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मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का अचानक इस्तीफ़ा, क्या बीजेपी को राज्य में सरकार गंवाने का डर था?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के 21 महीने बाद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने रविवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. बीरेन सिंह के खिलाफ सोमवार (आज) से शुरू होने वाले विधानसभा के बजट सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी थी.
इसके अलावा प्रदेश बीजेपी में भी पिछले कुछ महीनों से सीएम बदलने को लेकर लामबंदी हो रही थी. बीजेपी के कुछ वरिष्ठ विधायकों ने दिल्ली जाकर केंद्रीय नेतृत्व के सामने कई बार यह मांग रखी थी.
लेकिन अविश्वास प्रस्ताव से पहले बीरेन सिंह ने अचानक इस्तीफ़ा दे दिया है, जिससे कई सवाल भी खड़े हो रहें हैं.
पिछले कुछ महीनों से बीरेन सिंह मीडिया के सामने यह दावा करते रहे कि उनकी सरकार राज्य में शांति बहाल करने की कोशिश कर रही है और कानून-व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है.
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मणिपुर में हिंसा की अंतिम घटना पिछले 4 जनवरी को कांगपोकपी जिले में हुई थी.
कुकी बहुल कांगपोकपी ज़िले में लोगों और सुरक्षाबलों के बीच हुई झड़प में पुलिस अधीक्षक समेत कई लोग घायल हो गए थे. लेकिन बीते दो महीनों में राज्य में हिंसा में किसी की जान नहीं गई है.
मणिपुर बीजेपी के अंदर मतभेद
ऐसे में अगर प्रदेश में सब कुछ ठीक हो रहा था तो मुख्यमंत्री के इस्तीफ़े की नौबत क्यों आ गई?
मणिपुर की राजनीति को कई दशकों से कवर करने वाले इंफाल रिव्यू ऑफ आर्ट्स एंड पॉलिटिक्स के संस्थापक संपादक प्रदीप फंजौबाम कहते हैं, "हिंसा को लंबा वक्त हो गया है और समाधान के नाम पर कुछ भी सामने दिख नहीं रहा है. ऐसे में प्रदेश बीजेपी के अंदर ही काफी मतभेद शुरू हो गए थे."
"बीजेपी के लोग ही मुख्यमंत्री बदलने की मांग कर रहे थे और 10 फरवरी से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही थी. अगर इसमें बीजेपी के ज्यादातर विधायक सीएम के खिलाफ वोट करते तो पार्टी की काफी किरकिरी होती. बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने काफी सोच समझकर ही यह फैसला लिया है."
अगर बीजेपी के ज्यादातर विधायक पार्टी के खिलाफ जाते तो क्या मणिपुर बीजेपी के हाथ से निकल जाता?
इस सवाल के जवाब में फंजौबाम कहते हैं, "जिस तरह की स्थिति बन रही थी उसमें बीजेपी के लिए बीरेन सिंह को हटाने में ही फायदा था. क्योंकि सत्तापक्ष के विधायक दूसरी पार्टी के विधायकों से मिलकर नई लीडरशिप बना लेते और कोई तीसरा मोर्चा खड़ा कर देते तो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती थीं. लिहाजा अब कम से कम अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही बनेगा."
कुकी-जो जनजाति के 10 विधायकों ने भी राज्य में तीन मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा के लिए बीरेन सिंह को जिम्मेदार ठहराया था और वो शुरू से सीएम को हटाने की मांग कर रहे थे.
इन 10 विधायकों में सात बीजेपी के विधायक हैं, जिनमें से दो मंत्री हैं.
वरिष्ठ पत्रकार फंजौबाम की माने तो मुख्यमंत्री बदलने से अब दोनों समुदाय के बीच बातचीत की संभावना को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी. लेकिन इसमें अभी वक्त लगेगा. क्योंकि कुकी-जो जनजाति के ये 10 विधायक बीते 21 महीनों से विधानसभा के किसी भी सत्र में शामिल नहीं हुए हैं.
सीएम को हटाने के लिए विधायकों की पीएम को चिट्ठी
इससे पहले मणिपुर में बीजेपी के 19 विधायकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को हटाने की मांग की थी.
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में विधानसभा अध्यक्ष थोकचोम सत्यव्रत सिंह, मंत्री थोंगम विश्वजीत सिंह और युमनाम खेमचंद सिंह शामिल थे.
मणिपुर में एनपीपी यानी नेशनल पीपुल्स पार्टी के एक विधायक ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "बीरेन सिंह बतौर मुख्यमंत्री पूरी तरह नाकाम हो गए थे जिससे मणिपुर हर स्तर पर बर्बादी की कगार पर पहुंचता चला गया."
"पिछले छह महीनों से मैतेई, कुकी और नागा विधायक एक साथ मिलकर सीएम बीरेन को हटाने के लिए केंद्रीय नेताओं से बात कर रहे थे. इन विधायकों ने अक्तूबर में पीएम को चिट्ठी भी लिखी थी."
एनपीपी विधायक ने बताया, "इस साल 3 फरवरी को मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष थोकचोम सत्यव्रत सिंह के नेतृत्व में कई विधायकों ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर सीएम बीरेन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात से अवगत कराया था."
"लिहाजा गृह मंत्री सोचने पर मजबूर हो गए. क्योंकि क़रीब 33 विधायक सीएम बीरेन के खिलाफ इस अविश्वास प्रस्ताव में एक साथ थे. अगर गृह मंत्री तुरंत कोई फैसला नहीं लेते तो सरकार नहीं बचती."
विधायक के अनुसार सोमवार को जब बजट सत्र के पहले दिन सीएम बीरेन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला लिया गया तो यह एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. अगर नेतृत्व परिवर्तन की अपील अनसुनी होती तो असंतुष्ट विधायकों ने सत्र के दौरान एक अन्य कठोर फैसला लेने की तैयारी कर ली थी.
'इस्तीफ़े के बाद भी अलग प्रशासन की मांग जारी रहेगी'
इससे पहले बीते सप्ताह प्रदेश के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह भी दिल्ली पहुंचे थे. ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को सावधान किया था कि अगर सीएम को नहीं बदला गया तो सरकार गिर सकती है.
मंत्री के दौरे के तुरंत बाद राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने 4 फरवरी को गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर उन्हें स्थिति से अवगत कराया था.
कुकी बहुल इलाकों के लिए लगातार अलग प्रशासन की मांग कर रहे जनजाति संगठनों का कहना है कि 21 महीनों बाद सीएम ने इस्तीफ़ा दिया है, लेकिन हम अपनी मांग नहीं छोड़ेंगे.
कुकी-ज़ो संगठनों की शीर्ष संस्था कुकी ज़ो काउंसिल के प्रवक्ता गिंजा वुअलज़ोंग ने कहा, "बीरेन सिंह सीएम हों या न हों, अलग प्रशासन की हमारी मांग वही रहेगी. हमें मैतेई लोगों से अलग कर दिया गया है और अब वापस जाने का कोई रास्ता नहीं है. बहुत खून बहा है. केवल एक राजनीतिक समाधान ही हमें इससे मुक्ति दिला सकता है."
गिंजा वुअलज़ोंग ने सीएम बीरेन के इस्तीफे को अलग मामला बताया है.
उनका कहना है,"मुझे लगता है कि बीरेन सिंह को पता था कि मणिपुर विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव में उन्हें बाहर कर दिया जाएगा. लिहाजा अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया होगा."
अधर में लटका सदन और सीएम का एक आखिरी प्रयास
64 साल के बीरेन सिंह पर बीते कुछ महीनों में तानाशाही के आरोप लगते रहे हैं.
ऐसे में क्या अब उनके पास समय समाप्त हो गया है या वे एक बार फिर विपरीत परिस्थितियों से पार पा लेंगे?
दरअसल राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने इस्तीफ़ा स्वीकार करते हुए बीरेन सिंह से कहा कि वे "वैकल्पिक व्यवस्था होने तक पद पर बने रहें."
ऐसे में सदन न तो भंग हुआ है और न ही इसे निलंबित करने के बारे में कोई आधिकारिक बयान आया है.
हालांकि राज्यपाल ने रविवार देर रात एक आदेश जारी कर मणिपुर की बारहवीं विधानसभा का 7वां सत्र बुलाने के 24 जनवरी के अपने पुराने आदेश को रद्द कर दिया है.
मणिपुर की मौजूदा राजनीति को समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक कवि मरम कहते हैं, "इस व्यवस्था का मतलब है कि बीरेन सिंह पद से हट गए हैं, लेकिन अभी पूरी तरह से बाहर नहीं हुए हैं. वे कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में प्रभावशाली पद पर बने रहेंगे."
"इससे उन्हें अपने उत्तराधिकारी के चयन में लाभ मिलेगा. इसके अलावा इससे उन्हें कुछ पैंतरेबाज़ी करने का समय भी मिल जाएगा. बीरेन सिंह की राजनीति शुरू से ही ऐसी रही है जब वो कांग्रेस में थे तब भी वो किसी भी मौके को खाली नहीं जाने देते थे."
सुप्रीम कोर्ट में सीएम के खिलाफ याचिका
मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के इस्तीफे को कुछ लोग उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दर्ज कराई गई याचिका से भी जोड़ कर देख रहें हैं.
असल में कुकी जनजाति के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने राज्य में हिंसा भड़काई है और इस संदर्भ में एक ऑडियो टेप को सबूत के तौर पर अदालत में जमा कराया गया है.
एक गैर-लाभकारी फोरेंसिक प्रयोगशाला 'ट्रुथ लैब्स' ने पुष्टि की है कि इस ऑडियो टेप में 93 प्रतिशत आवाज़ बीरेन सिंह की आवाज से मेल खाती है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने 3 फरवरी को केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला से इस ऑडियो टेप की जांच पर रिपोर्ट पेश करने को कहा है.
पूर्वोत्तर राज्यों में कई दशकों से पत्रकारिता कर रहे समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "मणिपुर बीजेपी में अब बहुत कम लोग बचे हैं जो बीरेन सिंह को लगातार सीएम की भूमिका में देखना चाहते हैं."
"बात जहां तक इस ऑडियो टेप की है तो सुप्रीम कोर्ट मामले को देख रही है ऐसे में अगर टेप की आवाज़ बीरेन सिंह से मेल खाती है तो बीजेपी के लिए बड़ी दिक्कत खड़ी हो जाएगी. क्योंकि यह टेप कई महीने पहले जारी हुआ था और उसके बाद भी हिंसा की कई घटनाएं हुई हैं."
कुकी नेता गिंजा वुअलज़ोंग कहते हैं कि सीएम बीरेन सिंह अदालत में दायर याचिका को लेकर काफी चिंतित हैं, क्योंकि मैतेई-कुकी हिंसा में अगर कोर्ट में उनकी भूमिका पर लगे आरोप तय होते हैं तो उन्हें कोई नहीं बचा सकता.
इस बीच कांग्रेस का कहना है कि मणिपुर में बीरेन सिंह का इस्तीफ़ा मजबूरी में लिया गया एक निर्णय है.
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, "मणिपुर विधानसभा में सोमवार को सेशन की शुरुआत थी, बीरेन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ रहा था - जो वह हर क़ीमत पर हारते, उनके ख़ुद के विधायक उनके साथ नहीं थे."
"यही नहीं, जो 9 विधायक जेडीयू और मणिपुर पीपुल्स पार्टी से उनके साथ आए थे, वो भी अयोग्य घोषित होने की कगार पर हैं. यह मुँह छिपाने के अंदेशे से दिया गया इस्तीफ़ा है."
मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के इस्तीफे को मणिपुर के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण फैसला बताते हुए प्रदेश बीजेपी के एक प्रवक्ता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, "पार्टी के कुछ असंतुष्ट समूह विधायकों ने कांग्रेस और कुकी विधायकों के साथ मिलकर सीएम के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की योजना बनाई थी. लिहाजा केंद्रीय नेताओं को पार्टी के सम्मान को बचाने के लिए यह फैसला लेना पड़ा."
"लेकिन सीएम को हटाने का न तो यह सही समय था और न ही मणिपुर के लोग यह चाहते थे. क्योंकि कुकी विधायक पहले दिन से बीरेन सिंह को हटाने की मांग कर रहे हैं, कांग्रेस भी उन लोगों के साथ मिली हुई है."
उनका कहना है, "जबकि बीरेन सिंह ही एक मात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने मणिपुर की अखंडता पर कोई समझौता नहीं किया. केंद्रीय नेतृत्व ने यह कठोर फैसला जरूर लिया है लेकिन वह जल्द ही पार्टी के असंतुष्ट खेमे को सबक सिखाएगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित