जंग लंबी खिंची तो अमेरिका और ईरान के लिए इसे ख़त्म करना मुश्किल क्यों होता जाएगा

ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप ने कई बार अपने बयान बदले हैं

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    • Author, आमिर अज़ीमी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

पिछले कई हफ्तों से अमेरिका और इसराइल इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता को बेहद कमज़ोर कर दिया गया है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बार-बार यह दावा किया है कि लगातार किए गए हमलों ने ईरान की कमांड संरचना को पंगु बना दिया है और जवाबी कार्रवाई करने की उसकी क्षमता को कमज़ोर कर दिया है.

उनके हिसाब से तो इस संघर्ष को अब अंत की ओर बढ़ जाना चाहिए था.

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे उलट दिखाई देती है. तनाव कम होने के बजाय और तेज़ और ज़्यादा तीखा होता जा रहा है और बाहर निकलने के साफ़ रास्ते कम होते जा रहे हैं.

शनिवार को पता चला कि ईरान ने हिंद महासागर में स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया की ओर दो मिसाइलें दागी थीं, जिसकी दूरी लगभग 3,800 किलोमीटर है. हालांकि ये मिसाइलें द्वीप तक नहीं पहुंच पाईं, लेकिन इस घटना ने ईरान की क्षमताओं को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं. अब तक आम तौर पर माना जाता रहा था कि उसकी मिसाइलों की मारक दूरी लगभग 2,000 किलोमीटर तक ही है.

चाहे यह कोई पहले से छुपी हुई क्षमता हो या फिर बमबारी के दौरान विकसित की गई क्षमता- नतीजा एक ही है: सैन्य दबाव ईरान की प्रगति को रोक नहीं पाया है.

अगर वाकई ईरान के राजनीतिक नेतृत्व के बड़े हिस्से को ख़त्म कर दिया गया है- जिसमें सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई, अली लारिजानी जैसे वरिष्ठ नेता, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर, सशस्त्र बलों के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ और प्रमुख मिसाइल निर्माण ठिकानों का नष्ट होना शामिल है- तो फिर यह अभियान चला कौन रहा है? और इतना भारी दबाव झेलने के बावजूद ईरान अपनी क्षमताएं कैसे बनाए हुए है?

बात किससे की जाए?

(बाएं से दाएं) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू

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अनिश्चितता की शुरुआत सबसे ऊपर से हो रही है. मोजतबा ख़ामेनेई, जिन्हें ईरान के नए नेता के रूप में नामित किया गया है उनके बारे में कहा जा रहा है कि वह उस हमले में बच गए थे जिसमें उनके पिता और परिवार के कई क़रीबी सदस्य मारे गए थे. वह अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं. दो लिखित संदेशों के अलावा, उन्हें न तो देखा गया है और न ही सुना गया है.

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अभी तक यह साफ़ नहीं है कि उनकी हालत कैसी है, और न ही उनकी नेतृत्व करने की क्षमता के बारे में पता है. एक ऐसी व्यवस्था में, जो पूरी तरह केंद्रीय सत्ता पर टिकी है, यह ख़ामोशी सत्ता के केंद्र को लेकर ही अनिश्चितता पैदा करती है.

और फिर भी, ईरान की कार्रवाइयां किसी भी तरह के पतन का संकेत नहीं देतीं.

शनिवार को ईरान ने इसराइल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित डिमोना शहर पर भी हमला किया. यह इलाक़ा इसराइल के अघोषित परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा माना जाता है. यह हमला ईरान के बुशहर के पास ऊर्जा ढांचे पर इसराइली हमलों के बाद हुआ, जहां ईरान का परमाणु ऊर्जा संयंत्र भी स्थित है. संदेश साफ़ था- तनाव बढ़ेगा तो उसका जवाब दिया जाएगा, और अहम ठिकाने अब सुरक्षित नहीं माने जाएंगे.

ये कार्रवाइयां भ्रम नहीं, बल्कि समन्वय का संकेत देती हैं. अमेरिका और इसराइल की रणनीति के पीछे यह धारणा थी कि शीर्ष नेतृत्व को हटाने से पूरा तंत्र पंगु हो जाएगा, लेकिन अब यह मान्यता अनिश्चित लगने लगी है. 'भय और विस्मय' की रणनीति इस सोच पर टिकी होती है कि फ़ैसले लेने वाली संरचनाएं जल्दी ढह जाएंगी. लेकिन अगर ये संरचनाएं उम्मीद से ज़्यादा मज़बूत निकलीं, तो क्या होगा?

अगर ऐसा है, तो एक और त्वरित सवाल खड़ा होता है- आख़िर बातचीत किससे की जाए?

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान अब तक बेहद लो प्रोफ़ाइल बने हुए हैं. संघर्ष की शुरुआत में उन्होंने ईरानी हमलों से प्रभावित पड़ोसी देशों से माफ़ी मांगी थी, कथित तौर पर उनके इस क़दम से आईआरजीसी के कुछ धड़े नाराज़ हो गए थे.

मोजतबा ख़ामेनेई के उभार के बाद से वह बहुत कम बोले हैं, जिससे कूटनीतिक विकल्प और सीमित हो गए हैं.

अमेरिका पर भरोसा करने की वजह नहीं

डिएगो गार्सिया में 1970 से ब्रिटेन-अमेरिका का संयुक्त मिलिट्री बेस है

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तेहरान के नज़रिए से हालिया घटनाएं बातचीत पर भरोसा करने की कोई ख़ास वजह नहीं देतीं. ट्रंप के दोबारा सत्ता में लौटने के 14 महीनों के दौरान, परमाणु समझौते की दिशा में दो अलग-अलग दौर की वार्ताओं में प्रगति के संकेत मिले और उनके बाद हमले कर दिए गए.

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि 27 फ़रवरी को जिनेवा में हुई बातचीत के दूसरे दौर में उन्होंने अमेरिका की ज़्यादातर चिंताओं का समाधान कर दिया था. वियना में तकनीकी स्तर की बातचीत की तैयारियां चल रही थीं. लेकिन ट्रंप ने कहा कि वह बातचीत की दिशा से 'खुश नहीं' हैं, और अगले ही दिन हमले शुरू हो गए.

ईरानी नीति निर्माताओं के लिए संदेश साफ़ है- बातचीत हमलों को नहीं रोकती; बल्कि शायद उन्हें न्योता ही देती है.

लेकिन तनाव बढ़ाने की क्षमता सिर्फ़ ईरान के पास नहीं है. शनिवार रात ट्रंप ने भी मुश्किल और बढ़ा दी.

उन्होंने दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक होर्मुज़ जलडमरूमध्य दोबारा खोलने की मांग करते हुए ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी कर दिया. साथ ही चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर अमेरिका ईरान के बिजली संयंत्रों को 'पूरी तरह तबाह' कर देगा.

ईरान ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया और उसी तरह की धमकी के साथ जवाब दिया. उसका कहना था कि उसके एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर किसी भी हमले का जवाब पूरे क्षेत्र में हमलों के ज़रिए दिया जाएगा. ईरान की सुप्रीम काउंसिल ऑफ़ डिफ़ेंस ने फ़ारस की खाड़ी के कुछ हिस्सों में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाने की संभावना भी जताई.

दोनों तरफ़ से दी गई इन धमकियों ने आगे मौजूद ख़तरों को साफ़ तौर पर उजागर किया. ट्रंप तेज़ी से ऐसे रास्ते पर बढ़ रहे हैं जहां विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं. ज़मीन पर सैनिक उतारे बिना, अमेरिका और इसराइल सिर्फ़ हवाई हमले ही कर सकते हैं- जो नुकसान तो पहुंचा सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि पूरी तरह आत्मसमर्पण जैसे लक्ष्य को हासिल कर सकें.

यह टकराव दोनों पक्षों को संघर्ष के कहीं ज़्यादा ख़तरनाक स्तर की सीधी राह पर ले जाता हुआ दिखाई दे रहा है.

लेकिन समय‑सीमा खत्म होने से कुछ ही घंटे पहले ट्रंप पीछे हट गए. ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि ईरान के साथ 'बहुत अच्छी और सकारात्मक बातचीत' हुई है और ईरान की ऊर्जा संरचना पर प्रस्तावित हमलों पर पांच दिनों की रोक लगाने का एलान किया.

दोनों के विकल्प सीमित

होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाजों का आवागमन लगभग बंद है.

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इसका समय काफ़ी अहम है. अपने ही अल्टीमेटम से ठीक पहले लिया गया यह फ़ैसला, कम से कम फिलहाल, हालात से निकलने का एक संभावित रास्ता खोलता है.

बाज़ारों ने सतर्क प्रतिक्रिया दी. तेल की क़ीमतों में गिरावट आई, जिससे कुछ राहत का संकेत मिला, लेकिन प्रतिक्रिया सीमित रही. इस घोषणा की असल परीक्षा ज़मीन पर होनी बाकी है, और यह भी साफ़ नहीं है कि यह रोक कितने समय तक टिकेगी या यह वाक़ई बातचीत की दिशा में कोई ठोस क़दम है.

बुनियादी सवाल फिर भी बना हुआ है- ईरान की ओर से असल में बोल कौन रहा है, और आईआरजीसी और सुरक्षा बलों पर अधिकार किसके पास है, जो 'गोली चलाने की खुली छूट' वाली स्थिति में लग रहे हैं?

अगर हालात ऐसे ही बने रहे और होर्मुज़ में अवरोध बना रहा, तो दोनों पक्ष फिर से अपनी धमकियों पर लौट सकते हैं और इसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं. पूरे क्षेत्र में लगभग 17 करोड़ लोगों, जिनमें ईरान के 9 करोड़ से ज़्यादा लोग शामिल हैं, को बिजली और अन्य ज़रूरी सेवाओं में भारी बाधा का सामना करना पड़ सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप और जलता हुआ ईरान

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बातचीत के सीमित रास्तों के बीच राष्ट्रपति ट्रंप के विकल्प लगातार सिमटते जा रहे हैं. और ज़्यादा तनाव बढ़ाने का मतलब तबाही के ऐसे चक्र में फंसना हो सकता है, जिसमें रणनीतिक लाभ बहुत कम हो और आख़िरकार सिर्फ़ सबसे चरम विकल्प ही बचें.

ईरान के लिए भी हालात आसान नहीं हैं. वह जब इस जंग में शामिल हुआ तो देश को पहले ही आर्थिक दबाव और व्यापक असंतोष का सामना करना पड़ रहा था. युद्ध ने फ़िलहाल उस दबाव को कुछ हद तक कम कर दिया है और सत्ता को आंतरिक नियंत्रण कड़ा करने की गुंजाइश दी है.

इससे एक मुश्किल संतुलन पैदा होता है. ईरान के लिए तनाव बढ़ाना एक तरफ़ बाहरी ख़तरों का जवाब देने का तरीका है, तो दूसरी तरफ़ घरेलू असंतोष को संभालने का ज़रिया भी. लेकिन इससे किसी बड़ी ग़लती का जोखिम भी बढ़ जाता है.

अब दोनों ही पक्षों के विकल्प सीमित हो चुके हैं. ईरान कमज़ोर दिखे बिना आसानी से पीछे नहीं हट सकता, जबकि अमेरिका और इसराइल सिर्फ़ हवाई ताक़त के ज़रिये कोई निर्णायक नतीजा हासिल नहीं कर सकते.

(बीबीसी फारसी बीबीसी न्यूज़ की फारसी भाषा सेवा है, जिसके दुनियाभर में 2.4 करोड़ पाठक और दर्शक हैं. ईरानी प्रशासन की रोक के बावजूद इन दर्शकों और पाठकों में से अधिकतर ईरान में हैं.)

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