'हमारे चौधरी असलम तुम्हारे संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम थे', धुरंधर पर पाकिस्तान से ब्लॉग

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- Author, मुहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
आजकल पूरी फ़िल्म देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती. फ़िल्म तो बाद में आती है, लेकिन उसके गाने, डांस, उसकी रील्स और 'घुस के मारेंगे' के डायलॉग हमारे फ़ोन पर पहले ही आ जाते हैं.
'धुरंधर' फ़िल्म भी पाकिस्तान के सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं हुई है, लेकिन कई लोगों ने कुछ तरकीबें लगा कर इसे देख लिया है.
उनके कुछ एतराज़ पुराने ही हैं कि पूरा पाकिस्तान लखनऊ नहीं है और यहाँ हर कोई हाथ उठा-उठा कर आदाब-आदाब नहीं करता. सुरमा भी हममें से कुछ ही लोग लगाते हैं.
लेकिन इस फिल्म में कराची के दो मशहूर किरदार, रहमान डकैत और एसपी चौधरी असलम को दिखाया गया है. ये दोनों ही कराची में किसी के हीरो हैं तो किसी के विलेन.
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इसीलिए लोगों ने फ़िल्म को बड़े चाव से देखा है. लोगों ने अक्षय खन्ना को अरबी गानों पर बलूची डांस करते देखा है. संजय दत्त को चौधरी असलम बनकर बलूच लोगों को गाली देते देखा है.
लोग इसके मज़े भी ले रहे हैं और साथ ही भारत के लोगों को समझा रहे हैं कि हमारे चौधरी असलम तुम्हारे संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम थे. अक्षय खन्ना ने बहुत अच्छी एक्टिंग की है, हमारे रहमान डकैत बेरहम थे, लेकिन इतने बेरहम भी नहीं थे.
'धंधे का धंधा और देश की ख़िदमत भी'

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वैसे तो भारत और पाकिस्तान दोनों की सरकारें एक ही नारा लगाती हैं कि 'हम घुसकर मारेंगे'. लेकिन अब यह भी पता नहीं चलता है कि यह नारा सबसे पहले किसी फ़िल्म के हीरो ने लगाया था या खुद सरकार ने. लेकिन भारतीय फ़िल्मी जासूस बहुत समय से कराची आते-जाते रहे हैं.
मरहूम इरफ़ान ख़ान और उनके साथी 'डी-डे' फ़िल्म में दाऊद इब्राहिम को कराची से वापस ले जाने आए थे और वे उसे वापस ले भी गए.
असली दाऊद इब्राहिम पता नहीं इस समय कहाँ है.
सैफ़ अली ख़ान दो-तीन फ़िल्मों में बदला लेने कराची आए थे. मारपीट करके और मुजरा देखने के बाद ख़ैर ख़ैरियत से वापस चले गए.
जिन फ़िल्मों में भारतीय जासूस पाकिस्तान नहीं भी आते, उनकी भी जंग पाकिस्तान से ही होती है.
सलमान ख़ान को, शाहरुख़ ख़ान को पाकिस्तान की आईएसआई की कोई खूबसूरत जासूस किसी स्विमिंग पूल के किनारे मिल जाती है और दिल दे बैठती है.
वे बेचारे पाकिस्तानी जिनको असली आईएसआई के साथ काम पड़ता है, वे यही पूछते रहते हैं कि इतने खूबसूरत जासूस इन्होंने कहाँ छिपा रखे हैं.
वैसे तो ये फ़िल्में देशभक्ति का तड़का लगाओ, डेढ़-दो आइटम सॉन्ग, हर तीसरे मिनट में पाकिस्तानी उड़ाओ और बॉक्स ऑफ़िस पर छा जाओ के तरीके पर काम करती हैं. धंधे का धंधा और देश की ख़िदमत भी.
वैसे भी, मेरी तो यही राय है कि बॉर्डरों पर लड़ने के बजाय, फ़ाइटर जेट पर अंधाधुंध पैसे खर्च करने के बजाय, घुसकर मारने के बजाय, घुसकर सेट पर फ़िल्म बनाना बेहतर काम है. इंटरनेट पर भी रौनक हो जाती है और मीम क्रिएटर्स भी इसका मज़ा लेते हैं.
फ़िल्म की शुरुआत में आमतौर पर लिखा होता है कि यह सच नहीं है, यह झूठ है, या यह एक छोटी-मोटी ऐतिहासिक घटना थी. हमने इसे फ़िक्शन बना दिया है.
मुंबई हमलों के दौरान कराची का हाल

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लेकिन 'धुरंधर' में एक बात जो दिखाई गई है, वह ये है कि जब मुंबई पर 26/11 का हमला हुआ, तो कराची में जश्न मनाया गया था.
मैंने अपनी आधी ज़िंदगी कराची में बिताई है. कराची इतना बड़ा शहर है कि कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह पूरे कराची को जानता है. लेकिन पूरे कराची में हमारे दोस्त रहते हैं.
इनमें से सरकार से नाख़ुश लोग भी हैं, छोटे-मोटे बदमाश भी हैं, कुछ के तो जिहादी विचार भी हैं, लेकिन मैंने कभी किसी से यह नहीं देखा या सुना कि जब मुंबई में हमले हुए थे, तो कराची के लोगों ने जश्न मनाया था.
ज़्यादातर कराची वालों ने ज़ाहिर है मुंबई नहीं देखी होगी, लेकिन फ़िल्मों में तो ज़रूर देखी है और उन्हें आम तौर पर मुंबई भी कराची की तरह समुद्र किनारे बसा शहर लगता है.
जब हमलों की ख़बर आई थी तो मुझे याद है कि पूरा शहर दहशत में था और लोग सोच रहे थे कि हम पर यह कौन सी नई मुसीबत आ गई है. बाकी तो फ़िल्म बनाने वालों की अपनी मर्ज़ी है कि वह क्या दिखाना चाहते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














