दलित ईसाइयों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला, क्या कहा?

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सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन को लेकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के दर्जे के मामले में मंगलवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया.
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने कहा कि अगर कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपना धर्म बदलकर ईसाई धर्म को अपनाता है, तो वह व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के इसी मामले में दिए गए एक फ़ैसले को सही ठहराया.
दरअसल, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, "अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, उसे मानता और उसका पालन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता."
समझते हैं मामला क्या था और इसका क्या मतलब है?
क्या है मामला

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चिंथड़ा आनंद नाम के एक पादरी ने शिकायत की थी कि कुछ लोगों ने दिसंबर 2020 में उन्हें जाति-आधारित गालियाँ दी थीं. अपनी शिकायत में उन्होंने कहा था कि जब वे संडे को अपने घर पर प्रार्थना कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने उनसे मारपीट की थी.
चिंथड़ा आनंद का कहना था कि वे मडिगा जाति के हैं. यह एक अनुसूचित जाति है. उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई.
लेकिन अभियुक्तों का यह कहना था कि चिंथड़ा आनंद सालों से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे, इसलिए वे अनुसूचित जाति को अत्याचार से बचाने वाले क़ानून के तहत शिकायत दर्ज नहीं करवा सकते.
इसी दलील के आधार पर अभियुक्तों ने आनंद के शिकायत के ख़िलाफ़ आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में एक केस दायर किया था.
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में अपना फ़ैसला अप्रैल 2025 में दिया.
कोर्ट ने कहा कि केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति ही इस क़ानून के तहत शिकायत दर्ज कर सकता है. अदालत ने कहा था कि शिकायत करने वाले व्यक्ति पिछले 10 सालों से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे.
कोर्ट ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति नहीं होती है, इसलिए ईसाई धर्म के एक पादरी इस क़ानून का सहारा नहीं ले सकते.
इसी आधार पर कोर्ट ने शिकायत को ख़ारिज कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट में केस

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चिंथड़ा आनंद ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. उन्होंने कहा कि जाति किसी व्यक्ति के जन्म से तय होती है. उनका कहना था कि धर्म परिवर्तन करने से उनकी सामाजिक पहचान और जाति से जुड़ा ऐतिहासिक भेद-भाव ख़त्म नहीं हो जाता.
वहीं दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला सही है और ईसाई धर्म का कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति के क़ानून के तहत कार्रवाई नहीं शुरू कर सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1950 के एक संवैधानिक आदेश में लिखा है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आ सकते हैं.
कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लेता है, तब वह अनुसूचित जाति में नहीं आ सकता.
अदालत ने कहा कि इस मामले में कोई संदेह नहीं है कि याचिकाकर्ता ने क़रीब एक दशक से ईसाई धर्म को अपना लिया था, इसलिए वे ख़ुद को अनुसूचित जाति का नहीं बता सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस वजह से वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का भी लाभ नहीं ले सकते.
1950 के संवैधानिक आदेश में ही उन जातियों की सूची दी गई है जो आरक्षण का लाभ ले सकती हैं. कोर्ट ने कहा कि 'अनुसूचित जाति को दिया गया कोई भी क़ानूनी लाभ, आरक्षण या अन्य फ़ायदे उन लोगों को नहीं मिल सकते जो इस संवैधानिक आदेश के दायरे में नहीं आते हैं.'
इससे क्या फ़र्क पड़ेगा?

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कोर्ट के सामने केवल यह सवाल था कि क्या ईसाई धर्म का कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कर सकता है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि ऐसा नहीं किया जा सकता.
यह मुद्दा काफ़ी समय से उठता आ रहा है कि हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म छोड़ने के बाद क्या कोई अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति आरक्षण वगैरह का लाभ उठा सकता है या नहीं.
हालांकि मौजूदा केस में सुप्रीम कोर्ट के सामने इस विषय पर सवाल नहीं उठा था. फ़िलहाल, ऐसे व्यक्तियों को अनुसूचित जाति के लाभ नहीं मिलते हैं जिन्होंने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़ दिया है.
केंद्र सरकार ने अपने एक 2016 के प्रेस रिलीज़ में कहा था कि कई अनुसूचित जाति के लोग जिन्होंने ईसाई धर्म को मानना शुरू किया है, उन्हें अन्य पिछड़े वर्ग की श्रेणी में आरक्षण का लाभ मिलता है.
अनुसूचित जाति की श्रेणी में आने से कई और लाभ मिलते हैं. इनमें प्रताड़ना के लिए अलग क़ानूनों के तहत सुरक्षा, संसद में आरक्षण आदि शामिल हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के कई फ़ैसलों में कहा है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं.
मंगलवार के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों का सहारा लिया.
फ़िलहाल 2004 से कोर्ट के सामने एक याचिका लंबित है, जिसमें यह मांग की गई है कि इस्लाम और ईसाई धर्म के लोगों को भी अनुसूचित जाति में गिना जाना चाहिए और उन्हें आरक्षण जैसे लाभ मिलने चाहिए. केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया है.
केंद्र सरकार ने एक समिति का भी गठन किया हुआ है, जो इस बात पर विचार करेगी कि जो लोग इस्लाम और ईसाई धर्म को अपना चुके हैं, उन लोगों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में गिना जाना चाहिए या नहीं.
यह समिति साल 2022 में बनाई गई थी और इस समिति के अध्यक्ष भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन हैं.
इसके पहले, 2007 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि अनुसूचित जाति की श्रेणी में ईसाई और इस्लाम धर्म के लोगों को भी आना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
































