ईडी-सीबीआई को लेकर झारखंड सरकार ने लिया फ़ैसला, क्या होगा असर?

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
कभी सबसे कम उम्र में सिविल सेवा की परीक्षा पास करने वाली झारखंड कैडर की चर्चित आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल इन दिनों न्यायिक हिरासत में हैं.
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उन्हें मई 2022 में गिरफ़्तार किया था. कोर्ट में पेश चार्जशीट में ईडी ने उन पर कई गंभीर आरोप लगाए थे.
इसके बाद सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया. गिरफ़्तारी के वक्त वो झारखंड की खनन सचिव थीं.
दिलचस्प है कि पिछली रघुबर दास सरकार में भी वो महत्वपूर्ण पदों पर रही थीं.
रांची के उपायुक्त (डीसी) रहे युवा आईएएस छविरंजन भी पिछले आठ महीने से जेल में बंद हैं. उनकी गिरफ़्तारी भी ईडी ने की थी.
वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2011 बैच के अधिकारी हैं और उनका ताल्लुक मध्यम वर्गीय परिवार से है.
केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी ने अपनी अलग-अलग चार्जशीट में इन दोनों अधिकारियों पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. ये मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं.
गिरफ़्तारी से पहले ईडी के अधिकारियों ने इन अफसरों से घंटों पूछताछ की थी.
ईडी ने झारखंड के एक और आईएएस अधिकारी रामनिवास यादव के आवास पर पिछले दिनों सर्च ऑपरेशन चलाया था. अब उन्हें पूछताछ के लिए ईडी दफ़्तर बुलाया गया है.
बाहरी एजेंसियों को लेकर सरकार का फ़ैसला

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झारखंड सरकार के एक ताज़ा फ़ैसले के मुताबिक़, राज्य के अधिकारी अब ‘बाहरी’ एजेंसियों के समन पर सीधे हाज़िर नहीं हो सकेंगे.
वे इन एजेंसियों को सीधे-सीधे कोई दस्तावेज़ भी नहीं सौंप सकेंगे.
इसके लिए उन्हें एक तय प्रक्रिया (एसओपी) से गुज़रना होगा.
इसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि बाहरी एजेंसियों को किस तरह से सहयोग करना है.
यह सारी प्रक्रिया मंत्रिमंडल सचिवालय व निगरानी विभाग द्वारा क़ानूनी परामर्श के बाद संपन्न करायी जाएगी.
उन्हें सरकार ने इस काम के लिए नोडल एजेंसी बनाया है.
मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णय

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मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में 9 जनवरी की शाम हुई इस साल की पहली कैबिनेट बैठक में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है.
झारखंड कैबिनेट ने इसी बैठक में इसकी एसओपी को भी मंज़ूरी दे दी.
इसका प्रस्ताव मंत्रिमंडल सचिवालय व निगरानी विभाग ने ही तैयार किया था.
इसके विभागीय मंत्री के तौर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसपर पहले ही सहमति दे दी थी.
अब इस प्रस्ताव को झारखंड सरकार की मंत्रिपरिषद की सहमति मिल गई है.
सरकार की दलील

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मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जारी प्रेस बयान में हेमंत सोरेन सरकार ने कहा है कि एजेंसियों के समन से भ्रम की स्थिति बन जाती है.
बयान के अनुसार, "राज्य के बाहर की जांच एजेंसियों द्वारा राज्य सरकार के सक्षम अधिकारी को सूचित किए बिना पदाधिकारियों को सीधे समन भेजकर उपस्थित होने के लिए निर्देशित किए जाने से कई बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है."
सरकार द्वारा जारी संकल्प के मुताबिक़, “कई मामलों में सरकारी दस्तावेजों व रिकॉर्ड की मांग भी की जाती है. कई मामलों में समन या नोटिस के आलोक में राज्य सरकार के पदाधिकारी, विभाग के प्रमुख प्रधान गैर जानकारी में सरकारी दस्तावेज़ एजेंसी को सौंप देते हैं."
"इससे संबंधित कार्यालय में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने के साथ ही सरकारी कार्य भी बाधित होता है. संभावना बनी रहती है कि उपलब्ध करायी जा रही सूचना अपूर्ण या असंगत हो.”
इसमें कहा गया है कि, “यह राज्य सरकार के क्रियाकलापों व राज्य के बाहर की जांच एजेंसी की जांच को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है.”
तय प्रक्रिया यानी एसओपी

अगर झारखंड राज्य से बाहर की कोई एजेंसी (ईडी, सीबीआई, एनआईए, आयकर आदि) राज्य सरकार के किसी पदाधिकारी को नोटिस भेजती है, तो वे तत्काल इसकी सूचना अपने विभागीय प्रधान को देंगे.
विभागीय प्रधान बिना किसी विलंब के ऐसे मामलों की तथ्यपरक सूचना मंत्रिमंडल, सचिवालय व निगरानी विभाग को उपलब्ध कराएंगे.
नोडल विभाग ऐसी सूचना प्राप्त होने के बाद आगे की कार्रवाई के लिए विधि या क़ानूनी परामर्श लेगा.
उस परामर्श के बाद ही राज्य के पदाधिकारी बाहरी एजेंसियों को आवश्यक सहयोग दे पाएंगे.
मांगे गए दस्तावेज़ों के मामलों में भी इस प्रक्रिया से गुज़रना होगा.
क्या असर होगा

एक पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि राज्य सरकार का यह निर्णय एक हद तक ठीक है. बशर्ते, इसका दुरुपयोग नहीं हो और इसकी आड़ में केंद्र-राज्य टकराव की स्थिति नहीं बने.
उन्होंने कहा, "कुछ मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों के हस्तक्षेप से कामकाज पर प्रभाव पड़ता ही है."
उन्होंने कहा, “यह निर्णय उस वक्त लिया गया है, जब मुख्यमंत्री स्वयं ईडी के ख़िलाफ़ मुखर हैं. सरकार के कई अधिकारी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ईडी के निशाने पर हैं. ऐसे में आशंका है कि इसे राजनीतिक निर्णय बताया जाए."
"एक चुनौती यह भी है कि इसकी आड़ में अफ़सर बेलगाम न हो जाएं और किसी मामले की जांच प्रभावित न करने लगें. ऐसे में सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि इस फ़ैसले का सकारात्मक उपयोग हो. यह फ़ैसला केंद्र और राज्य के बीच फ़ासला बढ़ाने का कारण न बने.”
बीजेपी ने की आलोचना

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पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार के इस निर्णय की आलोचना की है.
अपने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर उन्होंने लिखा, “भारत संघीय शासन व्यवस्था वाला देश है, जहां केंद्र और राज्य दोनों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं. केंद्रीय जांच एजेंसियां देश में कहीं भी भ्रष्टाचार की जांच कर सकती हैं.”
बहरहाल, ईडी को पत्र लिखकर झारखंड की कैबिनेट सचिव ने पूछा है कि साहिबगंज के डीसी और कुछ अन्य अधिकारियों को एजेंसी ने किस अपराध में समन भेजा है.
हालांकि इस पत्र के बाद साहिबगंज के डीसी शुक्रवार को ईडी के समन पर हाज़िर नहीं हुए हैं. उनके घर पर भी पिछले दिनों सर्च ऑपरेशन चलाया गया था.
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