से बच सकता है, जहां क्लीन एयर टर्बुलेंस की संभावनाएं रहती हैं.
अगर कोई रूट किसी पायलट ने लिया हुआ तो वो इसके बारे में जानकारियों को रिपोर्ट करता है. इन जानकारियों को भी पायलट टर्बुलेंस से बचने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. फिर चाहे प्लेन की गति कम करना हो या फिर कम ऊंचाई पर उड़ना हो.
केबिन क्रू को भी टर्बुलेंस से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है.
टर्बुलेंस में सुरक्षित बचे रहने के लिए यात्रियों को सलाह रहती है कि सीट बेल्ट लगाए रखें और भारी सामान को बाहर ना रखें.
टर्बुलेंस कभी भी आ सकता है, इस कारण यात्रियों को सलाह रहती है कि सीट बेल्ट हमेशा लगाए रखें.
ब्रिटेन की रीडिंग यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों ने एक स्टडी में पाया था कि 1979 से 2020 के बीच नॉर्थ एटलांटिक रूट पर टर्बुलेंस के मामले 55 फ़ीसदी बढ़े हैं.
इस स्टडी में ऐसा होने की वजह कार्बन उत्सर्जन को बताया गया था.
ग्रैटन कहते हैं कि अब हम ज़्यादा उड़ानें भरते हैं, इस कारण भी टर्बुलेंस की घटनाएं ज़्यादा हो रही हैं.
इसका मतलब ये हुआ कि आसमान जितना व्यस्त रहेगा, टर्बुलेंस से बचने की पायलट के तरीके उतने ही कम होंगे क्योंकि उसे हवा में दूसरे प्लेन से एक तय दूरी पर भी रहना होता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)