अक्षय खन्ना लाइमलाइट से दूर रहने के बाद फिर 'धुरंधर' कैसे बन जाते हैं?

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- Author, यासिर उस्मान
- पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
किसी भी बड़ी फ़िल्म की रिलीज़ पर आम तौर पर एक ही अलिखित नियम चलता है कि प्रचार तंत्र और सोशल मीडिया फ़िल्म के हीरो के नाम का ही जाप करेगा.
हीरो ही चर्चा का केंद्र होता है लेकिन कभी-कभार ही होता है कि यह नियम टूट जाए. ताज़ा बॉलीवुड हिट 'धुरंधर' में ऐसा ही हुआ है.
फ़िल्म के स्टार हीरो रणवीर सिंह हैं लेकिन गूंज अक्षय खन्ना के नाम की है, जो विलेन रहमान डकैत बनकर पर्दे पर आए और सीधे दर्शकों के दिलों पर छा गए.
अक्षय के सीन और उनका डांस इतना वायरल हो चुका है कि उनकी चर्चा ने फ़िल्म के हीरो रणवीर सिंह के साथ-साथ संजय दत्त और अर्जुन रामपाल जैसे सितारों की चमक को भी फीका कर दिया है.
यह बात इसलिए और दिलचस्प हो जाती है क्योंकि अक्षय खन्ना उन कलाकारों में से हैं जो मीडिया से दूरी बनाए रखते हैं. न सोशल मीडिया अकाउंट, न कोई प्रचार टीम, न पार्टियां, न फोटो-ऑप. कुछ भी नहीं.
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जहां आत्म-प्रचार को सफलता का ज़रूरी हथियार माना जाता है, अक्षय खन्ना एक ऐसे स्टार हैं जो फ़िल्में भी कम करते हैं, लाइमलाइट और इंटरव्यूज़ से भी दूर भागते हैं. अपने साउथ बॉम्बे के घर में अकेले रहना उन्हें बेहद पसंद है. उनके बारे में फ़िल्म निर्देशक करण जौहर ने मज़ाक में कहा था कि अगर अक्षय खन्ना को किसी वीकेंड पर ऑस्कर अवॉर्ड भी मिल रहा होगा तो वह यह कहकर मना कर देंगे कि वह वीकेंड पर घर से नहीं निकलते.
अक्षय खन्ना ऐसे ही हैं. चमक से दूर. पर जब पर्दे पर आते हैं, तो सबको पीछे छोड़ देते हैं.
बिना अच्छी टीम के एक्टर कुछ नहीं

जुलाई 2017 में मुझे अक्षय खन्ना का इंटरव्यू करने का मौक़ा मिला था. दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में वह अपनी एक फ़िल्म का प्रमोशन करने आए थे. हालांकि प्रमोशन शब्द उनके व्यक्तित्व पर कभी पूरी तरह फिट नहीं बैठता. वह मीडिया से बात करने के लिए कतई उत्साहित नहीं थे. उनकी आंखों में थकान थी और चेहरा गहरी चुप्पी से घिरा हुआ था. दो महीने पहले ही उनके पिता और मशहूर बॉलीवुड स्टार विनोद खन्ना का निधन हुआ था.
मैंने बातचीत शुरू करने की कोशिश की और पूछा, "आपकी फ़िल्में इतनी देर-देर में क्यों आती हैं?"
उन्होंने हल्की, गंभीर आवाज़ में कहा, "कुछ पर्सनल इश्यूज़ थे. जिनकी वजह से मैं फ़िल्मों से दूर था. और… अच्छी स्क्रिप्ट नहीं मिल रही थी."
वाक्य आधा बोला, आधा निगल लिया. मैंने देखा वह ठहर गए थे. कुछ क्षण बाद उन्होंने खुद ही बात आगे बढ़ाई. मानो अपने ही भीतर के ताले एक-एक कर खोल रहे हों.
उन्होंने कहा, "देखिए, एक्टर होना आसान नहीं है. एक एक्टर दुनिया का सबसे ज़्यादा निर्भर और संवेदनशील कलाकार होता है. बाकी कोई भी कला जैसे लिखना या संगीत बनाना अकेले भी की जा सकती है. लेकिन एक्टर अकेले कुछ नहीं कर सकता. हमें अच्छे डायरेक्टर, अच्छे लेखक, अच्छे कैमरामैन, और अच्छे साथी कलाकारों की ज़रूरत है. एक्टर का काम बहुत नाज़ुक होता है. अच्छी टीम के बिना हम कुछ भी नहीं."
'धुरंधर' देखकर पता चलता है कि वह कितने सही थे. अक्षय तो वही हैं, लेकिन 'धुरंधर' में उनका रोल जिस तरह लिखा गया, और निर्देशक आदित्य धर ने जिस खूबसूरती से उन्हें पेश किया है उसने पूरी बाज़ी पलट दी.
उस दिन अक्षय मेरे ज़्यादातर सवालों के बहुत छोटे जवाब देते रहे मानो इंटरव्यू देना ही न चाहते हों. अंत में मैंने उनसे उनके पिता विनोद खन्ना के बारे में सवाल पूछा जिन्हें गुज़रे हुए क़रीब दो महीने बीते थे.
वह फिर खामोश हो गए. कुछ पल बाद बोले, "देखिए, अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं और हम पर अभी इसका बहुत असर है. मैं कुछ भी बोलूंगा तो इमोशनल हो जाऊंगा. इसलिए इसे रहने देते हैं."
साफ़गोई

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इंटरव्यू के बाद मैंने उन से पूछा कि क्या मेरे किसी सवाल से उन्हें परेशानी हुई. तो वह फौरन बोले, "नहीं-नहीं. बस, मेरा बात करने का मन नहीं कर रहा."
मैं उनकी साफगोई पर हैरान हुआ. वह करियर में कई साल के ब्रेक के बाद आ रही अपनी एक बड़ी फिल्म को प्रमोट करने आए थे. मगर फिर भी मीडिया से अपने बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्होंने साफ़ कहा कि अगर फ़िल्म अच्छी बनेगी और उनका अभिनय अच्छा होगा तो लोग पसंद करेंगे, चाहे वह फ़िल्म प्रमोट करें या न करें, चाहे वह फ़िल्म के हीरो हों या न हों.
अक्षय खन्ना का यह विश्वास भी सालों बाद 'धुरंधर' में रंग लाया. इस फिल्म के प्रमोशन में वह कहीं नहीं दिखे लेकिन वायरल वही हैं.
करीब 28 साल पहले, जब पिता विनोद खन्ना ने अक्षय खन्ना को हिमालय पुत्र (1997) में लॉन्च किया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि वह हिंदी सिनेमा का सबसे अनोखा सफ़र तय करेंगे.
अक्षय को बतौर 'सोलो हीरो' कामयाबी नहीं मिली. अजीब संयोग है कि यह बात उनके पिता विनोद खन्ना पर भी लागू होती थी. विनोद खन्ना की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर्स अक्सर दो-हीरो वाली फिल्में थीं. अक्षय की कामयाब फिल्में भी दो हीरो वाली या मल्टीस्टारर फिल्में रहीं.
शुरुआती सालों में 'बॉर्डर' ने उनके अभिनय का पहला बड़ा जौहर दिखा दिया. संवेदनशील, अंतर्मुखी, और गहरी भावनाओं से भरा हुआ किरदार. लेकिन बतौर हीरो कुदरत, डोली सजा के रखना, लावारिस, आ अब लौट चलें जैसी फिल्में सब एक-एक कर पिटती गईं.
बड़ी चमक मिली तो सुभाष घई की 'ताल' से, लेकिन वहां भी अनिल कपूर और ऐश्वर्या राय मौजूद थे. अक्षय की रोशनी हर बार किसी और के साथ बंटी हुई दिखाई देती थी.
...जैसे किसी पियानो वादक की उंगलियां कट जाएं

फ़्लॉप फ़िल्मों से ज्यादा नुकसान उनका झड़ते बालों ने किया.
मगर उनके करियर को सबसे ज़्यादा चोट कम चलती फिल्मों ने नहीं, बल्कि उनके झड़ते बालों ने पहुंचाई. भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में नायक का उनका हेयर-स्टाइल बेहद अहम होता है.
बाल नायक की पहचान, उसका रुतबा, उसकी फैन-फॉलोइंग का इश्तहार होते हैं. और अक्षय, बहुत कम उम्र में, इन्हें तेज़ी से खोने लगे.
फ़रहान अख़्तर की 'दिल चाहता है' (2001) ने उन्हें एक नए अंदाज़ में पेश किया. आधुनिक, स्टाइलिश, परिपक्व. शहरी दर्शकों में उनकी नई फैन फॉलोइंग खड़ी हुई. पर इस स्टाइल के साथ एक सच्चाई साफ़ दिखने लगी.
अक्षय के बाल तेज़ी से गायब हो रहे थे. बाल जाने लगते हैं तो सितारे अक्सर हेयर ट्रांसप्लांट जैसी तकनीक का सहारा लेते हैं. लेकिन न जाने क्यों अक्षय ने ऐसा नहीं किया. इस दौर में अक्षय खन्ना के कई समकालीन स्टार उनसे आगे निकल गए.
सालों बाद, फ़िल्म पत्रकार और समीक्षक मयंक शेखर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बिना किसी झिझक के स्वीकार किया कि बाल जाने से उनका आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगा गया था.
उन्होंने कहा था, "यह सच में आत्मविश्वास को हिला देता है. मेरे साथ यह सब बहुत कम उम्र में होने लगा था, और उस वक़्त यह एहसास वैसा था जैसे किसी पियानो वादक की उंगलियां कट जाएं. मेरे लिए वह अनुभव बिल्कुल ऐसा ही था. धीरे-धीरे, समय के साथ आप इसे समझना और स्वीकारना सीख जाते हैं."
इस स्वीकारोक्ति में उस अभिनेता की सच्चाई छिपी थी जिसने अपने गंजेपन से लड़ाई नहीं की बल्कि उसे अपने किरदारों में ढाल दिया. मयंक शेखर उस इंटरव्यू को याद करते हुए कहते हैं कि एक फ़िल्म स्टार से बालों के बारे में उन्होंने बड़ी हिम्मत करके सवाल पूछा था लेकिन अक्षय खन्ना उस दिन शायद दुर्लभ रूप से बात करने के मूड में थे, इसलिए खुलकर बोले.
कमबैक का साल

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'दिल चाहता है' के बाद अक्षय अब्बास–मस्तान और प्रियदर्शन की दुनिया में जाते रहे और हंगामा, हमराज़, नकाब, रेस जैसी कई हिट फ़िल्मों का हिस्सा बने.
इन फ़िल्मों ने उन्हें लोकप्रिय तो किया, लेकिन इन हिट फ़िल्मों में वे कभी 'अकेले' हीरो नहीं थे. 'गांधी माय फादर' (2007) में महात्मा गांधी के बेटे हरिलाल गांधी की भूमिका में उन्होंने यादगार अभिनय किया. समीक्षकों ने तो खूब सराहा, लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली. शायद इसी मोड़ पर उन्होंने यह समझ लिया कि नायक बनकर चमकने से बेहतर है अच्छे और ठोस सपोर्टिंग रोल्स निभाना.
अक्षय हिंदी सिनेमा के अकेले 'हीरो' हैं जो लगभग गंजे लुक में 'इत्तेफाक' और 'दृश्यम' जैसी कामयाब फिल्मों में न सिर्फ़ नज़र आए बल्कि अपने अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा.
एक नहीं इस साल की दो बड़ी हिट फ़िल्मों में अक्षय खन्ना चमके और दिलचस्प बात यह है कि 'धुरंधर' की गूंज के बीच लोग भूल गए कि इसी साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर 'छावा' में भी अक्षय ने मुख्य खलनायक औरंगज़ेब की भूमिका में बेहतरीन अभिनय किया था. दो बड़ी हिट फ़िल्मों के साथ, 2025 अक्षय खन्ना के करियर की सबसे मज़बूत वापसी का साल बन गया है.
इस ज़ोरदार कमबैक पर मयंक शेखर कहते हैं, "अक्षय खन्ना को अक्सर 'अंडररेटेड' कहा जाता है, क्योंकि एक प्रमुख नायक के रूप में उन्हें वह स्थान कभी नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे. थिएटर बिज़नेस पर चलने वाला बॉक्स ऑफिस कई उतार-चढ़ावों पर टिका होता है, और उसमें सबसे महत्वपूर्ण है वह स्क्रिप्ट, जो अक्षय खन्ना जैसा अभिनेता की शांत, संयमित और गहरी अभिनय-शैली के अनुरूप हो. 'दिल चाहता है' उन विरली फिल्मों में से थी, जिसने उनके इस पक्ष को सटीकता से उजागर किया."
"अब 'छावा' और 'धुरंधर' जैसी एक्शन फ़िल्मों में यह और ज्यादा स्पष्ट हो जाता है कि कितना भी शोर-शराबे वाला माहौल क्यों न हो, अक्षय खन्ना अपनी सधी हुई, संतुलित और असरदार मौजूदगी से तुरंत अलग नज़र आने लगते हैं. उनकी कम बोलने वाली, लेकिन गहराई लिए शैली उन्हें भीड़ में भी अनोखा बना देती है."
सफलता की परिभाषा

कामयाबी की अपनी परिभाषा बयान करते हुए अक्षय खन्ना ने एक इंटरव्यू में कहा था, "समझो मैं बिज़नेसमैन हूं और मेरा 500 करोड़ का बिज़नेस है, तो जब तक मैं रतन टाटा नहीं बनूंगा या धीरूभाई अंबानी नहीं बनूंगा या अज़ीम प्रेमजी नहीं बनूंगा तो क्या मैं सक्सेसफुल नहीं हूं? जब तक मैं शाहरुख़ ख़ान नहीं बनूंगा तब तक क्या मैं सक्सेसफुल नहीं हूं? मैंने कामयाबी देखी है. हमारी 120 करोड़ की आबादी में 15-20 लोगों को मौका मिलता है फ़िल्मों में काम करके हीरो बनने का, उससे ज़्यादा क्या चाहिए आपको? 16-17 साल तक मुझे काम मिल रहा है अपनी शर्तों पर."
अपनी प्रतिभा पर यक़ीन और शांत रहकर सिर्फ अपने काम से बोल उठने वाले अक्षय खन्ना का कमबैक यही बताता है कि शोर नहीं, असर सबसे दूर तक जाता है, और कभी-कभी सबसे धीमी वापसी ही सबसे मज़बूत वापसी होती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















