धुरंधर: जब आदित्य धर का सपना फ़वाद ख़ान के कारण टूटा

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, यासिर उस्मान
- पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
आज कहानी उस सफ़र की जहां क्रिकेट की पिच पर गेंद भले ही स्पिन न ले पाई हो, लेकिन असली घटनाओं के 'फ़िल्मी स्पिन' ने पर्दे पर इतिहास रच दिया.
बात हो रही है आदित्य धर की जिनकी 'धुरंधर द रिवेंज' बॉक्स ऑफिस पर नए कीर्तिमान बना रही है.
मैंने ये हिंदी फ़िल्म लंदन के एक सिनेमाघर में देखी जो हाउसफुल था. हिंदी फ़िल्मों के लिए इस तरह का क्रेज़ या हाउसफुल होना वहां आज भी आम बात नहीं है. लेकिन उससे भी अलग एक बात और थी, जो आम नहीं है- जब फिल्म के क्रेडिट रोल में लेखक-निर्देशक आदित्य धर का नाम पर्दे पर आया, तो पूरे हॉल में तालियां गूंज उठी.
यह पल इसलिए भी खास था, क्योंकि आमतौर पर भारतीय व्यावसायिक सिनेमा में तालियां सिर्फ़ स्टार्स के लिए बजती हैं, निर्देशक या लेखक के लिए नहीं.
इस बदलाव के केंद्र में हैं आदित्य धर, वह शख्स जिन्होंने धुरंधर की दुनिया स्क्रीन पर जीवंत की.
धुरंधर की कहानी आप जानते हैं, लेकिन इसे रचने वाले आदित्य धर की कहानी क्या है?
यह कहानी है उस लड़के की, जिसका सपना क्रिकेट की पिच पर अपनी स्पिन से बल्लेबाज़ों को चकमा देने का था.
1983 में दिल्ली में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे आदित्य धर की मां दिल्ली विश्वविद्यालय में काम करती थीं. इसी शहर में आदित्य की पढ़ाई हुई और यहीं उन्हें क्रिकेट का जुनून हुआ. बतौर स्पिनर उनका सपना था भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी पहनने का. सालों तक उसी सपने को जिया. लेकिन जब अंडर-19 वर्ल्ड कप की टीम में शामिल नहीं हो पाए तो क्रिकेट के इस सपने को अलविदा कहना पड़ा.
चुनौतियां सिर्फ़ मैदान तक सीमित नहीं थीं. डिस्लेक्सिया की वजह से पढ़ाई हमेशा बेहद मुश्किल रही. डेढ़ सौ पेज की स्क्रिप्ट पढ़ना मुश्किल था लिखने की तो बात ही छोड़िए. लेकिन स्क्रीन पर कहानी बुनने का सपना लेकर, ठीक 20 साल पहले, यानी 2006 में, आदित्य धर मुंबई पहुंचे. शुरुआती 10-12 साल संघर्ष और गुमनामी में बीते.
गीतकार के रूप में पहली सफलता

इमेज स्रोत, Prodip Guha/Getty Images
आदित्य धर का पहला काम एक गीतकार के रूप में सामने आया. बॉलीवुड के प्रसिद्ध यश राज फिल्म्स बैनर की फिल्म 'काबुल एक्सप्रेस' के लिए लिखा उनका गीत 'काबुल फ़िज़ा' उस समय काफ़ी हिट रहा. इसी दौर में आदित्य ने शॉर्ट फिल्म 'बूंद' की स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखे. फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा भी आदित्य ने कई स्क्रिप्ट और स्टोरी आइडियाज़ पर काम किया जिन पर सफल फिल्में भी बनीं, लेकिन उन्हें क्रेडिट नहीं मिला. इन अनुभवों ने उन्हें बेहद निराश किया.
2010 में आदित्य ने सहायक निर्देशक के तौर पर प्रियदर्शन के साथ काम शुरू किया और कमर्शियल फिल्म मेकिंग और स्क्रीन राइटिंग की बारीकियां सीखीं. उन्होंने प्रियदर्शन निर्देशित अजय देवगन- अक्षय खन्ना की फिल्म 'आक्रोश' (2010) के डायलॉग भी लिखे, जिसके लिए उन्हें क्रेडिट मिला.
प्रियदर्शन कहते हैं, "भाषा पर आदित्य की पकड़ शानदार थी, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी."

इमेज स्रोत, Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Images
करीब तीन साल प्रियदर्शन के साथ काम करने के बाद, आदित्य अब खुद फ़िल्म निर्देशित करना चाहते थे. फिर से कई साल का संघर्ष. कई प्रोजेक्ट शुरू हुए, लेकिन कोई फ़िल्म बनी नहीं. फिर 2016 में अच्छी ख़बर आई. करण जौहर की कंपनी धर्मा प्रोडक्शन में आदित्य को एक फ़िल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला. फ़िल्म का नाम था 'रात बाक़ी'. इसमें कटरीना कैफ़ और पाकिस्तानी अभिनेता फ़वाद ख़ान की जोड़ी थी. शूटिंग प्लान हो चुकी थी. आदित्य तैयारी में जुटे थे. लेकिन तभी क़िस्मत ने फिर करवट बदली.
18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी में चरमपंथी हमला हुआ, जिसमें 17 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई. राजनीतिक माहौल गरमाया और बॉलीवुड में भी इसका असर दिखा. तय किया गया कि पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय फ़िल्मों के लिए साइन नहीं किया जाएगा.
आदित्य धर और करण जौहर की फ़िल्म 'रात बाकी' में फ़वाद ख़ान को हटा दिया गया. खबरें आईं कि उनकी जगह कोई और हीरो लिया जाएगा. लेकिन कुछ महीने बाद फ़िल्म अंततः बंद हो गई.
आदित्य की कई सालों की मेहनत अधूरी रह गई.
फ़िल्म बंद होने वजह ही बनी अगली कहानी की प्रेरणा

इमेज स्रोत, @AdityaDharFilms
लेकिन अजीब बात यह हुई कि जिस उरी हमले की वजह से उनकी पहली फ़िल्म रुकी थी, उसी घटना और भारत की सर्जिकल स्ट्राइक ने आदित्य धर को नई कहानी बनाने की प्रेरणा दी.
आदित्य धर ने एक इंटरव्यू में बताया था, "रात बाकी के ठंडे बस्ते में चले जाने के बाद, उरी हमले और उसके बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक ने मेरे भीतर एक नई कहानी को जन्म दिया. मुझे लगा कि इस पर फ़िल्म बनाना ज़रूरी है. मैंने अपनी जमा-पूंजी लगाकर रिसर्च शुरू की. पत्रकारों, सेना के अधिकारियों और रक्षा विशेषज्ञों से मुलाकात की. असफलता का डर था, लेकिन खुद को साबित करने का जुनून उससे कहीं बड़ा था."
करीब छह महीने की तैयारी के बाद, आदित्य धर ने महज़ 12 दिनों में फ़िल्म 'उरी द सर्जिकल स्ट्राइक' की पूरी स्क्रिप्ट लिख डाली.
2019 में रिलीज़ हुई ये फ़िल्म साल की सरप्राइज ब्लॉकबस्टर बनी और आदित्य बड़े निर्देशकों की कतार में शामिल हो गए. फ़िल्म के डायलॉग 'हाऊज़ द जोश?' की गूंज सिर्फ़ दर्शकों तक ही नहीं, बल्कि चुनावी सभाओं तक में भी सुनाई दी.
फ़िल्म के निर्देशन की तारीफ़ हुई, लेकिन कुछ समीक्षकों ने इसे सरकार के पक्ष में प्रोपेगेंडा भी कहा. फ़िल्म को चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले जिनमें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवॉर्ड भी शामिल था.
फ़िल्म ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श कहते हैं, "आदित्य धर ने वास्तविक जीवन से प्रेरणा लेने और एक संपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म बनाने के बीच शानदार संतुलन बनाया है. यह संतुलन हासिल करना बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि मुख्यधारा की सिनेमा में अगर सब कुछ बिलकुल वास्तविक या डार्क हो, तो बॉक्स ऑफिस पर कामयाब होना मुश्किल होता है."
"अगर आप उरी और खासतौर पर धुरंधर 1 और 2 के प्रदर्शन को देखें, तो ये न सिर्फ़ भारत में बल्कि अमेरिका, कनाडा और यूके में भी दर्शकों के साथ कनेक्ट कर रही है और बॉक्स ऑफ़िस पर इतिहास बना रही हैं."
इसी फ़िल्म के साथ आदित्य धर को अपना अलग तरह का सिनेमा रचने का कामयाब फॉर्मूला मिल गया- असल घटनाओं से प्रेरित पॉलिटिकल थ्रिलर्स. उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी बी-62 स्टूडियोज़ की शुरुआत की.

इमेज स्रोत, @AdityaDharFilms
बतौर लेखक उनकी अगली दो फ़िल्मों, 'आर्टिकल 370' और 'बारामूला', में भी भारत की दो अहम वास्तविक घटनाओं की झलक थी. इन दोनों फिल्मों पर भी प्रोपेगेंडा होने के आरोप लगे, लेकिन भावनात्मक पक्ष और फ़िल्ममेकिंग के क्राफ्ट को दर्शकों ने जमकर सराहा.
लेकिन निर्देशक के रूप में अपनी वापसी के लिए आदित्य धर ने जो विषय चुना, वह बेहद महत्वाकांक्षी था. पाकिस्तान के गैंगवार, सियासत, आतंकवाद और उसके बीच भारत का एक जासूस.
'धुरंधर' के हीरो के रूप में उन्होंने रणवीर सिंह को साइन किया, जो उस समय करियर के बेहद कठिन दौर से गुजर रहे थे. 83, जयेश भाई ज़ोरदार और सर्कस जैसी उनकी फिल्में फ्लॉप रही थीं. फिल्म के बजट और तमाम चुनौतियों के बावजूद, आदित्य और रणवीर सिंह एक जूनून के साथ धुरंधर को रचते रहे.
'धुरंधर' एक ही फ़िल्म की तरह शूट हुई, लेकिन रिसर्च और कहानी इतनी बड़ी थी कि लगा यह तो दो फिल्में हैं. इसलिए निर्णय लिया गया कि दोनों पार्ट्स अलग रिलीज़ होंगे. बड़ा रिस्क था, लेकिन आदित्य धर का यक़ीन रंग लाया और सफलता का नया इतिहास लिखा गया. धुरंधर-2 हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनने के रास्ते पर है.
फिल्म समीक्षक मयंक शेखर कहते हैं, "ऐसा महसूस होता है मानो आदित्य धर के पास सरकारी एजेंसियों तक कोई सुपर एक्सेस है जिनके बारे में अक्सर नेता, नौकरशाह, थिंक टैंक या पत्रकार भी पूरी तरह नहीं जानते. इन्हीं परतों से वह भारत के बड़े गुप्त अभियानों के पीछे की कहानियों को गढ़ते रहते हैं. उरी हो, आर्टिकल 370, या अब धुरंधर के दोनों हिस्से, हर बार यही पैटर्न दिखाई देता है."
"लेकिन, फिक्शन की असली ताकत भी यही होती है कि वह पहले विश्वसनीय लगना चाहिए. और इस मामले में धर शुरुआत ही मजबूत करते हैं. कराची के ल्यारी जैसे अंडरवर्ल्ड इलाकों से लेकर दाऊद इब्राहिम, नवाज़ शरीफ़ या 'मिस्टर 10 परसेंट' जैसे संदर्भों तक. ये पहचाने जाने वाले नाम और जगहें कहानी को हक़ीक़त के करीब ले आती हैं. यही मेल, जहां कल्पना और वास्तविकता की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं. फ़िल्म को वज़न देता है."
क्या आदित्य धर की फ़िल्में प्रोपेगेंडा होती हैं?
बड़ी कामयाबी के बावजूद धुरंधर-2 भी प्रोपेगेंडा फ़िल्म होने के आरोपों से घिरी है. देश भर के फ़िल्म आलोचक, संस्कृति और राजनीति पर नजर रखने वाले लोग अलग-अलग राय में बंटे नजर आ रहे हैं.
दशकों से जेम्स बॉन्ड या मिशन इम्पॉसिबल जैसी फ़िल्मों के ज़रिए अमेरिकी या ब्रिटिश जासूस धुरंधर की तरह ही एक्शन पैक्ड जासूसी करते आए हैं लेकिन उन्हें लेकर ऐसी बहसें नहीं हुईं.
दरअसल मुख्यधारा की स्पाई थ्रिलर्स हमेशा उसी दौर के बड़े मुद्दों जैसे राष्ट्रवाद, सुरक्षा और सीमा पार तनाव को अपने भीतर समेटती हैं.

इमेज स्रोत, @AdityaDharFilms
फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि अपने समय की कहानी और जनता की सोच का आईना भी होती हैं. इसलिए 'भारतीय दर्शक क्या चाहता है' बनाम 'प्रोपेगेंडा' की बहस भी लगातार जारी है. ये बहसें और डिबेट्स ज़रूरी हैं; यही बताती हैं कि देश के लोगों ने सोचना, सवाल करना और अपनी राय बनाना छोड़ा नहीं है.
फ़िल्म समीक्षक मयंक शेखर कहते हैं, "सच कहूं तो, फ़िल्मों के संदर्भ में मैं 'प्रोपेगेंडा' को अपने आप में कोई नकारात्मक या अपमानजनक शब्द नहीं मानता जब तक कि वह खुलकर आपत्तिजनक न हो, जैसे कि 'द केरला स्टोरी' के मामले में देखने को मिला. इस फ़िल्म में 2016 की नोटबंदी के बाद की राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे संदर्भ ज़रूर हैं, जो मौजूदा सत्ता के दृष्टिकोण के करीब लगते हैं."
"दिलचस्प यह भी है कि फ़िल्म में आईएसआई के प्रभाव को भारत के भीतर काफी व्यापक रूप में दिखाया गया है. लेकिन अंततः, कहानी पूरी तरह नफ़रत पर नहीं टिकी. हमज़ा अपने निजी जीवन में साफ कहता है कि उसे पाकिस्तानियों से नहीं, बल्कि आतंकवादियों से समस्या है, और शायद यही लाइन इस पूरी कहानी को एक मानवीय संतुलन भी देती है."
खुद आदित्य धर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस आरोप का जवाब देते हुए कहा था, "जो लोग इसे प्रोपेगेंडा कहते हैं, उनकी मुझे कोई परवाह नहीं. सच कहूं तो मुझे वास्तव में उनकी चिंता नहीं है. क्योंकि असली बात यह है कि मैं जानता हूं यह कहां से आ रहा है, और भारतीय दर्शक बहुत ही समझदार हैं. जब वे फ़िल्म देखते हैं, उन्हें आसानी से समझ में आ जाता है कि कौन सी फ़िल्म प्रोपेगेंडा है और कौन सी फ़िल्म की नीयत सही है."
"और मेरी फ़िल्म के साथ, जब तक मैं निर्माता या निर्देशक रहूंगा, उसकी नीयत इरादा हमेशा सही रहेगा. जिस दिन मेरी नीयत ठीक नहीं होगी मैं फ़िल्में बनाना बंद कर दूंगा."
आदित्य धर ने देश के माहौल के मुताबिक एक सफल फॉर्मूला रचते हुए, तकनीकी भव्यता के साथ अपनी प्रतिभा की धमक क़ायम की है. लेकिन यह भी सच है कि धुरंधर में उन्होंने कई सीन में तथ्यों में बदलाव किया और सिनेमाई लिबर्टी के नाम पर एक नए सच को गढ़ने की कोशिश की.
कामयाबी अपनी जिम्मेदारियां भी लेकर आती है और उन पर यह जिम्मेदारी रहेगी कि उनका कैमरा तथ्यों और कल्पना के बीच उस महीन लकीर का भी सम्मान करेगा जिसे पार करना अक्सर एक फिल्मकार को इतिहास के प्रति कटघरे में खड़ा कर देता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































